सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: संतान हीन

संतान नहीं होने के कारण पति द्वारा परित्यक्त कमला आज चालीस अनाथ बच्चों   की परवरिश कर रही थी  पिछले बीस सालों से वे यह पुनीत कार्य कर रहीं थी उनके पाँच लड़के  पढ़लिखकर नौकरी करने लगे थे उनमें से दो  की  उन्होंने  शादी भी कर दी थी वे अब सुखपूर्वक रह रहे थे। उन्होंने अपने  घर का नाम कुटुंब रखा था घर उनका बहुत बड़ा था जिसमें सब हिलमिलकर रहते थे। उनके कुटुंब  को जहाँ दान दाताओं का सहयोग मिल रहा था वहीं उनके पास चालीस एकड़ कृषि भूमि थी जिसकी आय से भी वे अपना कुटुंब चला रही थीं।  उनका सोनपुर नगर में बहुत सम्मान था। आज उन्हें एक दान दाता तीस हजार रुपये देकर गया था जिससे उन्होने महीने भर के लिए आवश्यक सामान खरीद लिया था अनाज और सब्जी तो उन्हें अपने खेत से प्राप्त हो जाती थी। इन बच्चों के बीच रहकर कभी उन्हें ऐसा नहीं लगा कि  वे संतान हीन हैं। बच्चे भी उन्हें अपनी माँ ही समझते थे।
    कमला जब तीस वर्ष की थीं तब उनके पति ने उन्हें छोड़ दिया था।  तथा दूसरी शादी कर ली   थी। क्योंकि  वे  माँ नहीं बन सकती थीं।  कमला परित्यक्ता होने के बाद मायके नहीं गईं बल्कि पेइंग गेस्ट बनकर रहीं उन्होंने एक स्कूल खोल लिया था।  उसी में वे रम गईं थी तभी उनके जीवन में वो भोड़ आया जिसने उन्हें चालीस बच्चों की माँ बना दिया। सरकारी अस्पताल में कोई अभागी माँ नवजात कन्या को छोड़कर चली गई थी  उस कन्या को उन्होंने गोद ले ली  फिर रेल्वे स्टेशन  से  एक तीन  दिन का लड़का उन्हें मिल गया  उसकी माँ रेल्वे स्टेशन के पास रहकर  चने बेचती थी । वो गर्भवती थी कोई उसके विषय में कुछ नहीं जानता था तीन दिन पूर्व उसने बच्चे को जन्म दिया था  और   फिर उसका निधन हो गया था उस बालक को भी वे घर ले आईं थी अब उन्होंने पेइंग गेस्ट वाला घर छोड़ दिया था  शहर से  थोडी दूर उन्होंने स्कूल के लिए बीस हजार वर्ग फुट जगह खरीदी थी उसी पर दो कमरे बनाकर वे उसमें रहने लगी थीं चालीस एकड़ जमीन उनके  चाचाजी जो निस्संतान वे  कमला के नाम कर गए थे वो जमीन  भी पास ही थी। दो बच्चे पुलिस ने उनको दिए थे इस तरह धीरे धीरे उनका कुनबा बढ़ता गया इधर उनका स्कूल  भी शहर का प्रतिष्ठित स्कूल के रूप में स्थापित हो चुका था। बीस हजार वर्ग फीट में उन्होंने अपना कुटुंब बसा लिया था ।जो बच्चे बड़े होकर नौकरी करने लगे थे उनकी कमला ने शादी कराकर उनका घर बसा दिया था वे कुटुंब में नहीं रहते थे।  पर वे कमला को ही अपनी माँ मानते थे अभी भी उनके कुंटुब में पाँच बच्चे एक साल से कम उम्र के थे।  कमला के जीने का अब यही मकसद था  उनके संतान नहीं थी फिर भी पूरे शहर में वे ममतामयी माता के  रूप में विख्यात थीं।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...