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कहानी: किस्मत थोड़ी मेहनत ज्यादा

आइ ए एस अवार्ड मिलने के बाद कलेक्टर  बन कर अनूप नगर  आए रघुवीर सिंह जब अपने पहले दौरे पर तहसील कार्यालय  दुर्गा नगर का निरीक्षण करने पहुँचे तो वहाँ उनका क्लास फेलो  आशीष  मिला आशीष वहाँ पटवारी के पद पर कार्यरत था। आशीष उन्हें देखकर झेंप गया था रघुवीर ने कहा अभी तक प्रमोशन नहीं हुआ वो बोला दो बार सस्पेण्ड हो गया था सी आर भी अच्छी नहीं थी इसलिए प्रमोशन नहीं हो सका । निरीक्षण करके शाम को रघुवीर बंगले पर आए थे उन्होंने अपनी पत्नी  शारदा जो कॉलेज में प्रोफेसर थी उससे आशीष का जिक्र किया था शारदा आशीष को अच्छी तरह जानती थी ।
बारह वर्ष पहले  आशीष और रघुवीर ने एक ही कॉलेज से एम ए किया था इसके बाद दोनों नौकरी की तलाश में जुट गए थे  शारदा तब रघुवीर की गर्ल फ्रेन्ड थी।  पटवारी के पद पर  रघुवीर और आशीष दोनों ने ही एप्लाई किया था चयन परीक्षा में भी दोनों बैठे थे आशीष ने मन लगाकर परीक्षा की तैयारी की थी जबकि रघुवीर  बिना तैयारी के ही परीक्षा देने चला गया था।  जिसका परिणाम ये हुआ कि आशीष का चयन  पटवारी के पद पर हो गया  और रघुवीर  का नहीं हुआ रघुवीर के चयन नहीं होने का  सबसे ज्यादा दुख शारदा को  था क्योंकि शारदा के पिता जगदीश जो सरकारी दफ्तर में बड़े बाबू थे वे चाहते थे कि शारदा की शादी सरकारी नौकरी करने वाले लड़के से करें।  इसके पहले रघुवीर को देखने लड़की वाले आए थे लड़की का नाम अंजलि था। उन्हें रघुवीर पसंद तो आ गया था पर उनका भी यही कहना था कि वे अपनी लड़की की शादी सरकारी नौकरी करने वाले लड़के से करेंगे।  रघुवीर की रुचि अंजलि में नहीं थी क्योंकि वो तो शारदा से शादी करना चाहते थे । इधर शारदा के पिता को जब पता चला कि आशीष को पटवारी पद पर नियुक्ति मिली है तो वे उसके घर शारदा से शादी का प्रस्ताव लेकर गए  लेकिन दहेज को  लेकर बात अटक गई और वो रिश्ता नहीं हो सका । अंजलि के पिता ने मुँह माँगा दहेज दे दिया तो अंजलि  की शादी आशीष से हो गई। शादी के बाद अंजलि की नौकरी भी लग गई थी वो बैंक में क्लर्क बन गई थी। अंजलि और आशीष अपने आपको बड़ा खुशकिस्मत समझ रहे थे।  इधर शारदा और रघुवीर अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे। रघुवीर ने पी एस सी  का फार्म भरा था। शारदा ने रघुवीर से मन लगाकर परीक्षा की तैयारी करने की बात कही तो रघुवीर बोला  खाली मन लगाने से क्या होता है किताबों और कोचिंग का होना भी तो जरूरी है। और मेरे पास पैसे नहीं है  दूसरे दिन शारदा ने उसे अपने पास की दो तौला की सोने की चैन लाकर दी और कहा कि इसे बेचकर किताबें और कोचिंग की व्यवस्था कर लेते  हैं मुझे तुम पर पूरा विश्वास है।  रघुवीर हिचकिचाया तो शारदा बोली ये चैन मुझे नानी ने मेरे सोलहवें जन्मदिन पर दी थी।  और मेरे पास ही रहती है इसे बेचने में कोई हर्ज नहीं है। शारदा की जिद  के आगे रघुवीर की एक नहीं चली उसके कोचिंग और किताबों की व्यवस्था हो गई थी। अब रघुवीर के जीवन का एक ही लक्ष्य रह गया था पी एस सी ब्रेक करना  दो साल की कड़ी मेहनत रंग लाई  और उसका चयन डिप्टी कलेक्टर के पद पर हो गया डिप्टी कलेक्टर बनते ही  उसकी शादी के लिए रिश्तों की भरमार हो गई कुछ लड़की वाले तो ऐसे भी थे जो दस करोड़ रूपये नगद तथा दो किलो सोना तक दहेज में देने को तैयार हो गए पर रघुवीर ने सबके ऑफर ठुकरा  दिए रघुवीर के पिताजी भी लोभ में नहीं आए। शारदा की माँ को पता था कि शारदा रघुवीर से शादी करना चाहती है  एक दिन उसने शारदा के पिता से कहा कि क्यों न शारदा की शादी रघुवीर से कर दें। सुनकर वे बोले मेरी हैसियत इतनी नहीं है कि मैं करोड़ो रुपये का दहेज दे सकूँ। शारदा की माँ बोली आप बात करके तो देखो वो लालची नहीं है अपने ही शहर का लड़का है अपनी बेटी भी कोई कम नहीं है।  उसकी बात मानकर  वे दोनों शारदा का रिश्ता लेकर रघुवीर के घर गए वे रघुवीर के पिताजी से मिलकर बहुत खुश हुए दूसरे दिन वे शारदा को देखने आए देखते ही उन्होंने शारदा को अपने बेटे के लिए पसंद कर लिया।  सादगी से दोनों की शादी हो गई  शारदा ने यु जी सी परीक्षा क्लीयर कर पी एच डी की और सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर बन गई। रघुवीर एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी सिद्ध हुए  यही कारण रहा कि उन्हें आई ए एस का अवार्ड मिला और वे कलेक्टर बन गए थे। पटवारी बनकर अहंकार करने वाले आशीष की हैसियत उनके सामने कुछ नहीं थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप


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