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कहानी: ठेले पर धंधा

कैलाश के पास ठेला था उसी में वो सामान रखकर बेचता था कभी सब्जी तो कभी मसाले तो कभी  दाल चावल आजकल वो गाँव जाकर चावल इकठ्ठा कर के फिर उसे ठेले में रखकर बेच रहा था। आज शाम को जब वह चावल बेच कर आया तो  बड़ा खुश दिखाई दे रहा था क्योंकि आज उसे खर्च काट कर शुद्ध पन्द्रह सौ रुपये का लाभ हुआ था।
कैलाश पिछले तीन महीने से बहुत परेशान था तीन महीने पहले उसकी तबियत खराब हो गई थी जैसे तैसे ठीक हुआ तो ठेले पर मंडी से सब्जी लाकर बेचने निकला  तो सब्जी उसकी बहुत कम बिकी दूसरे दिन  शहर में तनाव होने के  कारण पुलिस ने उसे ठेला लेकर जाने नहीं दिया तीसरे दिन सब्जी खराब हो गई और उसे वो फैंकना पड़ी उसमें उसकी लागत भी नहीं निकली। एक दिन टमाटर लेकर आया तो उनकी भी बिक्री कम हुई दूसरे दिन टमाटर के भाव गिर गए उसके बहुत से टमाटर खराब हो गए थे जिन्हें फैंकना पड़ा ।बचे टमाटर दाम गिरा कर बेचे।  कुछ दिन उसने ठेला नहीं लगाया पर घर आखिर कब तक बैठता गर्मी का मौसम शुरू ही हुआ था इसलिए उसने गन्ने का रस बेचने का विचार किया इसके लिए वो लकड़ी की  चरखी लाया तथा थोक में गन्ने खरीदे बर्फ लिया नींबू लिए और ठेले पर गन्ना पेरने की चरखी रखकर रस बेचने चल दिया।  चरखी हाथ से चलने वाली थी। दिन भर उसका रस तो खूब बिका लेकिन हाथ से चरखी चलाने में उसे काफी मेहनत करना पड़ी शाम को जब वो घर आया तो निढाल होकर लेट गया फिर दो दिन  तक उसधने काम बंद रखा कुछ ठीक होने पल फिर गन्ने का रस बेचने के लिए निकल पड़ा  उस दिन भी उसका यही हाल हुआ  चरखी वो नौ हजार रुपये की लाया था पर जब उससे रस निकालना मुश्किल हो गया तो कास्ट आयरन की जनरेटर से चलने वाली चरखी की जुगाड़ तो उसने कर ली पर चरखी भारी थी  उससे ठेला थरथराने लगा  फिर उसे  ठेले से हटाकर लकडी वाली चरखी फिट की पर बात बनी नहीं।   आसपास और भी गन्ने के रस की दुकानें खुल गई थीं। उनके पास गन्ने का रस निकालने वाली ऑटोमेटिक मशीन थी । कैलाश ने गन्ने का रस बेचने का विचार ही  खत्म कर दिया।  कुछ दिन घर बैठने के बाद  उसके मन में चावल का धंधा  फिर शुरू करने का विचार आया ये वह चावल थे जो सरकार गरीबों को दो रुपये किलो  में हर महीने देती थी  कैलाश उन्हें खरीदने  के लिए गाँव जाने लगा था  घर घर जाकर वो सतरह रुपये किलों  खरीदता था जिन्हें शहर  में वो पच्चीस रुपये किलो बेच देता था। यह धंधा उसका चल निकला था। इसके पहले वो मूँग चना चने की दाल  मक्का व बाजरा भी बेच चुका था। दस दिन के धंधे में  उसने बीस हजार रुपये  कमाए थे।  जिससे उसने  दो महीने  का मकान किराया अदा कर दिया।  दुकानों से लिया  कर्ज भी  उदा कर दिया। था। आज भी वो अच्छी बिक्री के कारण  ज्यादा मुनाफा  होने  उस  की खुशी   बढ़ गई थी। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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