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भ्रष्टाचार के धन से बने दानवीर (व्यंग्य)

ऐसे बहुत से लोग हैं जो भ्रष्टाचार से धन कमा रहे हैं। इसमें हर वर्ग के लोग शामिल हैं। अनुचित तरीके से धन कमाने वाले कुछ लोग खुलकर दान करते हैं और दानवीर बने हुए हैं। यह समाज इतना असंवेदनशील हो गया है कोई उनकी निंदा भी नहीं करता। यह बेहद दुखद है कि समाज ने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है। लोग जब तक भ्रष्टाचारी को धन नहीं दे देते तब तक उन्हें अपने काम होने पर विश्वास ही नहीं होता और इसका उन्हें अफ़सोस भी नहीं होता। वे रिश्वत लेना नहीं छोड़ते चाहे इसके बदले उनकी नौकरी ही क्यों न चली जाए। अगर जेल भी हो जाए तो उन्हें इस बात का अफसोस नहीं होता की उन्होंने रिश्वत क्यों ली। शहर में होने वाले कई आयोजनों में इनके द्वारा दिए गए दान का बड़ा योगदान रहता है। ऐसे आयोजक इन भ्रष्टाचारियों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं। इनके बीच में ईमानदार का रहना बड़ा मुश्किल है। एक कमाऊ विभाग के एक ईमानदार बाबू पिछले दस सालों से लूपलाइन में पड़े हुए थे। ये सजा उन्हें उनकी ईमानदारी के कारण मिली थी जिसे उन्होंने बेहिचक स्वीकार कर लिया था।
ऐसे ही एक राकेश जी भी थे जो एक कमाऊ विभाग में अधिकारी के पद पर थे। जब तक कार्यरत रहे तब तक उन्होंने दो नंबर से अकंत रुपया कमाया और खुले हाथों से दान किया। इससे उन्हें समाज में खूब मान प्रतिष्ठा मिली। शहर की सभी सामजिक साहित्यिक साँस्कृतिक  तथा कला संस्थाओं ने उनका सम्मान किया। सम्मान पत्र दिए और मोमेन्टो भी जो उन्होंने अपने विशाल घर के विशाल हाल मे सजाकर रख रखे थे। अब वे सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जबसे वे सेवानिवृत्त हुए हैं तबसे उन्होंने धेले भर का दान भी नहीं किया है। अब उनके पास कोई चंदा लेने भी नहीं आता। लेकिन अब वे काफी ख्याति बटोर चुके हैं अब उन्हें इसकी आवश्यकता भी नहीं है। कभी लोगों से घिरे रहने वाले अब एकाकी रहकर अपना जीवन गुजार रहे हैं। राकेश जी ने कुल जमा चार मुक्तक कभी किसी से लिखवा लिए थे उनके आधार पर वे शहर की हर साहित्यिक संस्थाओं के सभी तरह के सम्मान एवं मान पत्र पा चुके हैं। संस्था चलाने वालों को संस्था चलाने के लिए धन चाहिए जो उन्हें धन देता है उसके वे सौ गुनाह भी माफ कर देते हैं। राकेश जी को यह अच्छी तरह समझ आ गया है कि कभी सर्वाधिक चर्चा में रहने वाले वे शीघ्र गुमनाम हो जाएँगे। इस शहर की भीड़ में वे अनजान बनकर रह जाएँगे कोई पहचान कर भी उन्हें नहीं पहचानेगा बस यादें बाकी रह जाएँगी।


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रचनाकार
प्रदीप कश्यप

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