सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: नौकरी

अपनी ही दुकान से छोटे भाई दिनेश द्वारा बेदखल करने के बाद रमेश ने कोशिश कर के तहसील में चपरासी की नौकरी हासिल कर ली थी नौकरी करते हुए उसे दस साल हो गए थे इन दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था। रमेश को सरकारी क्वार्टर मिला हुआ था जिसमें वो अपने परिवार सहित सुख से रह रहा था। नौकरी के अलावा वो एक वकील के यहाँ भी शाम के छः बजे से दस बजे तक  काम कर रहा था जहाँ से उसे अतिरिक्त आय भी हो रही थी। आज उसे वकील साहब ने वेतन दिया था परसों उसकी बिटिया ऋषिका का जन्म दिन आने वाला था। यह पैसे वो उसके जन्मदिन पर खर्च करने वाला था।
रमेश के बेटे का नाम रवीन्द्र था उसने इस साल दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी। ऋषिका आठवीं में आई थी। दस वर्ष पूर्व रमेश की किराने की दुकान थी दुकान अच्छी चलती थी यह दुकान रमेश ने ही पाँच वर्ष पूर्व खोली थी तब दिनेश बीए सेकेण्ड इयर में पढ़ रहा था। रमेश आठवी पास करके  काम करने लगा था क्योंकि उसके पिताजी कुली थे उनकी इतनी आमदनी नहीं थी कि वे दोनों की पढ़ाई का खर्च उठा सकें रमेश के काम करने से घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई थी। रमेश किराने की दुकान पर काम करता था। दुकान पर काम करते करते उसके मन में ख्याल आया कि वो भी किराने की दुकान क्यों न खोल ले उसकी थोक व्यापारियों से अच्छी जान पहचान थी दुकान उसे किराये की मिल गई थी  दुकान में सामान उसने उधार लेकर भर लिया था।  थोड़े दिन में दुकान चल निकली दुकान उसने अपनी केशर देवी के नाम से खोली थी। इसके बाद रमेश की शादी उमा से हो गई थी। इधर दिनेश  ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी की तलाश में तीन साल खूब भटका जब नौकरी नहीं मिली तो रमेश के साथ वो भी दुकान पर बैठने लगा दिनेश की शादी रूपा से हो गई थी। रूपा चतुर चालाक थी तथा रमेश की पत्नी उमा सीधी सरल धीरे धीरे दिनेश ने पूरी दुकान अपने कब्जे में कर ली थी। अब रमेश की हैसियत नौकर की जैसी हो गई थी दुकान का सारा हिसाब किताब दिनेश के हाथों में था। वो जी तोड़ मेहनत  के बाद भी रमेश को बहुत कम पैसे देता था  जिससे उसके परिवार का खर्च भी नहीं चल पा रहा था।  आखिर रमेश ने दुकान छोड़कर कहीं नौकरी करने का इरादा कर लिया था तभी उसकी दुकान से किराने का सामान लेने वाले तहसील के बड़े बाबू वर्मा जी ने बताया कि तहसील में चपरासी का पद खाली है। और जो आठवीं पास है वही आवेदन कर सकता है अधिक योग्यता वाला पात्र नहीं माना गया है। रमेश ने खुद नौकरी करने की इच्छा जाहिर की वर्मा जी ने उन्हें बड़े साहब से मिलवा दिया। बड़े साहब ने रमेश को चपरासी के पद पर रख लिया था। क्योंकि आठवीं पास एक वही उम्मीदवार था बाकी सब ज्यादा पढ़े लिखे थे। रमेश ने नौकरी ज्वाइन करने के बाद दुकान पर आना छोड़ दिया था दिनेश इस से मन ही मन बहुत खुश था। उसकी जगह दिनेश की पत्नी रूपा दुकान पर बैठने लगी थी। एक दिन रमेश ने दिनेश से कहा पंचायत सचिव की भर्ती हो रही है अगर नौकरी करने की इच्छा हो तो पास के गाँव राजूखेड़ी  की पंचायत के सचिव पद पर नियुक्ति मिल सकती है। पर दिनेश नौकरी करने को तैयार नहीं हुआ। समय ने पलटा खाया दिनेश की दुकान के सामने एक दबंग ने भी किराने की दुकान खोल ली उसने दिनेश का पूरा धंधा ठप करा दिया था उनकी आर्थिक स्थिति डगमगा गई थी। एक दिन दिनेश ने कहा भैया मेरी भी नौकरी लगवा दो। तो रमेश बोले उस दिन सचिव बनने का अच्छा मौका मिला था वो तो ठुकरा दिया अब मैं क्या कर सकता हूँ। फिर भी रमेश ने पूरी कोशिश की दिनेश की नौकरी लगवाने की  पर नाकाम रहा। हार कर उसने एक दुकान पर वसूली एजेंट का काम करना शुरू कर दिया। दुकान किराये की थी आठ महीने का किराया न देने पर दुकान मालिक ने  दुकान खाली करा ली थी। हारकर उसे दूसरी जगह काम करना पड़ा था। एक दिन रमेश को खबर मिली की  दिनेश पर अज्ञात लुटेरों  ने शाम को हमला कर दिया था जिससे उसे खूब चोट आई थीं। सही तरीके से चल भी नहीं पा रहा था। फिर भी काम करना उसकी मजबूरी थी  लुटेरों ने उससे चालीस हजार रुपये लूट लिए थे। तीन महीने से वो घर पर ही था मकान बेचने की नौबत आ गई थी। रमेश की पूरी सहानुभूति दिनेश के साथ थी पर वो चाहकर भी दिनेश की मदद नहीं कर सकता था।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...