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कहानी: पुत्र मोह का त्याग

शादी के पहले अपने पुत्र लोकेश को अपनी आँखों का तारा समझने वाली  माँ  लीलादेवी  उसकी शादी के छः महीने बाद ही पुत्र मोह का त्याग कर चुकी थी आज जब वो अपनी पत्नी वीना को लेकर अलग हुआ तब उन्होंने उसे अपने घर में नहीं रहने दिया आखिर लोकेश ने अपना तबादला दूसरे शहर में करा लिया था वहाँ किराये का मकान  ले लिया था आज मिनी ट्रक में अपना सामान लाद कर वो उस शहर के लिए रवाना हो गया था।  इसके पहले लीलादेवी ने लोकेश से कहा था तू अपनी पत्नी को छोड़ दे मैं तेरी दूसरी शादी करा दूँगी तब लोकेश ने कहा था वीना का कसूर तो बताओ  मैं उसे नहीं छोड़ सकता  इस पर लीला देवी ने कहा तो फिर तू इस घर में नहीं रह सकता। लोकेश ने कहा ठीक है और वह आज घर छोड़ के चल दिया था। उसकी पत्नी वीना को चार माह का गर्भ था फिर भी लीला ने उसे घर से निकाल दिया था।
लोकेश जब छः माह का था तब उसके पिताजी  सुमेर सिंह का  सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। लोकेश की दो बड़ी बहने थीं। लोकेश लीला देवी का सबसे छोटा  बेटा था लीला उसकी हर जिद पूरी करती  थी क्योंकि वो  उनके पति  की अंतिम निशानी  जो  था। लीला देवी को  अनुकंपा नियुक्ति मिली थी।  पैंशन का लाभ तो उन्हें मिल ही रहा था। लोकेश को उन्होंने इंजीनियर बनाया था। 
फिर भी लोकेश कोई नौकरी नहीं कर रहा था।  उनके पास सात बीघा जमीन थी वो उसमें खेती कर लेता। जब लोकेश की उम्र 26 वर्ष की हो गई और उसकी शादी का कहीं से रिश्ता नहीं आया  तब उन्हें अपनी भूल  का अहसास हुआ घर  कच्चा था उसकी नौकरी नहीं थी। इसलिए कोई उसके  पास अपनी बेटी के विवाह  की बात तक नहीं करता  था। तब लोकेश ने बैंक से लोन लेकर पक्का मकान बनवाया था। लोकेश का ममेरा भाई रोहित पशु के डाॅक्टर थे उन्होंने उसे नरसिंहपुर में एम आर बनवा दिया था। मकान और  नौकरी देखकर अब रिश्ते आना  
शुरू हो  गए थे। फिर वीना से लोकेश की शादी हो गई वीना की अपनी दोनों नंदों से बिल्कुल नहीं बनी थी 
जिसका नतीजा उसे अलग होकर भुगतवना पड़ा था।   
*****:
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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