सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: दूरियां

शादी के साठ साल बाद भी मंजू और किशनलाल के दिलों के बीच की दूरियाँ कम नहीं हुई थीं आज किशन लाल इस दुनिया को छोड़ कर चले गऐ थे। वैसे उनका भरापूरा परिवार था पर पति पत्नी के बीच वैसी गहरी मुहब्बत नहीं थी जो होना चाहिए थी।पति के मरने के बाद मंजं की  आँखों में आँसू तो आए रोई भी पर वे सब दिखावे के ही रहे।
साठ साल पहले जब मंजू की किशन लाल से शादी हुई तब किशनलाल की उम्र बीस साल की थी और मंजू की अठारह साल की किशनला की यह दूसरी शादी थी पहली शादी उनकी उन्नीस वर्ष की आयु में रागिनी से हुई थी रागिनी तब अठारह वर्ष की थी  किशनलाल की नौकरी तहसील कार्यालय में पेशकार के पद पर तभी लग गई थी जब उन्होंने हाई स्कूल की परीक्षा पास की थी। तब उनकी उम्र अठारह वर्ष की थी नौकरी लगने के बाद किशनला जी की शादी रागिनी से हो गई थी रागिनी के पिता पटवारी थे ।रागिनी  और किशनलाल आठ महीने साथ साथ रह सके थे रागिनी सुंदर सुशील गौर वर्ण की थी उसने आठवीं पास की थी। किशनलाल उन्हें बहुत चाहते थे।  रागिनी जब मायके में थी तब एक रात उनके पेट में तीव्र दर्द हुआ उस जमाने में अस्पताल में आज जैसे चिकित्सा उपकरण नहीं थे उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था ग्लूकोज की बॉटल चड़ रही थी इंजेक्शन और गोलियाँ दे दी गई थीं पर दर्द कम नहीं हो रहा था डॉक्टरों को भी बीमारी पकड़ में नहीं आ रही थी  आखिर रात को तीन बजे रागिनी ने आखिरी साँस ली  उनकी मौत की खबर जैसे ही किशनलाल जी को लगी वे बदहवास हो गए अभी छः दिन पहले ही तो वे उनसे मिलकर आए थे। रागिनी के अंतिम संस्कार के बाद  वे गुमसुम रहने लगे थे  किशनलाल के बड़े भाई सोहनलाल जो  स्कूल में शिक्षक थे उनसे अपने छोटे भाई का दुख नहीं देखा गया उन्होंने उनकी दूसरी शादी कराने का विचार किया जो लड़की उनके लिए पसंद की उसका नाम मंजू था वह न उतनी सुंदर थी न   गौरी छरहरी वह भारी बदन की साँवली लड़की थी। किशनलाल जी ने शादी करने से साफ इंकार कर दिया था। भाई से बोले थे मैं अब शादी नहीं करना चाहता पर बड़े भाई की जिद के आगे उनकी एक न चली तब लड़के द्वारा शादी के पहले लड़की देखने का चलन नहीं था शादी के दौरान ही वे मंजू को देखकर अनमने हो गए थे वो रागिनी की तुलना में कुछ भी नहीं थी। शादी के बाद उन्होंने मंजू से बहुत दिनों तक बात तक नहीं की थी।  उधर मंजू की  सगाई  झाँसी के  व्यवसायी के लड़के किशोर से होने वाली थी पर बाद में  उन्होंने मना कर दिया था मंजू ने किशोर को एक विवाह समारोह में देखा था  और पिता ने कहा था कि इससे तेरी शादी की चर्चा चल रही है। मंजू को किशोर पसंद भी था। पर भाग्य ने साथ नहीं दिया और मंजू की शादी किशनलाल से हो गई।  इस मनमुटाव के कारण किशनलाल को तीन साल तक संतान का सुख नहीं मिला तीन साल बाद मंजू ने बेटे को जन्म दिया जिसका नाम कुलदीप रखा गया  कुलदीप के जन्म के दो साल बाद छोटे बेटे माधल का जन्म हुआ उसके तीन साल बाद कुसुम पैदा हुई बाद का सारा वक्त बच्चों की परवरिश करने में उन्हे पढा लिखाकर योग्य बनाने फिर उनकी शादी करने में बीत गया फिर नाती पोतों में भन रम गय साठ साल में जब वे रिटायर हुए तब उनका अधिकतर समय घर में बीतने लगा।  लेकिन वो इसका मजा नहीं ले पाए मंजू और उनके बीच रोज झगडा होने लगा।  उनमें आपस में बातचीत बहुत कम होती थी जब किशनलाल की मौत हुई उस समय  मँजू से उनकी छः महीने से बोलचाल बंद थी।  अस्पताल में जब उनकी मौत हुई तब मंजू उनके पास नहीं थी एक दिन पूर्व वो उनसे मिलने गई थीं तब वे वेन्टलेटर पर थे  मंजू से   सुब्ह तक रुकने का उन्होंने इशारा भी किया था फिर भी वे अस्पताल में नहीं  रुकी थीं। और घर आ गई थीं दूसरे दिन किशनलाल जी की मृत देह  ही  शव वाहन में घर आई थी।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...