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कहानी: सेकेन्ड हैन्ड कार

रमेश जी ने जबसे सेकेण्ड हैन्ड कार खरीदी थी तभी से परेशान थे वे अब तक उसमें साढ़े चार लाख रुपये खर्च कर चुके थे फिर भी वो अक्सर धोखा दे जाती थी। जिसके कारण वे ऑफिस में लेट पहुँचते और साहब की डाँट खाते थे। साल  भर पहले उन्होंने वो कार दो लाख रुपये में खरीदी थी। साढ़े चार लाख रुपये खर्च करने के बाद भी कोई उसके पचास हजार रुपये से ज्यादा देने को तैयार नहीं था। छः लाख का नुक्सान कैसे उठाएँ लेकिन बार बार परेशान होने  से बचने के लिए आखिर  उन्होंने वो कार पचास हजार रुपये  में बेच ही दी बेचने के बाद उन्हें  खुशी ही हुई क्योंकि वे उससे तँग आ चुके थे । नई कार साढ़े आठ लाख रुपये में आ रही थी कुल मिलाकर  पन्द्रह लाख रुपये की चपत लग रही थी। उनके एक गलत निर्णय का  यह नतीजा था जो उन्हें बहुत अखर रहा था।
साल भर पहले तक वे मोटर सायकिल से ऑफिस जाते थे पर दो महीने के भीतर तीन एक्सीडेन्ट होने पर वे घबरा गए हालाँकि दुर्घटना में उन्हें ज्यादा चोट नहीं आई थी पर उनके मन में डर बैठ गया था। किसी दिन ज्यादा चोट आ गई तो क्या होगा।  यही सोचकर वे कार के शोरूम पर नई कार खरीदने  गए थे नई कार साढ़े सात लाख रुपये में मिल रही थी ये कीमत उन्हें कुछ  ज्यादा लगी उनके एक परिचित ने उनसे जाने किस जन्म का वैर निकाला उनसे कहा एक सैकेण्ड कार बिकाऊ है  कार अच्छी है मात्र दो लाख में मिल रही है रमेश उसकी बातों में आ गए उन्होंने वो कार देखी देखने में वो उन्हें ठीक लगी फिर उन्हें उस परिचित की बात पर भरोसा भी था इसलिए उन्होंने दो लाख रुपये में वो कार खरीद ली चार दिन तक तो वो कार ठीक चली पाँचवे  दिन वे आधे रास्ते में जो चलते चलते बंद हुई तो फिर स्टार्ट नहीं हो सकी  मेकेनिक को बुलाकर उसे  वर्कशॉप पहुँचाया मेकेनिक ने पूछा ये कार आपने कितने में खरीदी। रमेश जी ने कहा दो लाख रुपये में  मैकेनिक बोला किसने दिलवाई वे बोले एक परिचित ने मैकेनिक कहा आपकी क्या उस परिचित से कोई दुश्मनी थी क्या वे बोले नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी मैकेनिक ने कहा  इस कार की रिसेल वेल्यू पचास हजार रुपये से अधिक नहीं है।  आपको उस परिचित ने तगड़ी चपत लगाई है यह कार बारह साल पुरानी है तीन साल बाद आप इस कार को नही चला सकेंगे आपको ये स्क्रेप में देना पड़ेगी।  मैकेनिक ने वो कार ठीक तो कर दी पर कोई गारंटी नहीं ली ये कब तक चलेगी।  रमेश जी को उस दिन ऑफिस से छुट्टी लेना पड़ी थी जब घर पहुँचे तो पत्नी ये बात सुनकर बहुत दुखी  हुई।  रमेश जी को पता चला कि उस परिचित ने बीस हजार  रुपये की दलाली के बदले में यह कार  उन्हें टिपा दी थी। पत्नी बोली आज के जमाने में कोई भरोसे के लायक नहीं है। हर आठ पन्द्रह दिन में वो कार खराब हो जाती वे मैकेनिक से उसे सुधरवाते और वो कुछ दिन चलकर फिर बिगड़ जाती थी। जब वो उसे ठीक करवाते तो  उनकी पत्नी उन्हें उलाहना जरूर देती थी कहती बड़ा कार रखने का शौक था अब करो इस खटारा से अपना शौक पूरा। पहली कार का उनका तजुर्बा अच्छा साबित नहीं हुआ था। तंग आकर आखिर उन्होंने वो कार पचास हजार रुपये में ही बेच दी और बेचकर खटारा कार से मुक्ति पा ली थी। इस लिए आज वो थोड़े खुश दिखाई दे रहे थे अब उन्होंने नई  कार खरीदने का मन बना लिया था। कम से कम चार साल तक तो उसमें कोई काम  निकलेगा नहीं। रोज रोज साहब की डाँट से भी निजात मिलेगी।

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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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