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कहानी: होनहार

दलित वर्ग में जन्में  समर लाल तेइस वर्ष की उम्र में आइ ए एस अधिकारी बन गए थे जब  वे कलेक्टर बने तब उनकी उम्र मात्र पच्चीस वर्ष की थी उनकी योग्यता के सभी कायल थे खुद सी एम उनसे कइ मामलों में परामर्श करते थे। उनके ऑफिस में एक चपरासी था बसंत श्रीधर जो उनके ही गाँव का था तथा उनका हम उम्र भी ।सहपाठी वो उसे इसलिए नहीं कह सकते थे क्योंकि दबंगों के डर से मगसपुर गाँव का कोई दलित अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजता था।  स्कूल न जाने वालों में वे भी एक थे।
बसंत श्रीधर समरलाल जी से डरा सहमा रहता था उसे इस बात का खटका था कि अभी उसकी नई नौकरी है  कहीं  वो बदले की भावना से मुझे नौकरी से न निकाल दें क्योंकि श्रीधर के पिताजी जिन दलितों को प्रताडित करते उनमें समरलाल के पिताजी भी थे एक दिन श्रीधर की ड्यूटी समरलाल जी के साथ थी वे एक ही कार में जा रहे थे तब समरलाल जी ने श्रीधर का डर दूर करते हुए कहा था कि जब तक वो कोई ऐसा काम नहीं करेगा जो दंड योग्य हो तब तक वो किसी दुर्भावना के कारण  उसे  परेशान नहीं करेंगे फिर भी श्रीधर का डर दूर नहीं होता था।
समरलाल का बचपन  अभावों और कष्टों के बीच बीता था दलितों की बस्ती गाँव के बाहर थी  समर लाल के पिता छीतरलाल  सफाई का काम करते थे । समरलाल बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि के थे कोई उनसे एक बार जो कह दे वो उसे याद रख लेते थे  मंदिर में  जो आरती भजन होते थी वो भी उन्हें पूरे याद थे पाँच वर्ष की आयु में उनके पिता ने उन्हें बकरियाँ चराने का काम सौंप दिया था  गाँव में नवरात्री के दौरान दुर्गापाठी ब्राहम्ण आए  वे मंदिर में जोर जोर से सप्तशती का पाठ करते थे। समरलाल ने उसे एक बार सुनकर ही पूरा याद कर लिया था। एक बार जब वे बकरी चरा रहे थे तब साथुओं का जत्था वहाँ से निकला वे थोड़ी देर के लिए वहाँ रुके उन्होंने जब समरलाल से बात की तो उनका ज्ञान देखकर शुद्ध संस्कृत का उच्चारण सुन चकित रह गए जब उन्होंने गुरू का नाम पूछा तो बोले मैं दलित घर का बच्चा हूँ मैं स्कूल नहीं जा सकता। तब जत्थे के प्रमुख साधु गोपाल दास यह कह के गए देखना यह बालक एक दिन बहुत बडा आदमी बनेगा।समरलाल स्कूल के सामने से रोज गुजरते थे  बच्चों को पढ़ते हुए देखते थोड़ी देर रुक भी जाते तब श्रीधर भी वहीं पढ़ता था श्रीधर मुखिया जी का लडका था पढने में बहुत कमजोर था  एक दिन बोर्ड पर शिक्षक ने कुछ  लिखा था। और सबसे पढ़वा रहे थे कोई भी छात्र उसे ठीक से नहीं पढ़ पा रहा था। श्रीधर तो एक शब्द भी ठीक से नहीं पढ़ सका था तभी समरलाल ने उस  लिखे को बिना अटके एक बार में ही पढ दिया शिक्षक  का ध्यान कहीं और था उनके मुँह से निकल गया शाबाश किसने पढ़ा इसे और जब उनकी नजर फटे कपड़े पहने समरलाल पर पढी तो उनकी त्यौरी चढ़ गई बोले तुझे ये किसने सिखाया समर कुछ नहीं बोले सर ने उन्हें दुत्कार दिया तथा चेतावनी दी की आइंदा इधर आना नहीं नहीं तो कड़ी सजा दूँगा। समरलाल वहाँ से चले गए  पर किस्मत उनके साथ थी । उनकी बस्ती में दलित नेता  कुंजीलाल आए हुए थे  उनके सामने जब समर लाल ने । अपने ज्ञान का प्रदर्शन  किया तो उन्हें बड़ी  खुशी हुई कुंजी लाल जी उन्हें शहर मे ले आए उन्हें  अपने साथ रखा  दूसरे दिन उनका सरकारी स्कूल में  नाम लिखवा दिया गया था  वे उस समय आठ वर्ष के थे उनके ज्ञान को देख  शिक्षक ने उन्हें पाँचवी कक्षा के छात्रों में बिठाया  सीधे पाँचवी की परीक्षा उनसे दिलवाई  उन्होंने उसमें पूरे जिले में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर प्रथम स्थान प्राप्त किया था ग्यारह वर्ष में आठवीं के टॉपर रहे  पन्द्रह वर्ष की आयु में  हायर सेकेणडरी की परीक्षा में प्रदेश  में प्रथम स्थान  प्राप्त किया अठारह वर्ष में बी एस सी गणित के साथ  गल्ड मेडल से उत्तीरण की बीस वर्ष की आयु में वे युनीवर्सिटी के ऐसे छात्र थे जिन्होंने आठ सौ में से पूरे आठ सौ अक प्राप्त किए थे। समरलाल जी अपने बैच में आइ ए एस बनने वाले सबसे कम उम्र के उम्मीदवार थे पूरे देश में कोई दलित वर्ग का उम्मीदवार पहली बार पहली रैंक पर आया था। न कहीं कोचिंग की फिर भी नंबर वन देखकर   लोग हैरान थे  आज वो सबसे कामयाब अधिकारी थे दूसरी ओर श्रीधर को उनके पिता जी ने नकल कराकर आठवीं पास कराया था  और बड़ी भागदौड़ कर ये चपरासी की नौकरी दिलवाई थी। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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