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कहानी: माँ की सेवा

आनंद मोहन  की आयु  अस्सी वर्ष की हो गई थी उनकी माँ शारदा सौ वर्ष की होकर भी भली चंगी थी वे बीस वर्ष से माँ के साथ रह रहे थे माँ की देखभाल करते थे तथा जितना बन सके उतनी उनकी सेवा करते थे। दोनों माँ बेटे बूढ़े हो चुके थे पर माँ की निगाह मैं तो बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए बच्चा ही होता है आज जब  शारदा अपने  अस्सी वर्षीय बेटे  की नजर उतार रही थीं तब उनके चेहरे पर अपूर्व ममता की झलक थी। आनंद मोहन के मित्र शिव प्रताप भी यह दृश्य देख रहे थे । माँ के नजर उतारने के बाद आनंद मोहन अपने मित्र से बोले बीमार होने पर कभी हल्की हरारत होने पर माँ मेरी नजर जरूर उतारतीं हैं भले ही मैं डॉक्टर से कितना ही मँहगा इलाज क्यों न करा लूँ माँ को ऐसा कर के  संतोष मिलता है तो मुझे भी अच्छा लगता है।
ऐसा नहीं था  कि आनंद मोहन के अपने बाल बच्चे बीवी  न हों  उनका भरापूरा परिवार था फिर भी वे माँ के पासे ही रहते थे। आनंद मोहन के पिताजी  का निधन हुए पच्चीस वर्ष हो गए थे जब उनके पिताजी जीवित थे तब  वे दोनों रहते थे आनंद मोहन तब नौकरी करते थे और अपनी पत्नी तथा बच्चों के बीच रहते थे। पिता की मृत्यु के बाद आनंद मोहन अपनी माँ का ज्यादा ध्यान रखने लगे थे इस बात से आनंद मोहन की पत्नी  रीना उनसे नाराज रहती थी। पर वे उसकी परवाह नहीं करते थे रीना ने अपने दोनों बच्चों को भी दादी के खिलाफ कर रखा था रीना की माँ  गिरिजा उन्हीं के साथ रहती थी रीना को गिरिजा उल्टी सीधी पट्टी पढ़ाकर भड़काती रहती थी जिससे वह रोज ही आनंद मोहन से झगड़ा करती उनके दोनों बेटे रीना  का पक्ष  लेते थे रीना के साथ जब आनंद मोहन का विवाह हुआ था उनकी माँ ने  रीना को अच्छे से ही रखा था कभी किसी बात पर थोड़ी बहुत कहासुनी हो जाती या  घर में मेहमान आते और काम बढ़ जाता तो रीना को शारदा पर बड़ा क्रोध आता था रीना ने चार साल जैसे तैसे अपनी सास के साथ  गुजारे रीना के दोनों बेटों का जन्म भी ससुराल में  हुआ रीना की सेवा संसार तब सास शारदा ने ही की रीना की माँ ने मायके में डिलेवरी कराने से साफ इंकार कर दिया था। जब रीना ने खूब आग्रह किया तो उन्होंने इस के बदला हर माह आधी तनख्वाह देने की बात कह दी थी।  तब शारदा ही काम आई थी जिससे रीना हद दर्जे की नफरत करती थी।  उसका नतीजा ये हुआ कि  एक दिन रीना ने अंतिम फैसला सुना दिया कि वो अब किसी भी हाल में यहाँ नहीं रहेगी  अलग होने की बात उसने खुलकर रखी ये पट्टी भी रीना को उसकी माँ ने ही पढ़ाई थी। शारदा ने सहर्ष उन्हें अलग रहने की स्वीकृति दे दी थी और आनंद मोहन अपनी पत्नी और दोनों बच्चों को लेकर भोपाल आ गए  यहाँ आनंद मोहन एक कंपनी के मार्केटिंग   एजेंट बन गए आनंद मोहन ने दिन रात एक करके खूब पैसा कमाया दो मकान बनवाए  जिनके किराये से अच्छी आमदानी होने लगी  आनंद मोहन ने सारी प्रापर्टी  रीना के नाम से खरीदी थी । रीना के बच्चे युवावस्था की  ओर बढ़ रहे थे रीना शुरू से ही बच्चों के मन में दादी  से नफरत   के भाव भरती रही थी।  दोनों बच्चों की पढ़ाई खत्म हो गई  और वे नौकरी करने लगे इधर  आनंद मोहन की नौकरी इस कारण  से छूट गई थी क्यों कि वे  साठ वर्ष  के हो गए थे। जब आनंद मोहन की तनख्वाह बंद हो गई तो रीना  उन्हें और अधिक परेशान करने लगी थी। एक दिन उन्हें माँ के गँभीर रूप से बीमार होने की खबर लगी तो वे माँ के पास जाने की तैयार होने लगे ते रीना बोली  कहीं जाने की जरूरत  नहीं है। बुढ़िया इतनी जल्दी मरने वाली नहीं है। यह बात सुनकर उन्हें गुस्सा तो आया  पर उन्होंने विवाद  नहीं होने दिया।  और अपनी माँ से मिलने चले गए। इससे रीना आगबबूला हो गई। पूरे तीन महीने माँ की सेवा करने के बाद जब  वे आए तो रीना ने उन्हें घर में नहीं घुसने दिया क्योंकि उन्होंने शारदा की बात नहीं सुनी थी। और अब वे निकम्मा होकर जी रहे थे। जब वे चार दिन में ही लौट आए तो माँ  को कुछ कहने की जरूरत ही नहीं  पड़ी। माँ ने कभी उन्हें भार नहीं समझा था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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