बालकिशन को आजीवन कारावास की सजा भोगते हुए आज पूरे पन्द्रह वर्ष हो गए थे आज उसकी पत्नी सुनीता उससे मिलने आई थी उसने बताया कि बेट प्रकाश की शादी तय कर दी है । आपके पैरोल की कार्यवाही करना है ताकि आप बेटे की शादी में शामिल हो सकें बालकिशन की आँखों में खुशी के आँसू छलक आए थे जब उसे जेल हुई थी तब प्रकाश दस वर्ष का था और बिटिया प्रीती सात साल की प्रीती की शादी गत वर्ष हो गई थी तब बालकिशन पाँच दिन के लिए पेरोल पर बाहर आया था सुनीता के जाने के बाद वो इन्हीं सब बातों के विषय में सोच रहा था। जब उसे आजीवन कारावास की सजा हुई थी तब सुनीता की उम्र उन्तीस साल की थी वो चाहती तो दूसरी शादी कर सकती थी ऐसे अवसर भी आए थे दोनों बच्चों को रखने के लिए दादा दादी भी तैयार थे तथा नाना नानी भी पर सुनीता ने शादी के लिए सख्ती से मना कर दिया था। बालकिशन को आजीवन कारावास की सजा जो हुई ।उसकी घटना इस प्रकार है बालकिशन का पक्का दोस्त था श्यामलाल दोनों शाम को बैठकर शराब पीते थे दोनों ही कारपेन्टर थे। तथा साथ ही काम भी करते थे। श्यामलाल सुनीता को बुरी नजर से देखता था उसे छूने की कोशिश करता तो सुनीता घबरा जाती पर उसकी पकड़ में कभी नसीं आती थी। एक शाम की बात है सुनीता किसी रिश्तेदार के यहाँ जन्मदिन के समारोह में शामिल होने गई थी। घर पर शराब की बाटल लेकर बालकिशन और श्यामलाल शराब पी रहे थे। श्याम लाल को नशा ज्यादा चढ़ गया था । वो सुनीता को लेकर बहकी बहकी बातें करने लगा बालकिशन अपनी पत्नी सुनीता को बेपनाह चाहता था। उसने श्यामलाल को समझाया तो वो चुप हो गया लेकिन दो पेग और पीने के बाद फिर वैसी बातें करना लगा अब बात बालकैशन के बर्दाश्त के बाहर हो गई थी। वो श्यामलाल से भिड गया दोनों गुत्थम गुत्था हो गए बालकिशन कम नशे में था इसलिए वो श्यामलाल पर हावी हो गया उसने श्यामलाल का सिर दीवाल में दे मारा फिर काँच की बोतल तोड़कर उसने श्यामलाल के पेट में घुसा दी खून के फव्वारे छूट निकले। श्यामलाल के प्राण पखेरू उड गए थे। बालकिशन का यह देख सारा नशा उतर गया रात को एक बजे जब सुनीता घर में आई तो दंग रह गई दीवाल के सहारे श्यामलाल का शव खून से लथपथ पड़ा था। और बालकिशन सर पकड़ कर बैठा हुआ था । सुनीता ने जब इस विषय में पूछा तो उसने सारी बात बता दी सुनीता ने पुलिस को फोन कर बुला,लिया पुलिस उसे गिरफ्तार कर अपने साथ ले गई। अदालत में भी बालकिशन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया। जज साहब ने उसे आजीवान कारावास की सजा सुना दी। थी जेल में सारे कैदियों को भी इसकी खबर लग गई थी। अब प्रकाश विचाराधीन की जगह पर वास्तविक कैदी बन गया था थोडे समय में ही वह जेल मे॔ सबसे अधिक लोकप्रिय हो गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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