सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: तबादला

आखिर खूब भागदौड़ करने और कड़ी मशक्कत के बाद दीपक वर्मा का तबादला उनके गृहनगर के पास के ग्राम  वीरपुर में हो गया था तबादला आदेश आते ही वे जब संकूल केन्द्र रिलीव होने पहुँचे  कार्यमुक्ति आदेश  तैयार करने वाले बाबू ने एक हजार रुपये माँगे थे। दीपक सर को वे पैसे देना  पड़े उन्हें डर था  कहीं उन्होंने ज्वाइन करने में देर कर दी कोई और आदेश निकलवाकर ज्वाइन न कर ले। आज के दौर में सब संभव है  दीपक सर ने जैसे ही बाबू को एक हजार रुपये दिए बाबू ने तुरंत प्राचार्य से आदेश पर दस्तखत कराकर  उसे देते हुए कहा कि आज ही ज्वाइन कर लो मुझे पता चला है एक  और शिक्षक आपका आदेश कैंसिल कराकर  अपना ट्रांसफर उस स्कूल में कराना चाहते हैं  दीपक सर ने पचपन किलोमीटर की यात्रा अपनी मोटर सायकिल से  मात्र पचास मिनिट में पूरी की  फिर संकुल केन्द्र पहुँचे इस संकुल केन्द्र में उनके दो सौ रुपये चाय नाश्ता कराने में खर्च हुए  अनुमति पत्र लेकर वे सीधे वीरपुर स्कूल पहुँचे स्कूल छुट्टी होने में दस मिनिट की देर थे। सारे शिक्षक जाने की तैयारी कर रहे थे प्रधानाध्यापक ओ पी शर्मा भी कागज समेट रहे थे। तभी दीपक वर्मा सर आ गए  शर्मा जी ने उन्हें सहयोग करते हुए ज्वाइन कराया रजिस्टर पर उनका नाम लिखा  और एक मीटिंग के दस्तखत कराए तब जाकर उन्होंने राहत की साँस ली आज दिन दौड़धूप कर वे जब घर आए तो खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहे थे  उनके बिटिया नेहा और बेटा अनिमेश भी खुश थे पत्नी उमा के चेहरे पर भी  संतोष था। 
दीपक वर्मा अपने तबादले के लिए एक वर्ष से परेशान थे। इसके पहले वे जिस स्कूल में कार्यरत थे वो उनके गृहनगर से मात्र तीन किलोमीटर दूर था।  वो अच्छे से ड्युटी कर अपनी बीमार और बूढ़ी माँ की देखभाल कर लेते थे लेकिन एक दिन अचानक नई भर्ती में नियुक्त नीलिमा मेडम  ने ज्वाइन कर लिया  दीपक सर ने कहा भी कि जब विद्यालय में पद रिक्त नहीं है तो इन्हें ज्वाइन क्यों करा रहे हैं। पर हेडमास्टर जी ने उनकी एक नहीं सुनी और मेडम को ज्वाइन करा दिया  शायद उन्हें ऊपर से कोई दबाव था मेडम के आने से दीपक सर का नाम सरप्लस में आ गया था  तीन  महीने बाद जब सरप्लस की सूची जारी हुई तो उनका तबादला अस्सी किलोमीटर दूर हो गया था। बाद में दीपक सर को पता चला कि नीलिमा मेडम की पोस्टिंग इसी नाम के दूसरे गाँव में हुई थी जो यहाँ से पैंतालीस किलोमीटर दूर इंटीरियर में था मेडम को किसी ने सलाह दी और उन्होंने  किसी भी तरह से इस शाला में कार्यभार ग्रहण कर लिया था। नीलिमा मेडम एक पॉवरफुल महिला थीं वो स्कूल महीने में एक या दो दिन ही आतीं थीं और पूरे महीने भर की तनख्वाह लेतीं थीं किसी की मजाल नहीं थी कि वो उनके खिलाफ एक शब्द भी बोल सके।
नीलिमा मेडम के कारण स्कूल के सबसे मेहनती ईमानदार नियमित रहकर कुशल अध्यापन करने वाले दीपक वर्मा जी को दूसरे स्कूल जाना पड़ रहा था। दीपक वर्मा सर ने अस्सी किलोमीटर दूर स्थित गाँव हिरन खेड़ी के स्कूल में ज्वाइन कर लिया था।  तीन महीने वे उसी गाँव में रहे। फिर कोशिश की तबादले के लिए पर नाकाम रहे।  साल भर बाद जब तबादले से प्रतिबंध हटा तो दीपक सर ने फिर तबादले के लिए आवेदन किया था  पर वे निराशा से भरे हुए थे। वरिष्ठ अधिकारी से मिल नहीं सकते थे वरना सस्पैण्ड  होने की नौबत आ जाती। तभी उनका ध्यान अपने दोस्त तथा सहपाठी राकेश गुप्ता पर  गया जो विधायक हरिमोहन के काफी निकट थे। दीपक सर ने उनकी  मदंद माँगी वे इस शर्त पर तैयार हुए की वे उन्हे इसके बदले में तीस हजार रुपये देने पड़ेंगे। दीपक इसके लिए भी तैयार हो गए शाम को जब राकेश ने फोन  किया तब वो माँ की सम्हाल कर रहे थे तथा आने में असमर्थ थे इस पर राकेश ने दीपक को धोखा देने की योजना बनाई दूसरों से कहा कि अब में दीपक को झाँसे में रखूँगा इनसे पैसे तो ले लूँगा पर इनका काम नहीं करूंगा। दीपक सर को भी ऐसा कुछ अहसास हुआ  उन्होंने न राकेश से मदद माँगी न पैसे दिए। सोच रहे थे जो होगा देखा जाएगा। यह सुनकर राकेश और भड़क गया बोला देखता हूँ अब तुम्हारा तबादला कौन कराता है। दीपक सर ने बेबस होकर सब कुछ परमेश्वर की इच्छा  पर छोड़ दिया। तभी रेल्वे स्टेशन पर दीपक की मुलाकात  तुलसी राम से हुई वो सी एम के बहुत करीबी थे दीपक ने सारी बातें उन्हें बताई वे भावुक हो गए फिर बोले मैं तुम्हारा तबादला कराऊँगा और बिना एक रुपया लिए दस दिन में दीपक को मनचाही जगह पर तबादले का आदेश  लाकर दे दिया था जिसे पाकर दीपक की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था। आज पदभार ग्रहण कर उनका सारा उत्साह खुशी में बदल गया था।

****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: बकरी

वनक्षेत्र के समीप स्थित गाँव खुशामदा के बकरी पालक रमणलाल ने इस बार के पशु मेले में पाँच लाख रुपये के बकरे बेचे थे। दो महीने पहले वो तीन लाख रुपये की बकरियाँ बेच चुका था इसके अलावा हर महीने वो चालीस हज़ार रुपये का बकरी का दूध भी बेच देता था। उसने गाँव में पक्का मकान बनवा लिया था और अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहा था। जबकि दूसरी और उसका पड़ोसी किसान ओम प्रकाश दस एकड़ का भूमि स्वामी होने के बाद भी गले-गले तक कर्ज में डूबा हुआ था। दो लाख रुपये कर्ज तो रमणलाल ने भी उसे दे रखा था। रमणलाल के पास आठ साल पहले कुछ नहीं था। वो अत्यंत गरीब खेतिहर मजदूर था। महीने में कभी बीस दिन तो कभी दस दिन ही उसे काम मिलता था। जिसमें उसका मुश्किल से गुजर बसर होता था। रमणलाल ने तब गाँव के किसान हेमराज के यहाँ कुआँ की खुदाई के कार्य में मजदूरी की थी उसके एक हज़ार रुपये बकाए थे। वो अपने रुपये का तकाजा करने हेमराज के पास गया था। हेमराज को उदास देखकर उसने कारण पूछा तो हेमराज ने दौखक होकर कहा कि बच्चे को बकरी का दूध पिलाने का परामर्श वैद्य जी ने दिया था। उसके लिए मैं बाजार से बकरी लाया था जो दो चार दिन में जनने वाली थी...