सेठ हरलाल को उनके तीनों बेटों ने बहत्तर साल की उम्र में घर से निकाल दिया था उनके मकान दुकान जमीन जायदाद रकम जेवर नगदी सब पर बेटों ने अधिकार कर लिया था उनकी पत्नी कमला के स्वर्गवास के बाद सेठ जी के सीधेपन का लाभ उठाकर बेटों तथा बहुओं ने उनका सब कुछ हड़प लिया था। घर से निकाले हुए उन्हें आज छः वर्ष हो गए थे वो उसी मोहल्ले में मंदिर के पास बने मकान के एक कमरे में किराये से रह रहे थे भगवान का भजन गाते उसी से उनको जो मिल जाता उसमें गुजारा कर लेते थे।
सेठ हरलाल के बेटे कुटिल कपटी कठोर थे लेकिन मोहल्ले के लोग बुरे नहीं थे वे दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते थे और वह भोजन उन्हें कहीं न कहीं से मिल जाता था। उनके पास एक हारमोनियम था उनके कमरे से चंद कदम दूरी पर शिव जी का मंदिर था सेठ हर लाल शाम को दो घंटे अपने घर की दालान में बैठकर हारमोनियम पर भजन गाते थे भजन वो पूरी तन्मयता से मधुर स्वर में गाते मंदिर पर सुबह शाम भक्तों की भीड़ लगी रहती थी। जो भक्त मंदिर आते वे दर्शन कर सेठ हरपाल जी के भजन जरूर सुनते और बदले में उन्हें कुछ रुपये देकर अवश्य जाते थे कई तो उनके भजनों को घंटों सुनते रहते थे फिर भी उनका मन नहीं भरता था। भजन बंद करने के बाद रुपये गिनते तो कभी हजार कभी दो हजार तो कभी कभी पाँच हजार रुपये तक निकलते वे अधिकाँश रुपया आसरा वृद्धाश्रम में दे देते थे वो वृद्धाश्रम उनकी आर्थिक सहायते से चल रहा था। हरपाल जी को जब उनको बेटों ने घर से निकाला तब उनके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी जब वे जाने लगे थे तब छोटी बहू ने उनका हारमोनियम लाकर उन्हें दे दिया था उनका यह कहना था कि यह हमारे लिए एक बेकार चीज है। हरपाल हारमोनियम पाकर बड़े खुश हो गए थे। मोहल्ले में किसी को ये मालूम नहीं था कि हरपाल जी को उनके बहू बेटों ने घर से निकाल दिया है वे तो पीपल के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर बैठकर भजन गा रहे थे सुबह के भूखे थे पर भूखे ही भजन गा रहे थे वो भी हारमोनियम की धुन के साथ लोग मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे भजन कीर्तन की समाप्ति के बाद उन्हें लग रहा था कि आज उन्हें भूखा ही सोना पड़ेगा तभी एक कार उनके चबूतरे के पास आकर रुकी उसमें से एक पढ़ी लिखी महिला बाहर आई उसके हाथ में भोजन का पैकेट था सेठ हरपाल ने इसके पहले उसे इस मोहल्ले में कभी नहीं देखा था। उस महिला ने उन्हें कँबल दिया तथा बोली मैं अभी आधा घंटे में आती हूं ठीक आधे घंटे बाद जब वो आई तो लोडिंग ऑटो में घर का जरूरी सामान भरकर लाई हरपाल जी के पैर छूकर बोली बाबा आप मेरे ससुर की तरह हैं अपनी बहू समझकर मुझे आशीर्वाद दो और चलो मेरे साथ वो उन्हें पास बने मकान में ले आई मकान मालिक से मिली किराये के एडवाँस रुपये जमा किए लोडिंग ऑटो को खाली करा सामान कमरे मैं रखवाया पलँग पर बिस्तर लगवाए और हरपाल जी से कहा कि आज से आपको इस में रहना है। भगवान के भजन गाओ भोजन और नाश्ता की व्यवस्था भी वो करके आई थी इसके बाद जो वो गई तो फिर कभी नहीं आई। हरपाल ने उसे अपने ऊपर ईश्वर की कृपा समझा। तबसे अब तक वे अपनी जिन्दगी आनंद से गुजार रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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