सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: रिटायरमेंट के बाद

रिटायर मेन्ट के आठ साल बाद भी राकेश श्रीवास्तव एकदम चुस्त दुरूस्त थे उन्हें देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वे सत्तर वर्ष के हो गए हैं पेंशन और म्यूजिक से उनकी मासिक आय   उनकी वेतन से भी ज्यादा थी। वे एक प्राइवेट स्कूल में म्यूजिक टीचर का काम भी कर रहे थे। उससे उन्हें हर माह  धनराशि प्राप्त हो रही थी। 
राकेश जी हाईस्कूल में संस्कृत के टीचर थे  तीस साल पहले वे अपना संगीत का शौक पूरा करने के लिए हारमोनियम खरीद कर लाए थे पर जब वे उसे प्ले करने लगा तो वो उन्हे बहुत कठिन लगा।  कुछ दिनों तक वो हारमोनियम कपडे में बँधकर रखा रहा  लेकिन एक दिन उनकी किराने की दुकान पर उनके पुराने परिचित संतोष से  भेंट हुई।  संतोष ने बताया कि वो शाम को संगीत महाविद्यालय में म्यूजिक की क्लास अटेण्ड करता हूँ जब राकेश जी ने भी म्यूजिक सीखने की बात कही तो  संतोष ने कहा अभी प्रवेश चल रहे हैं चाहो तो एडमीशन  ले लो सांध्यकालीन कउक्षाएँ लगती हैं। और इस तरह राकेश जी ने बी म्यूज में प्रवेश ,ए लिया तीन साल में तो वे संगीत में माहिर हो चुके थे कंठ स्वर भी उनका अच्छा था पर  उसे उन्होंने अपना प्रोफेशन कभी नहीं बनाया था।  कभी हारमोनियम पर वे रियाज जरूर कर लेते थे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पूरा समय  म्यूजिक को दिया पर कब तक घर में रहे ।एक दिन वो कॉलोनी   के मंदिर पर आए  वहाँ उनके और भी परिचित मिल गए आपस में उनकी खूब बातें हुईं तभी आरती का समय हो गया आरती के बाद उन्होंने मंदिर के हारमोनियम  पर जब अपने मधुर कंठ से दो भजन गाए तो सब  मंत्र मुग्ध हो गए इसके बाद तो उनका रोज का क्रम हो गया मंदिर में जाने का तथा आरती के बाद भजन गाने का  वहीं मंदिर में मानस मंडल के संचालक दिनेश वर्मा जी ने उनसे कहा हमारे मंडल में शामिल होकर हारमोनिय बजाओ  हम आपको हर कार्यक्रम के एक हजार रुपये देंगे। वे इसके लिए  तैयार हो गए फिर तो उन्हें रोज  हारमोनियम पर भजन गाने और हारमोनिय बजाने का मौका मिलने लगा।  कॉलोनी में दीप्ती कान्वेन्ट स्कूल में  उन्हें म्यूजिक  टीचर की नौकरी भी मिल गई थी।यह सब करते हुए  उन्हें आठ साल  बीत गए थे।  और उनका हुनर दिनोंदिन  निखरता जा रहा था।  हरिसेवा में उनका समय आराम से गुजर रहा था। 
*****
प्रदीप कश्यप °°


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...