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कहानी: दौलत से प्यार

अतुल इंडस्ट्रीज के मालिक सोमेश  जब अपने कारखाने का अवलोकन करने आए  तो पैकेजिंग विभाग में एक महिला को काम करते देख उसके पास ठहर गए मैनेजर नितिन ने कहा बेचारी मजबूरी की मारी है अभी तीन दिन पहले ही काम पर रखा है । काम तो ठीक ही कर रही है । सोमेश बोले वो बात नहीं है। शायद मैं इन्हें जानता हूँ वे उसके एकदम नजदीक चले गए उसने सिर उठाकर सोमेश देखा। सोमेश  बोले निशा तुम यहाँ ये काम कर रही हो तुम्हारी शादी तो शहर के बड़े रईस रतन राय से हुई थी न निशा भी सोमेश को पहचान गई थी। झेंपते हुए बोली सब समय का फेर है एक वो भी वक्त था जब आपको दो वक्त भरपेट खाना नहीं मिलता था और रतन जी के पिता शहर के धनवान व्यक्ति थे आज वे गरीबी में जी रहे हैं। और आप अतुल इंडस्दीज के मालिक जिनके कई कार खाने शोरूम एव॔ शॉपिंग मॉल हैं। सोमेश कुछ नहीं बोले बस मुस्कुराकर रह गए ।
सोमेश अपने चैंबर में बैठकर पुरानी यादों में खो गए जब वो मैकेनिकल इजीनियरिंग  में बी ई कर रहे थे पच्चीस साल पुराना दौर थे  उनके पिताजी हम्माली करते थे निशा  ने हायर सेकेण्डरी के बाद  महिला पोलीटेक्नीक में  सिलाई का कोर्स ज्वाइन कर लिया था निशा के पिताजी  शो रूम में सेल्समेन थे उनका वेतन इतना अच्छा नहीं था इससे उनके घर का खर्च भी मुश्किल से चलता था। यही हाल सोमेश के घर का भी था दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे एक दूसरे को जानते भी थे निशा के पिता निशा की शादी सोमेश से कराना चाहते थे पर सोमेश  और निशा के बीच सिर्फ दोस्ती थी।  निशा मतलबी टाइप की लड़की थी जब उसको सोमेश से कोई काम होता तो बड़ी मीठी बातें करती  कभी ये अहसास भी कराती की वही सोमेश की होने वाली पत्नी है पर सोमेश को उसका ये दोहरापन बिल्कुल पसंद नहीं था वो एक साफ सुथरा इंसान था  एक बार सोमेश निशा को अपने कॉलेज ले गया कल्चरल प्रोग्राम होने वाला था वहाँ सोमेश ने निशा का परिचय शहर के माने रईस शिवलाल के बेटे रतन से कराया निशा गौरी और खूबसूरत लड़की थी  रतन उसकी तरफ आकर्षित हुआ और निशा ने देखा कि रतन जो हीरे की अंगूठी पहना है उसकी कीमत पचास लाख रुपये है  बाहर उसकी मर्सीडीज पार्क है उसके ड्राईवर का वेतन ही निशा के पिताजी के वेतन से चार गुना है उसने सोमेश को इग्नोर कर दिया तथा रतन की निकटता प्राप्त करने की कोशिश करने लगी रतन ने भी उसे खूब भाव दिए  कार्यक्रम खत्म होते होते दोनों के बीच प्रेम के अंकुर फूट गए थे निशा ने अब सोमेश से पूरी तरह मिलना जुलना बंद कर दिया था। अब वो उसे हिकारत से देखती सोमेश को उसके इस व्यवहार से कोई दुख नहीं था क्योंकि वो उससे प्यार करता ही नहीं था। सोमेश को उसके क्लास की लड़की नीता बहुत चाहती थी नीता भी दौलतमंद की लड़की थी  उसने कई रईस देखे थे और उनके चोंचले भी देख चुकी थी वो समझ गई थी की सोमेश गरीब जरूर है लेकिन होनहार लड़का है दिल का साफ है और अच्छे चाल चलन वाला इंसान है  उसका व्यक्तित्व बड़ा मोहक है वो सोमेश को मन ही मन चाहने लगी थी  सोमेश को भी नीता पसंद थी एक दिन उन्होंने प्यार का इजहार कर ही दिया। बी ई करने के बाद सोमेश का कैंपस सिलेक्शन हुआ उसे तीन लाख प्रतिमाह की नौकरी मिल गई उसके पिता सुनते ही फूले न समाए  सोमेश ने नौकरी ज्वाइन कर ली पर नीता से उसका मिलना जुलना जारी रहा  दो साल की नौकरी में  सैमेश जी एम बन गया था और उसका वेतन दस लाख रुपये महीना हो गया था नीता ने सोमेश को अपने पिता से मिलवाया तथा उससे शादी करने की इच्छा जाहिर की सोमेश भी अब छोटी मोटी हस्ती नहीं था नीता के पिताजी बोले  शादी की बात बाद में करेंगे मेरा एक कारखाना है जो लगातार घाटे में चल रहा है मुझे उसके लिए ऐसे जी एम की जरूरत है जो उसे घाटे से उबार कर मुनाफे में ले आए सोमेश ने भी शर्त रखी मुझे तनखा नहीं प्राफिट  में आधा हिस्सा चाहिए नीता के पिताजी ने फौरन हाँ कर दी  वैसे भी वो कारखाना बंद होने की कगार पर था। पर सोमेश के हाथ में उसका प्रबंध आते ही स्थिति में सुधार होने लगा  पूरे आठ महीने की मेहनत के बाद कारखाना लाभ की स्थिति में आया  दो करोड़ रुपये का लाभ हुआ था सोमेश को एक मुश्त एक करोड़ रुपये मिले नीता के पिता बहुत खुश थे उन्होंने नीता की शादी सोमेश से कर दी तथा उस कारखाने का मालिक सोमेश को बना दिया इसी के साथ अतुल इंडस्ट्रीज की शुरुआत हुई उधर निशा ने भी रतन राय से शादी कर ली शादी शहर की सबसे चर्चित और खर्चीली थी कई महीनों तक वे इसी तरह मौज मजे करते रहे। अचानक रतन के पिता को हार्ट अटेक आया और वो चल बसे  अब सारा कारोबार रतन के हाथों में आ गया रतन एक गैर जिम्मेदार बिगड़ा हुआ रईस था उसके हाथ मे अकूत पैसा आते ही वो और अधिक अय्याश हो गया निशा से उसका मन भर गया था वो और कई लड़कियों के फेर में पड़ गया  सारा कारोबार उसने कर्मचारियों के हवाले कर दिया था धीरे धीरे सारा कारोबार चौपट हो गया सब कुख बिक गया घर बार कारखाने शो रूम शॉपिंग माॅल  कुछ नहीं बचा एक दिन रतन को लकवा मार गया उसके आधे शरीर ने काम करना बंद कर दिया था जब घर में कुछ नहीं बचा और खाने के भी लाले पड़ने लगे तब निशा ने  ये नौकरी ज्वाइन की थी  सोमेश के निशा के बारे में यह जानकर दुख तो हुआ पर वो और अधिक कर भी क्या सकता था ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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