सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: दोस्ती में दरार

कभी जिससे खूब गहरी दोस्ती रही उस परेश से दुश्मनी होने के बाद उस पर चाकू से प्राणघातक हमला करने वाला रितेश  इन दिनों जेल में बंद था उसे तीन साल का कारावास मिला था। जेल में आने के बाद उसे अपनी गलतियों का अहसास हुआ था। उसने जब सारी कड़ियों को जोड़ा तो उसे इसमें अपनी ही गलती नजर आई उसके जेल जाने से उसकी दुकान उसकी पत्नी रेखा ने सम्भाल तो ली थी पर घर के काम होने के कारण वह दुकान पर ज्यादा समय नहीं दे पा रही थी बस जैसे तैसे दुकान चल रही थी। आज रेखा रितेश से जेल में मिलने गई थी  उसके साथ उसका बेटा कुलदीप भी था।  पति की मनोदशा और पछतावा देखकर वो बड़ी दुखी थी। घर आने के बाद उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। 
रेखा ने कई  बार रितेश को समझाया था कि परेश से झगड़ा खत्म कर के सुलह कर लो पर हरबार वो गुस्से में यही कहता उस दुश्मन का नाम तक मत लो मेरे सामने अन्यथा मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। दो वर्ष पूर्व तक परेश और रितेश गहरे दोस्त थे दोनों एक दूसरे को बहुत मानते थे एक दूसरे की ताकत थे वे उनकी दोस्ती रितेश के पड़ोस में रहने वाले हम उम्र नरेश को बिल्कुल नहीं भाती थी उसे ईर्ष्या होती थी वो मौके की तलाश में रहता ताकि उनकी दोस्ती में दरार पैदा कर सके और होली में उसे मौका मिल गया होली पे परेश और रितेश में हल्का विवाद हो गया था जो बाद में सुलझ भी गया फिर परेश मोहल्ले के दूसरे छोर पर किसी के साथ होली खेलने चला गया।  इधर रितेश की बाहर के लड़कों से लड़ाई हो गई और वे उसे बुरी तरह पीट कर चले गए। रितेश को ऐसा लगा कि ये हमला परेश ने ही उस पर करवाया जबकि परेश उसे इस अवस्था में देखकर दुखी था वे अब भी होली के जुलूस में थे भीड़ का फायदा उठाकर नरेश ने परेश को जोर का धक्का दिया परेश का उससे संतुलन गड़बड़ा गया और वो आगे की और गिर पड़ा यह देख तुरंत ही परेश ने खुद को सँभाला और कॉलोनी वालों की सहायता लेकर उसे उठा लिया पर रितेश ने ये मान लिया कि परेश ने जानबूझ कर ऐसा किया है। रितेश भरा बैठा था उनके बीच खूब कहासुनी हो गई थी उनमें झूमा झटकी भी हुई थी। इसके बाद उनमें बोलचाल होना बंद हो गया था।  परेश ने बहुत कोशिश की दुश्मनी खत्म करने की पर सफल नहीं हुआ छुरेबाजी के दो दिन पहले परेश को बाजार में रितेश की पत्नी मिल गई। रितेश की पत्नी ने ही परेश को टोककर बात की थी फिर भी। पर नरेश ने रितेश को उल्टी पढ़ी पढ़ाकर परेश के खिलाफ भड़का दिया एक दिन वो सुलगता रहा दूसरे दिन उनमें आपस में खूब लड़ाई हुई। रितेश ने चाकू निकाला और परेश पर सीधा हमला कर दिया बचते बचते भी परेश के कमर के पास चाकू लग ही गया इसके बाद लोगों ने बीच बचाव करा दिया किसी ने घटना की सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस आई और रितेश को ले गई सी सी टीवी में पूरी घटना आ गई थी। जिसमें रितेश दोषी दिखाई दे रहा था।  रितेश पर अदालत में केस चला और उसे तीन साल की सजा हो गई उसने उच्च न्यायालय में अपील की पर वो खारिज हो गई आखिर उसे जेल जाना पड़ा परेश का घाव ज्यादा गहरा नहीं था इसलिए जल्दी ही ठीक हो गया। पर जो दोस्ती में दरार हुई उसका ठीक होना अब मुमकिन नहीं था।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...