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कहानी: हार्मोनियम

संत स्वभाव के रामदास जी  एक सौ दो वर्ष की आयु में हारमोनियम  पर भजन गाते हुए निधन हो गया था उनकी यात्रा में  पूरा इमली खेड़ा गाँव का जन सैलाब उमड़ पडा  उसमें उनके परिवार का कोई भी शामिल नहीं हुआ था उन्हें मुखाग्नि उनके साथ रहने वाले उनके शिष्य शोभाराम ने दी थी। रामदास जी का अंतिम संस्कार करने के बाद लौटते समय सब उन्हीं की चर्चा कर रहे थे ।
रामदास जी पच्चीस वर्ष पहले हारमोनियम लेकर यहाँ आए थे  और शिवमंदिर के पास बने चबूतरे पर बैठकर भजन गाते थे हारमोनियम के साथ सुरमिलाकर जब वे भजन गाते तो लोग मंत्र मुग्ध होकर सुनते थे पास में ही उनका कुटियानुमा  छोटा सा घर था जिसमें वे शोभाराम के साथ रहते थे शोभाराम का भी दुनिया में कोई अपना सगा नहीं था उसकी उम्र चालीस वर्ष की थी उसकी शादी नहीं हुई थी । वो दस वर्षों से रामदास जी के साथ था पर हारमोनियम बजाना नहीं सीख पाया था उसका कंठ भी अच्छा नहीं था गाना भी नहीं आता था वो तो बस रामदास जी की सेवा करता था और उसी में खुश रहता था कभी कभी रामदास जी  अपने पिछले जीवन के बारे में भी बताते थे  जब उन्हें उनके इकलौते बेटे बंशीलाल ने घर से निकाला तब उनकी उम्र सतहत्तर साल की थी इसके पहले वे सेठ जमनालाल की दुकान पर मुनीम की नौकरी करते थे उस दुकान पर उन्होंने पचास साल नौकरी की थी  जब वे सत्तर साल के हो गए तब सेठ जमनादास जी ने  उनको सेवानिवृत कर दिया तथा एक किराने की दुकान खुलवाकर  उन्हें सौंप दी  साथ ही दस लाख रुपये नगद भी दिए  ये उनकी  ईमानदारी से नौकरी करने का प्रतिफल था वे घर आ गए उनकी पत्नी लीला झगड़ालू स्वभाव की महिला थी उनकी उससे ज्यादा बनती नहीं थी रामदास को हारमोनियम पर भजन गाने का शौक था  जो लीला को पसंद नही था  उनका लड़का राजेश भी एक किराने की दुकान पर काम करता था उसकी लड़की रचना शादी योग्य थी  पर राजेश की गरीबी इसमें आड़े आ रही थी जब राजेश को पता चला कि पिताजी के पास दस लाख रुपये हैं तो वो उनकी खुशामद करने लगा  लीला के व्यवहार में भी परिवर्तन आ गया था उन्हें हारमोनियम  पर भजन गाने की छूट मिल गई थी सभी ने रामदास जी के सीधेपन का फायदा उठाया उनके दस लाख रुपये उनकी पोती रचना की शादी में खर्च करवा दिए राजेश ने किराने की दुकान की नौकरी छोड़ दी थी  और वो रामदास की दुकान पर बैठकर उन्हें सहयोग देने लगा था  रामदास उसकी कुटिलता को नहीं समझ पाए  एक दिन उनकी तबियत खराब हो गई तो वे पन्द्रह दिन तक दुकान पर नहीं जा सके जब वे दुकान पर गए तो राजेश ने यह कहकर  उन्हें घर भेज दिया कि अब आप बुजुर्ग हो गए हैं दुकान मैं सँभाल तो रहा हूँ आपके अब आराम करने के दिन हैं । रामदास  बेटे की चाल समझ नहीं पाए और घर आ गए घर उनका पत्नी के नाम था बनाया उन्हीं ने था  कुछ दिनों तक सब ठीक चलता रहा फिर उनके साथ बुरा बर्ताव किया जाने लगा उनकी पत्नी भी बहू बेटे का साथ दे रही थी  एक दिन घर में खूब लड़ाई हुई रामदास गुस्से में बोले  अगर तुम मुझसे दूर रहना चाहते हो तो निकल जाओ इस पर राजेश बोला मैं क्यों निकलूँ घर से यह घर तो माँ के नाम है और माँ मेरी तरफ है जब रामदास जी ने कहा कि दुकान मेरी है उस पर  अब मत जाना राजेश कुटिलता से बोला वो भी मेरे नाम है । जब तुम बीमार पड़े थे तब आपकी अर्ध मूर्छा का लाभ उठाकर दुकान के कागजातों पर मैंने तुम्हारे दस्तखत करा लिए थे दुकान भी अब मेरी है  सुनकर रामदास चुप हो गए उन्होंने पत्नी की तरफ देखा तो वो चिढ़कर बोली तुम्हें जहाँ जाना है अकेले जाओ मैं कहीं नहीं जाने वाली और फिर वही हुआ जिसका डर था सबने मिलकर उन्हें घर से निकाल दिया  था जाते जाते बहू हारमोनियम निकाल कर उन्हें दे गई बोली इसे भी ले जाओ ये हमारे किसी काम का नहीं। हारमोनियम देखकर उन्हें बड़ी खुशी हुई उन्हें लगा वो अकेले कहाँ जा रहे हैं एक कमाऊ बेटे की तरह हारमोनियम भी तो उनके साथ चल रहा है। वे हारमोनियम लेकर घर से निकल गए और बस स्टैंड पर आकर  देहात की और जाने वाली बस में बैठ गए बस देर शाम को इमली खेड़ा पहुँची बस का वो आखिरी स्टॉप था  गाँव का नाम इमलीखेड़ा था  जो कस्बानुमा था वे चलते चलते गाँव के मन्दिर के पास आ गए शिवजी के दर्शन कर उनसे शरण माँगी । और चबूतरे पर आकर सो गए रामदास जी ने कभी जिंदगी में भीख नहीं माँगी  थी न ही किसी के सामने हाथ फैलाया था । सुबह पाँच बजे उनकी नींद खुली बावड़ी के जल से उन्होंने स्नान किया शिवजी की पूजा की और चबूतरे पर आकर हारमोनियम पर भजन गाने लगे और उसी के आनंद में खो गए।  दो घंटे उन्होंने भजन गाए जिसे कई लोग मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे जब उन्होंने भजन बंद किया तो भीड़ चली गई  उनकी नजर हारमोनियम पर पड़ी तो देखा कि  उसके आस पास रुपये और चिल्लर बिखरी पड़ी है।  जब उसे गिना तो पूरे ढाई सौ रुपये निकले  जो बिना माँगे उन्हें मिले थे इसे उन्होंने  अपना मेहनताना माना उससे उनके दोनों समय के भोजन की व्यवस्था  हो गई थी  बचे पैसे उन्होंने किराने की दुकान वाले अशोक के पास जमा कर दिए थे यह उनके रोज का क्रम हो गया था एक दिन अशोक ने कहा बाबा आप मुझपर इतना भरोसा करते हैं कभी हिसाब लगाया  आप कितना रुपया दे चुके हैं । रामदास बोले हिसाब की जरूरत क्या है अशोक बोला अगर मैं आपका पैसा नहीं लौटाऊँ तो । रामदास बोले मैं मान लूँगा कि मेरे बेटे को इनकी जरूरत रही होगी तो उसने ले लिए। अशोक बोला बाबा घबराओ मत मैं कभी ऐसा नहीं करूँगा  एक दिन अशोक मंदिर के पास बने एक छोटे से नवनिर्मित  घर में ले गया और उसका ताला खोलकर उन्हें अंदर ले आया घरमें जरूरत का सब  सामान था।  अशोक ने कहा बाबा यह घर आपका है आपके पैसों से बना है।  रामदास जी ने इसे प्रभु की लीला समझी और  अपने घर में खुशी से प्रवेश किया । बाद में शोभाराम भी उनके साथ रहने लगा था  पच्चीस साल तक वे उस किराना दुकान पर पैसा जमा करते रहे थे।  एक दिन अशोक ने उनसे कहा आपको जो इतना सारा रुपया जमा हो गया उसका क्या करूँ तब रामदास जी ने कहा था  मेरे मरने के बाद गाँव में अस्पताल बनवा देना और  होस्टल खोल देना  दो दिन पहले ही उन्होंने अशोक से यह बात कही थी और आज सुबह भजन गाते हुए आलाप लेते समय उन्हें जोर की खाँसी आई जिससे उनका प्राणान्त हो गया था।  मरते समय भी उनके चेहरे पर मोहक मुस्कान थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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