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कहानी: नफरत की शिकार बेटी

जिस बेटी के जन्म लेते ही उसकी दादी ने उसे जिन्दा ही जमीन में गड़वा दिया था। जो पाँच घंटे बाद भी जिवित निकली थी वही  बेटी बेला दादी के बुढापे का सहारा बनी हुई थी। उसकी सेवाभाव को देखकर  उसकी दादी चंदा  अपने किए पर पछतावा प्रकट कर रोती रहती थीं। जबकि बेला समझाते हुए कहती दादी भूल भी जाओ उस हादसे को मैंने तो आपको माफ कर दिया यह सुनकर दादी कहतीं तूने तो मुझे माफ कर दिया। पर भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेगा तेरी ये सज्जनता  मुझे मेरे पाप को भूलने नहीं देती। आज भी दादी उसी घटना को याद कर खूब रोती रही थीं।
यह घटना अठ्ठाइस साल पुरानी है  जब बेला का जन्म हुआ था जन्म घर पर दाई के सहयोग से हुआ था। उसकी
दादी को जब पता चला कि बेटी हुई है तो उसकी खुशी दुख में बदल गई बेला के पिता बलवंत भी दुखी थे बेटे के लिए उन्होंने कहाँ मन्नत नहीं माँगी थी डोरा ताबीज भी बँधवाए थे ।फिर भी बेटी हुई इस बात का उन्हें बहुत दुख था। वे अनमने होकर वहाँ से चले गए और अपने कमरे में पलँग पर लेटकर अपना मन बहलाने का प्रयास करने लगे। इधर दादी लड़की को देखकर कठोर होती जा रही थीं बेला की माँ कमला को होश ही नहीं था। वो अचेत थी तभी दादी ने कठोर निर्णय लिया उस नवजात मासूम बच्ची को उठाया और एक मजदूर को कुछ रुपये देकर उसे जमीन में गाढ़ देने का आदेश दिया जब उस मजदूर ने मना कर दिया तो खुद ही कुदाली लेकर उसे जमीन में दफन करने चल दीं तभी वो मजदूर आ गया और बेटी को दफन करने के लिए तैयार हो गया। दादी भी उसके साथ में रही वो गड्डा खोदता रहा और दादी देखती रही जब उसने बेटी को गड्डे में रख दिया और मिट्टी डालने लगा तब वो वहाँ से घर को लौट आई उधर उस मजदूर के अंदर कुछ मानवता जागी उसने जो थोड़ी मिट्टी डाली थी वो हटाई फिर पास में पड़ी फर्सी से उसे ढँक दिया ऊपर से मिट्टी डालकर वो आ गया। इधर बेला की माँ को जब होश आया तो बेटी उसे दिखाई नहीं दी तब तक दादी वहाँ आ गई थीं उसने बेटी की दादी से जब अपनी नवजात बेटी के विषय में पूछा तो वो बोली की वह तो पैदा होते ही मर गई थी हमने उसे दफन कर दिया है। यह सुनकर कमला रोने लगी उसका मन कह रहा था कि उसकी बेटी जिन्दा है । वो रोए जा रही थी दादी चुप थी बलवंत बाहर आए तो पता चला कि बेटी के दुख में कमला इतनी जोर जोर से रो रही है। बेला को जमीन के अंदर चार घंटे हो चुके थे कमला जिद करने लगी कि उसे अपनी बेटी का मुँह देखना है वो मजदूर वहीं मौजूद था दादी ने सोचा अब तक तो वो बच्ची मर गई होगी उसने उस मजदूर के साथ कमला को भेज दिया जिस जगह बेला को जमीन में दबाया गया था उसे देखकर कमला जोर जोर से रोने लगी मजदूर जैसे मिट्टी हटा रहा था वैसे वैसे कमला की धड़कन तेज होती जा रही थी फिर मजदूर ने फर्शी हटाई तो कंबल शाल बेला को जिन्दा देख कर कमला की खुशी का ठिकाना नहीं रहा उसने बेटी को कलेजे से लगा लिया कमला को ही मजदूर ने बताया कि बेला तो बेहोश थी उसने ही बेटी को सुरक्षित रखने के लिए फर्शी रखकर ये गैप बनाया था। कमला तो बेटी जिन्दा देखकर ही खुश थी इसके बाद कमला अपनी बेटी की हरपल निगरानी करती दादी अब भी बेला से नफरत करती थी बेला के जन्म के दो साल बाद कमला ने बेटे को जन्म दिया जिसका नाम अनिल रखा गया। अनिल दादी की आँखों का तारा बन गया था। बेला जब स्कूल जाने लायक हुई तब उसका नाम सरकारी स्कूल में लिखाया गया था। वो जब तीसरी में आई तब अनिल का नाम प्राइवेट स्कूल में लिखाया गया बस उसे लेने आती और छोड़कर जाती बेला भारी स्कूल बेग पीठ पर लादकर दो किलोमीटर दूर स्कूल पैदल ही जाती थी उसकी पढ़ाई लिखाई पर उसके माता पिता का एक रुपया भी खर्च नहीं होता था दोपहर का भोजन वो स्कूल में ही करके आती थी। पाँचवी पास करने के बाद बेला का चयन नवोदय विद्यालय में हो गया इस तरह वो अपने घर से दूर हो गई बारहवीं अच्छे अंकों से पास करने के कारण उसे छात्रवृत्ति मिली। जिसकी सहायता से वो कॉलेज में पढ़ने लगी स्नातक में टॉप करने के बाद उसका चयन आई आई एम में हो गया वहाँ एजुकेशन लोन लेकर तथा छात्रवृत्ति की सहायता से उसने एम बी ए किया एम बी ए करने के दौरान ही बेला का केम्पस सिलेक्शन हो गया उसे सोलह लाख सलाना का पैकेज मिला था उधर अनिल घर में सबका चहेता था लाड़ प्यार ने उसे बिगाड़ दिया पढ़ने में वो कमजोर था ही अक्सर स्कूल से गोल होकर अवारा दोस्तों के साथ इधर उधर घूमता रहता था लाख कोशिशों के बाद भी वो नवी से आगे नहीं पढ़ सका था अब वो चोरी भी करने लगा था एक दिन दादी ने अपना बक्सा खोलकर देखा तो उसमें उनके जेवर नहीं थे वे जेवर अनिल ने चोरी कर बेच दिए थे तथा पैसे जुआ सट्टा में उड़ा दिए थे दादी ने जो पाई पाई से दो लाख रुपये जोड़े थे वो भी अनिल ने चुरा लिए थे। बाहर भी वो चोरियाँ करने लगा था आखिर एक दिन वो पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया सारी चोरियों को उसने कबूल कर लिया अदालत ने उसे कुल मिलाकर एक सौ पैंतालीस वर्ष की सजा दी थी वो अब जेल में था। पिताजी से ज्यादा काम बनता नहीं था। दादी बहुत बूढ़ी हो गई थीं और अब मोहताज थीं। जब बेला घर पर आई तो घर की दयनीय हालत देखकर बहुत दुखी हुई फिर उसने चालीस हजार रुपये प्रतिमाह खर्च कर दादी के लिए अटेन्डर रखा घर की मरम्मत कराई झाड़ू पौंछा बरतन के लिए बाई लगवाई खाना पकाने के लिए भी बाई रखी बीच बीच में वो खुद भी आती जाती रहती थी। बेला को देखकर दादी की आँखों पश्चाताप के आँसू आ जाते थे। जबकि बेला वो सब भुलाकर अपनी नौकरी कर रही थी तथा माता पिता की देखभाल भी कर रही थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 

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