सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: दादा जी का हत्यारा

चौकीदारी की नौकरी पाने के लोभ में अपने सगे दादाजी की हत्या करने वाला पोता राकेश  जेल में उम्रकैद  काट रहा था जेल में सजा काटते हुए आज उसे पूरे पन्द्रह  वर्ष हो गए थे जेल में उत्पात मचाने  तथा एक कैदी के ऊपर जान लेवा उ हमला करने के कारण उसे काल कोठरी में रखा गया था। दादाजी की हत्या करने पर उसे नौकरी तो नहीं मिली उसका भरापूरा परिवार भी उजड़ गया  तथा सजा मिली सो अलग।
पन्द्ह वर्ष पहले  राकेश के दादाजी  राम सिंह शेरपुर गाँव के चौकीदार थे इसके बादले शासन से उन्हें  दस एकड़ कृषि भूमि मिली थी  तथा हर महीने वेतन के रूप में भी कुछ राशि उन्हें मिलती थी  दादाजी रामसिंह की उम्र सत्तर वर्ष की हो गई थी । उनका बेटा सोहन खेती करता था जबकि पोता राकेश   अवारा तथा बिगड़े हुए दोस्तों के साथ रहता था उसकी उम्र अठ्ठाइस वर्ष की हो गई थी।  वो कई बार अपने दादाजी से कह चुका था कि वे अपनी चौकीदारी की नौकरी उसे दे दें और खुद अब घर पर रहकर आराम करें लेकिन रामसिंह इसके लिए तैयार नहीं थे वे कहते भी थे गाँव के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से तेरी दोस्ती है। तू चौकीदारी की नौकरी कैसे करेगा तू उसके योग्य नहीं मैं तझे अपनी नौकरी नहीं दूँगा इस बात पर उनकी कई बार बहस हो चुकी थी  राकेश की शादी हो गई थी उसकी पत्नी का नाम रजनी था उसका एक तीन  व्रष का बेटा   था  जिसका नाम नरेश रखा गया था राकेश की पत्नी दादाजी के खिलाफ राकेश को भडकाती उसकी बातों में आकर वो अपने दादाजी को अपना दुश्मन समझने लगा था पिछले दिनों जब वो हवालात में दस दिन रुककर आया  तो उसे दादाजी पर बड़ा गुस्सा आया कि उन्होंने उसे हवालात  से छुड़ाने  के लिए कोशिश क्यों नहीं की  वो दादाजी से लड़ा भी दादाजी ने उसे बहुत समझाया उनकी अथक कोशिशों के बाद  भी उसकी जमानत लेने को चोई तैयार ही नहीं हुआ  तो चैसे छुड़ाते। राकेश ने कहा आप जमानत ले लेते वे बोले मैं कैषे ले लेता मेरे पास  तो सरकारी जमीन थी उसके आधार पर मैं जमानत नहीं ले सकता था। उनके बीच काफी गरमागरम बहस हो गई  राकेश शराब पिए हुआ था वो दादाजी के साथ मारपीट करने पर उतारू हो गया लोगों ने  आकर बीच बचाव किया।  दादी फूलवती दादाजी की ढाल बनकर खड़ी हो  गईं  उन्होंने दादाजी पर जरा भी आँच नहीं आने दी।  राकेश ने कहा मैं दोनों को देख लूँगा । नौकरी तो मैं तुमसे लेकर ही रहूँगा चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े । एक दिन उसे मौका मिल ही गया  दादा दादी अपने खेत पर बने मकान में रात में ठहरे हुए  थे राकेश दो बजे रात को   वहोँ पहूँचा दादी की तकिए से गला दबाकर उसने हत्या कर दी दादाजी के गरदन पर कुल्हाड़ी से वार कर उनकी भी हत्या कर दी फिर थाने जाकर झूठी कहानी गढकर अज्ञात आरोपियों  के खिलाफ दादाजी तथा दादी के कत्ल की सूचना दी पुलिस उसके साथ घटना स्थल पर गई।  मौका मुआयना कर   लोगों से पूछताछ की  पुलिस को राकेश पर शक हो गया था पर पुलिस ने राकेश को इसका अहसास नहीं होने दिया।  पुलिस को हत्या का एक चश्मदीद गवाह भी मिल गया था उसकी भनक भी पुलिस ने राकेश को नहीं  लगने दी जब सबूत इकठ्ठे हो गए तब पुलिस ने  राकेश को गिरफ्तार कर लिया  तथा अदालत में राकेश  को  जेल में रहते हुए  ही आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।  राकेश के जेल जाने के बाद  रजनी  ने अपने चार साल के बेटे  नरेश को  पड़ोस के घर में छोड़कर   उस ठेकेदार घनश्याम से शादी कर ली जिसके  पास रहकर वो मजदूरी करती थी।  नरेश को लोगों ने  पुलिस को सौंप दिया पुलिस उसे  अनाथालय में  छोड़ आई। 
****
रचनाकारः
प्रदीप  कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...