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कहानी: बंजर ज़मीन

दस साल पहले बँटवारे में मिली बंजर जमीन को किसान ज्ञानसिंह और उनकी पत्नी ने लगातार कठोर परिश्रम कर के उपजाऊ जमीन में बदल लिया था उनकी पूरी जमीन सिंचित थी  और वे साल भर में तीन फसल ले  रहे थे। जबकि ज्ञानसिंह के बड़े भाई मानसिंह की हालत इसके विपरीत थी अत्यंत उपजाऊ जमीन होने के बाद भी वे बामुश्किल एक ही फसल उससे ले पाते थे उन्हें मजदूरी कर अपना जीवन यापन करना पड़ रहा था।
दस वर्ष पूर्व उनकी जमीन का बँटवारा हुआ था उनके पिताजी रोशनलाल के पास  बीस एकड़ जमीन थी  जिसमें दस एकड़ जमीन पूरी तरह बंजर थी तथा बीच में एक ऊँचा टीला था उसके पार दस एकड़ उपजाऊ जमीन थी बँटवारे के पहले ज्ञानसिंह शहर में मजदूरी करते थे भवन निर्माण कार्य में उन्होंने भजदूरी से शुरूआत की थी और बाद में काम सीखकर वे राजमिस्त्री बन गए थे इससे उनकी मजदूरी दुगुनी हो गई थी ज्ञानसिंह अपने बड़े भाई मानसिंह की बहुत इज्जत करते थे खेती का काम भानसिंह करते थे और ज्ञान सिंह मजदूरी का उस समय दोनों भाई कुँवारे थे । खेती से ज्यादा आय होती नहीं थी ज्ञानसिंह जो हाड़तोड़ मेहनत कर रुपया कमाकर लाते वो अपनी  माँ  रेशम बाई को दे देते थे। उन्हीं पैसों  को जमा करके जेवर बनवाए गए थे उन्हीं रुपयों को बड़े भाई की शादी में खर्च किया गया था इसके पहले  पक्का घर बनवाया गया था वो भी ज्ञानसिंह की कमाई से ज्ञान सिंह ने घर बनाने में मजदूर और मिस्त्री का काम किया था घर बनने के बाद मानसिंह की शादी हुई थी पक्के घर  के बगल में ही पुराना कच्चा घर बना हुआ था जिसमें जानवरों को रखा गया था। मानसिंह की शादी के तीन साल बाद ज्ञान सिंह की शादी हुई। शादी के बाद भी  ज्ञानसिंह ने राजमिस्त्री का काम बंद नहीं किया था।  मानसिंह हर साल कहते खेती में घाटा हो गया जिसकी भरपाई ज्ञानसिंह जी के रुपयों से होती थी।  ज्ञानसिंह की शादी के पाँच साल बाद उनके पिता रोशनलाल का निधन हो गया निधन के  बाद मानसिंह के मन में खोट आ गई  उन्होंने पूरी बीस एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया और ज्ञानसिंह से झगड़ा कर दुश्मनी कर ली ज्ञानसिंह को लगा पूर्वजों की जमीन कैसे छोड़ दें उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया अदालत ने ज्ञानसिंह जी  के पक्ष में फैसला किया हारकर मानसिंह ने जमीन का बँटवारा करने की बात कही उसमें मानसिंह ने खुलकर बेईमानी की  सारी उपजाऊ और सिंचित जमीन खुद ले ली और ज्ञानसिं को  बंजर और सूखी जमीन दे दी ।ज्ञानसिंह की माँ रेशम पे भी मानसिंह का साथ दिया ज्ञानसिंह की कमाई के बने सारे  गहने  माँ ने  मानसिंह की पत्नी को दे दिए। कच्चा मकान ज्ञानसिंह को मिला और पक्का मकान मानसिंह ने ले लिया। ज्ञान सिंह जी ने इसमें ही संतोष कर लिया भाई से विवाद करना  ज्ञानसिंह जी ने उचित नहीं समझा।  समय बदला  ज्ञानसिंह  मेहनती  इंसान थे अपने  जमीन के एक हिस्से को चिन्हित कर उन्होंने कुदाली फावड़ा उठाया और उसकी खुदाई में जुट गए उनकी पत्नी सरिता ने भी कंधे से कँधा मिलाकर काम किया था  आठ महीने की मेहनत रंग लाई उन्होंने चालीस फीट  गहरा कुआँ खोद दिया था उसमें भरपूर मात्रा में पानी निकला इसके बाद ज्ञान सिंह जी ने ईंट बनाई  लकड़ी  जमीन को तोड़ते समय जो निकली थी उसको भट्टी में लगाकर ईंटों को पकाया आधी ईंट ज्ञानसिंह ने बेच दी उन पैसों से चूना और नदी से निकाली रेत इकठ्ठा कर ज्ञानसिंह जी ने कुआँ पक्का कर दिया। दो महीने की कड़ी मेहनत से  बंजर जमीन को ज्ञानसिंह जी ने उपजाऊ जमीन में बदल दिया।  पिर बरसात आ गई ज्ञानसिंह जी ने उसमें खरीफ की फसल बो दी। उनकी मेहनत और किस्मत ने साथ दिया  उसमें अच्छी पैदावर हुई देखकर आसपास के सब किसान चकित हो गए। जबकि मानसिंह केखेत में फसल का उत्पादन कम हुआ। रवि की फसल में जहाँ ज्ञानसिंह के खेत में दो सौ क्विंटल गेहूँ हुए वहीं मानसिंह के खेत से  चालीस क्विंटल गेहूँ की ही पैदावर हुई मानसिंह के टयूब वेल ने साथ  नहीं दिया  जबकि ज्ञानसिंह के कुए में भरपूर पानी रहा ज्ञान सिंह ने गर्मी मे मूँग की फसल बो दी उसमें  अस्सी क्विटल मूँग उत्पन्न हुई  जो  सात लाख रुपये में बिकी उन रुपयों से तथा पी एम आवास के पैसों से कुछ गेहूँ और सब्जी बेचकर हासिल हुए रुपयों से ज्ञान सिंह जी ने अपने कच्चे मकान के स्थान पर सर्वसुविधायुक्त पक्का मकान बनवा लिया।  उनके मकान के सामने मानसिंह का मकान फीका पड़ गया किस्मत ज्ञानसिंह जी का अब भी साथ दे रही थी ज्ञानसिंह जी के खेत के किनारे से हाईवे निकल गया जिससे उनकी जमीन की कीमत बीस गुना बढ़ गई  मान सिंह यह देखकर ज्ञानसिंह से ईर्ष्या करने लगे थे पर इससे उन्हें सिवाय हताशा के और कुछ नहीं मिल रहा था। मानसिंह जी की आर्थिक स्थिति दिन ब दिन खराब होती जा रही थी और ज्ञान सिंह की गिनती गाँव के संपन्न किसानों में होने लगी थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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