सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: बरसात के दिन

इस बार के बरसात के दिन रज्जनलाल को बड़े भारी पड़ रहे थे काम धंधा मिल नहीं रहा था और पास में पैसे भी नहीं थे। आज वो अपनी पत्नी की चाँदी की पायल बेचकर घर में जरूरत का सामान लेकर आया था जो पायल उसने पत्नी के लिए साल भर पहले पाँच हजार रुपये  में खरीदी थी उस पायल के ज्वेलर ने मात्र ढाई हजार रुपये दिए थे।
राज्जन की यह बात सुनकर उसकी पत्नी रमा दुखी हो गई थी उसकी शादी की सालगिरह पर बडे मन से यह पायल रज्जन ने उसे उपहार में दी थी । उसकी बात सुनकर रमा बोली आपको बेचना नहीं था  पायल तो एकदम नई थी गिरवी रख आते रज्जन बोला तो इतने  पैसे भी नहीं मिलते और जब हम उसे छुड़ाने जाते तो इतना ब्याज हो जाता की वो नई से मँहगी पडती  तुम्हें याद है  अपनी सोने की अँगूठी मात्र चार हजार के कर्ज में ढूब चुकी है। आजकल दस  परसेन्ट पर्तिमाह से कम में कोई उधार नहीं देता हर महीने ब्याज नहीं दो तो उसे मूल मैं जोड़ देता है। रज्जनलाल ने अपनी पत्नी को पूरा हिसब समझाते हुए ये बात कही रमा सुनकर चुप हो गई इस बार बरसात के मौसम के कुछ माह पहले रज्जन दो महीने बीमार रहा था जिसमें उसकी सारी जमा पूजी खर्च हो गई थी। पिछले छः महीने में मात्र उसने एक महीने ही काम किया था उतने  रुपये में वो बरसात के लिए सामान खरीद कर नहीं रख सका था। अब उसके दिन घोर आर्थिक संकट के बीच गुजर रहे थे। रजूजन लाल पेंटिंग और पुताई का काम करता था जो बारिश के चलते पूरी तरह ठप पड़ा था पाँच दिन पहले उसने फुटपाथ पर छाता सुधारने की दुकान लगाई थी परिषद का शुल्क देने के बाद दिन भर में कुल सत्तर रुपये की कमाई हुई थी  जिससे भरपेट खाना भी नहीं जुट सका था । तीन दिन से वो उबले चने बेच रहा था  जिनसे वो ढाई सौ रुपये रोज कमा रहा था  लेकिन घर में चने का स्टॉक खत्म हो गया था। और बाजार से खरीदकर बेचने के लिए पूँजी नहीं थी।  रमा बोली ये पायल बेचने से मिले पैसे कितने दिन चलेंगे अभी तो बारिश बीतने में बहुत दिन बाकी है। रज्जन बोला तँगी तोषी से कुछ दिन तो निकालो मेरी अशोक हम्माल से बात हुई है सब्जी मंडी मे वो मुझे हम्माली का काम दिलवा देगा उसमें चार सौ रुपये रोज के मिलेंगे रमा बोली अभी आप बीमारी से पूरी तरह ठीक नहीं हैं हम्माली का काम कैसे करेंगे रज्जन बोला करना पडेगा नहीं तो अपने और बच्चों का पेट कैसे भरेंगे।  रमा बोली चलो कुछ दिनों के लिए मायके चलते हैं इस पर रज्जन बोला फिर बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा। सुनकर रमा चुप हो गई थी।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

व्यंग्य: चापलूसी से मिली उपलब्धियाँ।

चापलूसी से मिली उपल्बिधियों का जब लोग बड़े गर्व से बखान कर के फूले नहीं समाते । तब खुद्दार टाइप के लोग उन पर अधिक ध्यान नहीं देते पर कुछ चापलूस टाइप के लोग उन्हें बड़ी हसरत से देखते हैं वे उनके जैसा बनकर वे सब उलब्धियाँ हासिल करने के ख्वाब देखने लगते हैं। ऐसे ही एक सेवानिवृत कर्मी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे थे कुछ गौर से सुन रहे थे कुछ ऊब रहे थे वहीं सुरेश जी उनकी बात सुनकर मन ही मन मुस्का रहे थे क्योंकि उन्हें उनकी असलियत पता थी। किसी ने उन से पूछ लिया आप भी सतीश जी के विभाग में कार्यरत थे आपकी और इनकी नौकरी की शुरूआत एक ही पद से हुई थी फिर ये इतनी तरक्की क्यों कर गए जरा इस विषय में कुछ बताएँगे वे बोले अगर हम बताएँगे तो ये नाराज हो जाएँगे लोगों ने कहा कुछ भी हो आप तो बताइए वे बोले तो सुनो। नौकरी से पहले हम मित्र थे तब हमें मालूम नहीं था कि ये खुदगर्ज टाइप के चापलूस इंसान हैं। हम दोनों की पोस्टिंग फील्ड में हुई थी। हम किसी की चापलूसी नहीं करते थे और अपने काम से मतलब रखते थे। जबकि इन्होंने मुख्य कार्यालय में अपनी चापलूसी से घुसफैठ कर ली थी कहीं जातिवाद कहीं क्षेत्रवाद कही भाषाव...

व्यंग्य: समझदारी या मूर्खता

सामान्य ध्यमवर्गीय परिवार में नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है । उस परिवार में अगर कोई युवक पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी हासिल करने में सफल हो जाए तो उसे उसकी बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता है उसके पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है । विवाह योग्य कन्याओं के पिताओं का आना उनके यहाँ शुरू हो जाता है लाखों रुपये दहेज के ऑफर मिलते हैं। धूमधाम से शादी होती है लडके के हर नाज नखरे ससुराल वालों द्वारा उठाए जाते हैं ऐसे में अगर लड़के को रिश्वत की कमाई हो रही हो तो उसे अच्छा मान लिया जाता है उसका रुतबा ऐसे लोगों के बीच बढ़ जाता है। इस तरह के परिवारों में अगर कोई लड़का मेधावी हो अच्छे अंकों से उच्च शिक्षित हो और वो नौकरी नहीं करना चाहे तो उसके परिजनों को यह नागवार लगता है।  रोहित ने हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। उसने बि ई में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। नौकरी करने की उसकी इच्छा नहीं थी इससे उसके पिता दुखी रहा करते थे। एक बार एक सरकारी विभाग में क्लर्क की नौकरी निकली तो उसके पिता ने जोर देकर उसका आवेदन जमा करा दिया चयन मैरिट बेस पर होना था। उसका स्कोर अच्छा था । इसलिए उसका चयन ह...