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कहानी: पिता की मौत के बाद

राजीव के पिता सुरेश का निधन हुए पाँच वर्ष बीत गए थे। इन पाँच वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था ।राजीव की बहन विनीता की शादी हो गई थी ।।उसे अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद उसकी भी शादी हो गई किराये के मकान से वे अपने खुद के घर में आ गए थे। माँ रजनी को पेन्सन मिल रही थी।  पिताजी के निधन के बाद जो फंड ग्रेच्यूटी बीमा तथा ई एल का पैसा मिला था उससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत हो गई थी।
राजीव के पिता  सुरेश आबकारी विभाग में क्लर्क थे  उन्हें शराब पीने की लत थी इसके अलावा जुआ सट्टा भी वे खेलते थे अपनी तन्ख्वाह का अधिकाँश पैसा वे व्यसनों में खर्च कर देते थे।  उनका ऑफिस में किसी से भी बर्ताव अच्छा नहीं था ऑफिस में भी वे शराब पीकर चले आते थे। जरा जरा सी बात झगड़ा करना उनकी आदत थी उनसे कोई काम नहीं लिया जाता था। न उनके आने जाने पर कोई रोक टोक थी।  उन्हें कोई उधार बी नहीं देता था। उनके कारण उनका परिवार  परेशानी का सामना करता था। उनका बेटा राजीव बचपन से ही उन्हें ऐसा ही देख रहा था  उनमें जरा भी बदलाव नहीं आया था । राजीव की माँ रजनी सिलाई का काम करती थी  विनीता सोसायटी के ऑफिस में काम करती थी राजीव भी बिजली की दुकान पर काम करता था वे किराये के मकान में रह रहे थे। राजीव  हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद आगे नही पढ़ सका था। उसे सरकारी नौकरी मिल नहीं रही थी इसी कारण से अठ्ठाइस वर्ष की उम्र होने पर भी उसकी शादी नहीं हो रही थी।  सुरेश की अपनी जाति बिरादरी में भी छवि अच्छी नहीं थी।  माँ  के सारे जेवर बिक गए थे। माँ को अपने पति से रुपये छिपाकर रखने पड़ते थे अगर वे रुपये सुरेश के हाथ लग जाते थे तो  वो उन्हें शराब पीकर खर्च कर लेते थे। उन्हें रुपये देकर कोई सामान भी बाजार से नहीं मँगवाया जा सकता था। जब से राजीव बड़ा हुआ था तबसे उन्होंने रजनी की पिटाई बँद कर दी थी एक बार रजनी को पीटते समय राजीव ने उनका हाथ जोर से पकड़ लिया था वो लाख कोशिश करके भी नहीं छुड़ा सके थे जब उन्होंने ज्यादा जोर लगाया तो राजीव ने अचानक उनका हाथ छोड़ दिया था जिससे उनका संतुलन गड़बड़ा गया था और वे बुरी तरह गिरकर जख्मी हो गए थे  तब से  वे केवल जुबानी झगड़ा करतै थे। अधिक शराब पीने से उनका लीवर खराब हो गया था दोनों किडनी भी खराब हो रही थीं सरकारी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था जो सरकारी अस्पताल से दवाएँ मिलती उन्हें भी वो फेंक देते थे आखिर एक दिन उनके शरीर ने जवाब दे दिया और उनके प्राण पखेरू उड़ गए। राजीव ने अपने पिता को तिल तिल कर मरते हुए देखा था उन्हें कभी किसी का सम्मान नहीं मिला था।  उन्होंने एक असफल जिंदगी जी थी। मरने के बाद वो लोग ज्यादा दुखी थे जिनका कर्ज खाकर वो मरे थे। पिता का आखिर पिता होता है उनके मरने का दुख तो उनके परिवार को था ही पर कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य  होने लगा था। फिर दोनों माँ बेटे ने उनके फंड को पाने के लि
ए तथा अनुकंपा नौकरी पाने के लिए सरकारी ऑफिसों के खूब चक्कर लगाए थे तब कहीं वे अपना रुका हुआ पैसा सरकारी खजाने से निकलवा सके थे।  अनुकंपा नौकरी मिलने के बाद जैसे ही  बिरादरी में ये  खबर फैली वैसे ही उनके यहाँ लड़की वालों का आना शुरू हो गया था राजीव ने अपनी बहन की पहले शादी कराई थी इसके बाद उसकी शादी हुई थी।  घर में पिताजी नहीं थे पर उनकी फोटो हाल की दीवार पर लगी हुई थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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