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कहानी: बीमारी मँहगी सस्ती

दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले करन सिंह को आज आधे दिन की मजदूरी कर के ही संतोष करना पड़ा था शाम को उन्हें दो सौ रुपये मजूरी के मिले थे। सुबह वो मजदूरी पर इसलिए नहीं आ सके थे क्योंकि उन्हें डायरिया हो गया था।
उन की आज सुबह अचानक तबियत खराब हो गई थी वे काफी कमजोरी महसूस कर रहे थे। ऐसी स्थिति में वे काम पर नहीं जा सके उनकी बस्ती में आर एम पी डॉक्टर आर पी साहू का क्लीनिक था। वे इलाज के लिए वहाँ गए डॉक साब ने उनका परीक्षण किया तीन टाईम की कुछ गोलियाँ दी एक पाउडर का पेकैट दिया जिसे पानी में घोलकर पीने को कहा। इतना इलाज डॉक्टर साहब ने मात्र तीस रुपये में कर दिया इसमें उनकी फीस भी शामिल थी। वे इलाज कराकर घर आ गए। एक खुराक सुबह खाई और एक दोपहर में तीन बार घोल पिया भोजन में खिचड़ी खाई दोपहर तक वे लगभग ठीक हो गए थे तभी ठेकेदार का फोन आया कि यहाँ मजदूरों की कमी है अगर तबियत ठीक हो तो आ जाओ आधे दिन की मजदूरी तो मिल ही जाएगी करन सिंह ने ठेकेदार की बात मान ली थी और मजदूरी करने आ गए थे। शाम को मजदूरी के रुपये लेकर जब करन सिंह घर आए तो बाहर चबूतरे पर मोहल्ले की कुछ महिलाएँ आपस में बात कर रही थीं उनमें से दो कामवाली बाई थीं एक कामवाली बाई मंजू कह रही थी दो दिन पहले हमारी मालकिन विमला के बेटे नीरज की तबियत खराब हो गई थी उसे डायरिया हो गया था तो मालकिन उसका इलाज कराने प्राइवेट अस्पताल में ले गई वहाँ डॉक्टर ने उसे भर्ती कर लिया। बॉटल चढ़ाई गईं दूसरे दिन उसकी छुट्टी हो गई एक दिन का उसका बिल साढ़े पाँच हजार रुपये बना यह सुनकर दूसरी कामवाली बाई हेमा बोली इतना कम बिल कैसे बना जरूर किसी सस्ते अस्पताल में इलाज कराया होगा। कुछ दिन पहले हमारे मालिक विकास को भी यही बीमारी हुई थी इसका इलाज कराने वे शहर के सबसे बड़े 
अस्पताल में गए ऐ सी रूम में उन्हें भर्ती किया गया दूसरे दिन जब उनकी अस्पताल से छुट्टी हुई तब उन्हें एक दिन का बिल 28 हजार रुपया जमा करने को कहा गया। बिल की रकम अदा करने पर उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली। उनमें से कामवाली बाई मंजू ने बताया कि उनकी मालकिन मध्यम वर्ग की थीं तथा दूसरी मालकिन उच्च मध्यम वर्ग से संबंधित थीं। जबकि करन सिंह मजदूर वर्ग का व्यक्ति था इसलिए तीस रुपये के इलाज से ही ठीक हो गए थे। जबकि उनको इस बीमारी के इलाज में हज़ारों रुपये खर्च करना पड़ा था। फिर भी करन सिंह को आधे दिन की रोजी न मिलने का बहुत अफसोस था ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
 

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