पाँच सौ एकड़ जमीन के मालिक होने के बाद भी अपने जीवन का अधिकाँश समय लकड़ी बेचकर व्यतीत करने वाले सीधे सच्चे इंसान राव भूपेन्द्र सिंह का एक सौ दस वर्ष की उम्र में आज निधन हो गया था वे अपने पीछे तीन सौ सदस्यों का भरापूरा परिवार छोड़कर गए थे । उनका बड़ा पुत्र देवेन्द्र सिंह जो प्रेमपुरा गाँव के सबसे दबंग व्यक्ति थे उन्होंने पिता को मुखाग्नि दी थी। देवेन्द्र सिंह ने मात्र बाइस वर्ष की उम्र अपने पिता की पूरी पाँच सौ एकड़ जमीन मुक्त करा ली थी जो कब्जा कर के बैठे थे उनका वो हाल किया था कि वे सिर उठाने लायक भी नहीं बचे थे उनकी हवेली राव की हवेली के नाम से जानी जाती थी जिसमें छः सौ छोटे बड़े कक्ष थे पूरी हवेली चालीस एकड़ जमीन में फैली हुई थी जिसमें बड़े गोदाम जैसे हॉल थे । जिनमें हजारों क्विंवटल अनाज भरा रहता था करोड़ों रुपयों का उनका करोबार था भूपेन्द्र सिंह की अंतिम यात्रा में दस हजार लोग शामिल हुए थे चंदन की लकड़ियों से उनका दाह संसार किया गया था। पिछले पचास वर्षों से वे संतों जैसा जीवन व्यतीत कर रहे थे।
राव भूपेंन्द्र सिंह नब्बे वर्ष पूर्व इस गाँव में आए थे उनके पिताजी राव राघवेन्द्र सिंह नवाब इकबाल खान साहब के अंगरक्षक थे। तथा उनके सबसे विश्वनीय वफ़ादार भी एक बार वे नवाब साहब के साथ जंगल के बीच से गुजर रहे थे तभी शेर ने हमला कर दिया राघवेन्द्र और शेर की भिड़ंत हो गई जिसमें राघवेन्द्र जी ने शेर को तो मार दिया पर वे खुद भी नहीं बच सके उनका दुखद निधन हो गया नवाब साहब को उनके निधन पर अपार दुख हुआ राव भूपेन्द्र सिंह जी की उम्र उस समय उन्नीस वर्ष की थी उनका हाल ही में विवाह हुआ था वे शाँत स्वभाव के इंसान थे नवाब साहब ने उनके कंधे पर हाथ रखा और आश्वस्त किया नवाब साहब ने प्रेमपुरा गाँव की तालाब किनारे की पाँच सौ एकड़ उपजाऊ जमीन उनके नाम कर दी। साथ ही चालीस एकड़ जमीन पर बना एक महल भी उन्हें दे दिया कुछ चाँदी के एवं सोने के सिक्के भी उन्हें दिए गए थे नवाब साहब की छत्र छाया में उन्होंने पन्द्रह वर्षों तक उस जमीन पर खेती की फिर देश में आजादी की लड़ाई के लिए संघर्ष शुरू हो गया था उसमें उनकी सारी जमीन पर प्रेमपुरा गाँव के एक ही जाति के लोगों ने कब्जा कर लिया नवाब साहब पाकिस्तान चले गए थे उनका सरपरस्त कोई नहीं था। वैसे भी उनके कोई संतान नहीं हुई थी। इसका फायदा गाँव वालों ने उठाया था। संतान न होने से वे बड़े दुखी थे। उनके पास दो बैल और गाड़ी बचे थे वे रोज सुबह बैलगाड़ी लेकर जंगल की ओर जाते तथा सूखी जलाऊ लकड़ियाँ दोपहर को गाड़ी में भरकर लाते उन्हीं को बेचकर वे अपना गुजारा कर रहे थे।एक दिन जंगल में उन्हें संत भेष में एक वैद्य जी जड़ी बूटी की खोज करते हुए मिले। भूपेन्द्र सिंह जी ने उन्हें भोजन कराया तथा सुराही का ठंडा जल पिलाया वे भूपेन्द्र सिंह की मस्तक की रेखाएँ तथा हाथ की रेखाएँ देखकर बहुत कुछ जान गए और जब उन्होंने सारी बातें बताना शुरू की तो भूपेन्द्र सिंह चकित हो गए फिर बोले तुझे में ऐसी बूटी देकर जाऊँगा जिससे तेरे घर हर वर्ष एक संतान का जन्म होगा तेरी सारी जमीन भी तुझे मिल जाएगी तेरे यहाँ जो सबसे पहले लड़का होगा उसका नाम देवेन्द्र रखना उसके नाम का डंका चारों तरफ बजेगा वो बड़ा होकर अपनी सारी जमीन हासिल कर लेगा फिर तुमसे अमीर चालीस कोस में कोई दूसरा न होगा इसके बाद बाबा आधे घंटे में पोटली में भरकर बूटी लाए एक प्रकार की बूटी उन्हें दूध में घोलकर खाना थी तथा दूसरे प्रकार की बूटी उनकी पत्नी चंदा को शहद में मिलाकर खाना थी बूटी का सेवन महीने में एक बार करना था। कामना पूरी होने पर बूटियों को नदी में विसर्जित करना था। भूपेन्द्र सिंह जी ने वैसे ही किया जो बाबा ने बताया था बूटी ने अपना चमत्कारी असर दिखाया चंदा गर्भवती हो गई थी उसको जो लड़का हुआ उसका नाम उन्होंने देवेन्द्र रखा। इसके बाद हर साल उन्हें एक बेटा प्राप्त होता रहा ग्यारह बेटों के बाद कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम पूनम रखा गया कन्या के जन्म के बाद चंदा की रजो निवृति हो गई भूपेन्द्र सिंह ने वो बूटी नदी में विसर्जित कर दी। देवेन्द्र सिंह ने सोलह वर्ष की आयु में बारहवीं पास कर ली और उन्नीस वर्ष की आयु में बी ए स सी स्पोर्टस का राष्ट्रीय चैंपियन बना और छात्र संघ का अध्यक्ष भी। वो शहर का सबसे शक्तिशाली हस्ती बन गया था उसके मन में अपने पिता की जमीन हासिल करने की बड़ी इच्छा थी उन्नीस वर्ष की आयु में वो अपने साथ पचपन चुने हुए साथियों को लेकर आए तीन दिन में अपनी हवेली सहित पूरी चालीस एकड़ जमीन उन्होंने हासिल कर ली थी उनके दस अन्य भाई भी बड़े हो रहे थे वे सब देवेन्द्र सिंह ही की तरह निडर और दबंग थे रोज ही गाँव में संघर्ष होता देवेन्द्र सिंह पहुँच वाले इंसान थे वे हर तरह से गाँव वालों पर भारी पड़ते थे एक जाति विशेष की आबादी गाँव में साठ प्रतिशत थी दूसरी तरफ सभी छः जाति के लोगों की आबादी चालीस प्रतिशत वे सब गुलामों से बदतर जीवन जी रहे थे अब वे देवेन्द्र का साथ दे रहे थे। उधर विरोधी अपना वर्चस्व खत्म करने को तैयार नहीं थे एक रात पाँच सौ लोग अस्त्र शस्त्र लेकर देवेन्द्र सिंह की हवेली की ओर रात के दो बजे बढ़े उनका इरादा पूरे परिवार को जान से मारने का था लेकिन देवेन्द्र सिंह भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था उसने कुछ ऐसी चाल चली की हवेली पर आने के दो किलोमीटर दूर ही उनमें आपस में लड़ाई हो गई जिसमें पन्द्रह लोग मारे गए इसके बाद देवेन्द्र सिंह ने पुलिस को सहयोग करते हुए सारे आरोपियों को सबूत और गवाह सहित पकड़वा दिया सत्तर लोग पकड़ाए थे जिन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई ये सब वे लोग थे जिनके अत्याचारों से आसपास के बीस गाँव के लोग परेशान थे अब देवेन्द्र सिंह जी की पूरी पाँच सौ एकड़ जमीन उन्हें मिल गई थी प्रेमपुरा गाँव के वे निर्विरोध सरपंच बन गए थे तब से लेकर आज तक देवेन्द्र सिंह या उनके परिवार के लोग ही सरपंच बनते रहे थे चालीस एकड़ में देवेन्द्र सिंह जी ने अपनी भव्य हवेली बनवाई थी जिसमें सभी भाई हिलमिलकर रहते थे। राव भूपेन्द्र सिंह जी इन सब बातों से दूर हो गए थे और उन्होंने भगवान की भक्ति में अपना मन लगा लिया था। आज वे इस नश्वर दुनिया को छोड़कर चले गए थे।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें