सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: गरीबी से उठकर

मनसुखलाल आज गाँव के धनवान एवं प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में जोने जात हैं लेकिन बीस साल पहले वे गाँव के सबसे निर्धन व्यक्ति थे। उन्हों नेअपनी मेहनत लगन संयम धैर्य से अपनी गरीबी दूर की थी  आज उन के पास सत्तर एकड़ जमीन एक वेयर हाउस  और हार्वेस्टर जेसीबी मशीन चार डंपर  तथा टस करोड़ रुपये बैंक में जमा थे पाँच करोड़ रुपये का कर्ज बाँट रखा था जिसे दस लाख रुपये महीने का ब्याज प्राप्त होता है। वे मंडी कमेटी के अध्यक्ष हैं तथा क्षेत्र के सबसे बड़ा दानदाता भी वे ही हैं।
वे जब  दो वर्ष के  थे तब उनकी माँ प्रेमवती ने  उनके सौतेले पिता मान सिंह  से दूसरी शादी कर ली थी मनसुखलाल के पिता लक्ष्मण दास ने घर परिवार छोड़कर सन्यास ले लिया था वे तब माँ के गर्भ में ही थे  जब उनका जन्म हुआ तब उनके पिता उनके पास नहीं थे माँ ने ढाई साल अपने मायके में गुजारे लेकिन भैया भाभी के बुरे बर्ताव से पीड़ित होकर  घर छोड़कर अलग रहने का निर्णय लिया तभी लीलाधर ने उनके सामने मानसिंह से शादी करने का प्रस्ताव रखा काफी सोच विचार के बाद प्रेमवती ने मानसिंह से इस शर्त पर शादी करना मंजूर किया  कि वो अपने बेटे को अपने साथ ही रखेगी। मानसिंह ने उसकी यह शर्त मंजूर कर ली।  मान सिंह के पास पँद्रह एकड़ जमीन थी एक मकान था  वह एक सामान्य हैसियत वाला इंसान था।  उसकी पहली पत्नी का निधन प्रसव के दौरान हो गया था जिसमें माँ तथा गर्भस्थ शिशु दोनों की जान चली गई थी मानसिंह ने मनसुख को रख तो लिया था पर उसे वो दिल से स्वीकार नहीं कर सका था उसकी नजर में वो उसका खून नहीं था। प्रेमवती जरूर मनसुखलाल को अच्छे से रखती थी  जब मनसुखलाल चार वर्ष का हुआ तब प्रेमवती ने एक और पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम महेश रखा गया। महेश मानसिंह का अपना बेटा था इसलिए मानसिंह उसको बड़े लाड़ प्यार से रखता था महेश के जन्म के दो साल बाद प्रेमवती ने लड़की  को जन्म दिया जिसका नाम राखी था  अब मनसुखलाल उस घर का उपेक्षित बच्चा बनकर रह गया था प्रेमवती ने उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखा दिया था  बचपन में उस पर कई काम थोप दिए गए थे  चौदह साल की उम्र में मनसुखलाल खेतों में मजदूरी कर पैसा कमाने लगे थे उस पैसे से वे अपनी पढ़ाई का खर्च निकालते। उनके सौतेले पिता का बेटा  महेश जब स्कूल जाने के योग्य हुआ तब  मनसुखलाल  ने देखा कि उसके सौतैले पिता ने उसका एडमीशन महँगे प्राइवेट स्कूल में कराया था  मानसिंह महेश की हर जिद पूरी करते थे। महेश की बहन राखी का भी लाड़ से लालन पालन हो रहा था  अब मनसुखलाल की माँ भी  महेश और राखी पर ज्यादा ध्यान देने लगी थी  मनसुखलाल जी ने उन्नीस साल की उम्र में हायर सेकेण्डरी परीक्षा पास की उनके सौतेले पिता ने उन्हें आगे पढ़ाने से साफ इंकार कर  दिया तथा कहा कि तुम घर के  कामों में मदद करो फिर दोनो बच्चों को पढ़ाओ। मनसुखलाल ने उन्हें पढ़ाने की कोशिश की पर नाकाम रहे इससे चिढ़कर मानसिंह ने उन्हें घर से निकाल  दिया।  कहा कि मेरी जमीन जायदाद में तुम्हारा कोई हिस्सा  नहीं रहेगा अब तुम जा सकते हो मनसुखलाल ने एक कमरा किराये से लिया था। तथा दूसरों के खेतों में  मजदूरी कर अपना गुजारा कर रहे थे।  समझदारी से वो रुपये  भी बचा रहे थे जब उनके पास  आठ हजार  रुपय इकठ्ठे हो गए तो  उन्होंने मजदूरी करना  छोड़ मंडी से सब्जी लाकर बेचना शुरू कर दिया ।  इससे जो लाभ होता उससे वे  अपना खर्च चलाते थे  बाकी पैसा जमा करते जाते थे।  जो पैसा इक्क्ठा होता  उसे वे ब्याज से जरूरतमंदों को दे देते थे  धीरे धीरे  उनके पास  पैसा इकठ्ठा  होने लगा था। फिर एक दिन अपनी गाँव  में ही दुकान खोल ली वो दुकान अच्छी चल निकली  उधर महेश राखी   को अत्यधिक लाड़  प्यार मिला था  वो ज्यादा पढ़ नहीं पाए थे अचानक मानसिंह की हार्ट अटेक से मौत हो गई थी। उसकी मौत के बाद  जमीन जायदाद  का मालिक उनका  बेटा महेश ही था। महेश ने अनाप शनाप रुपया खर्च कर सारी जमीन जायदाद बेच दी थी  जबकि मनसुखलाल ने चार साल में दस लाख रुपये जोड़कर  दस एकड़ जमीन खरीद ली थी  महेश अब मनसुख की जमीन का खेतिहर मजदूर बनकर रहा गया था। गरीबी से कोई इंसान बड़ी मुश्किल से ऊपर उठता है  जो एक बार अमीर हो गया  तो जब तक आदत न बिगड़ जाए या किस्मत साथ न दे तब तक गरीब नहीं होता।  चौबीस साल की उम्र में मनसुखलाल की  शादी हो गई थी  उनकी पत्नी सरला सीधी सरल और नेक महिला थी  उस के आने के बाद उनके कारोबार में खूब बढ़ोतरी हुई थी। शादी के अभी सोलह साल ही हुए थे इन सोलह सालों में मनसुखलाल  गाँव  के सबसे धनी सेठ बन गए थे।
*****
रचनाकार 
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...