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कहानी: आदर्श शिक्षक का रिटायरमेन्ट

आदर्श शिक्षक  मनरेन्द्र  मिश्रा जी को रिटायर हुए पूरे दस वर्ष हो गए पर वे अभी भी स्कूल में अपनी सेवाएँ दे रहे थे। पूरे क्षेत्र में उनके जैसा अंग्रेजी पढ़ाने वाला शिक्षक नहीं था।  उनका सभी बहुत आदर करते थे आज उनका शिक्षक दिवस पर  विधायक जी  बाबू वर्मा ने   भव्य समारोह आयोजित  कर सम्मान किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में उनके शिष्य  उपस्थित थे। 
नरेन्द्र जी ने  पूरे बयालीस साल तक नौकरी की थी जिसमें बत्तीस साल तो  जिले के दुर्गम गाँव  पाटन पुर में सेवाएँ दी थीं। वहाँ से विधायक जी करन वर्मा की पहल से उनका तबादला शहर के इस स्कूल में हुआ था । जहाँ दस साल नौकरी के बाद वे रिटायर हो गए थे। उनके रिटायरमेन्ट के समय स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने वाले  शिक्षक की कमी थी वार्षिक परीक्षाएँ    सिर पर थीं ऐसे में प्रथानाध्यापक ने उनसे परीक्षा  संपन्न होने तक उनसे विद्यालय मैं अध्यापन करने का आग्रह किया था जिसे उन्होंने हर्ष के साथ में स्वीकार कर लिया था । तब से वे बिना एक भी नागा किए लगातार  दस वर्षों  से उस स्कूल में पढ़ा रहे थे। उन्हें कोई बीमारी नहीं थी वे सदैव खुश रहते  थे।  बच्चे उनका बहुत आदर करते थे। वे थे तो बी ए पास ही लेकिन कॉलेज  के एम ए इंग्लिश के छात्रों  को भी पढ़ाते थे  किसी से एक रुपया भी नहीं लेते थे कहते थे मेरा खर्च ही क्या है?  पेन्शन में मेरा गुजारा आराम से चल रहा है। वे सादगी की मूर्ति थे। पाटनपुर गाँव में वे  बावन  साल पहले आए थे तब ये स्कूल  पाँचवी तक था वे उस गाँव में बत्तीस साल रहे थे इस  बीच वो  स्कूल हायर सेकेण्डरी   स्कूल बन  गया था   क्षेत्रीय  विधायक बाबू वर्मा ने एक दिन उनसे कहा सर आपने मुझे इसी गाँव के स्कूल  में पढ़ाया था आपने अनमोल विद्या  के साथ जो चरित्र  वान बनाया था  उसकी वजह से मैं  लगातार  चौथी बार  विधायक बना हूं। अब आपके बच्चे बड़े हो गए हैं।  आप कहें तो आपका तबादला मैं  आपकी  मर्जी के अनुसार शहर के स्कूल  में करा दूं।  सुनकर वो कुछ नहीं बोले  तो उनके मौन को  उनकासहमति  समझकर    विधायक जी ने  उनका  तबादला शहर में करा  शहर में आकर उन्होंने अपने बेटे  विकास को  पढ़ाया  उसकी नौकरी लगवाई लड़की की  शादी कराई।  घर का मकान बनवाया।  वे अब उसमें खुशी  से रह रहे थे।  रिटायर मेन्ट के पहले ही वे अपने परिवार  के दायित्वो से मुक्त  हो गए थे। और एक चित् होकर बच्चों को पढ़ा रहे थे।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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