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कहानी: फिर छोटे मकान में

सोबरन सिंह कुश्वाह अपने नवनिर्मित बड़े मकान में बमुश्किल छः महीने ही रह सकेथे  जब मन नहीं लगा तो फिर वही पुराने छोटे मकान में रहने के लिए आ गए थे आने के बाद बड़खुचुश दिखाई दे रहे थे कॉलोनी वाले भी उन्हें देखकर बड़े खुश नजर आ रहे थे।
कुश्वाह जी सरकारी अस्पताल में ड्रेसर के पद पर कार्यरत थे छः महीने पहले ही  वे सेवानिवृत हुए थे सेवानिवृति के साथ ही वे शहर से सात किलोमीटर दूर नव विकसित कॉलोनी में बने अपने नव निर्मित मकान  में रहने चले गए थे यह मकान बारह सौ वर्गफुट के प्लॉट साइज पर डुप्लेक्स बना था। सर्वसुविधा युक्त होने के बाद भी कुश्वाह जी को वहाँ रहना अच्छा नहीं लगा पत्नी शीला भी उस मकान में बेचैनी से रह रही थी बहू बेटे दूसरे शहर में रह रहे थे बेटी भी बाहर जॉब कर रही थी। वे कभी कभार ही घर आते थे । तब घर में रौनक रहती उनके जाने के बाद इतने बड़ा घर उनको सूना सा लगता था।  शहर से इतनी दूर होने के कारण कोई किरायेदार भी नहीं मिल रहा था रिटायरमेंट के बाद कुश्वाह जी के पास फुरसत ही फुरसत थी पर उनका समय काटे नहीं कटता था यहाँ एक दो लोगों से उन्होंने परिचय बढ़ाने की कोशिश की पर निराशा हाथ लगी  किसी ने रुचि नहीं ली यहाँ सब अपने में मगन रहने वाले लोग थे इस लिए कॉलोनी में बेजान सन्नाटा पसरा रहता था। एक दिन  एक घर में रात में लुटेरों ने धावा बोल दिया। घर के लोग खूब चीखे चिल्लाए पर कोई उन्हें बचाने नहीं आया लुटेरे उन्हें आराम से लूटकर तधा घायल कर चले गए पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली पर गवाही देने  वाला कोई नहीं मिला। एक घटना ने और सोबरन सिंह को विचलित कर दिया जब चोर दिनदहाड़े तीसरी लाइन के बंद मकान में आए इत्मीनान से उन्होंने ताला खोला जो लोडिंग ऑटो वो लाए थे उसमें घर का सामान रखा जेवर नकदी पर हाथ साफ किया और देखते ही देखते चलते बने न किसी ने उन्हें रोका न टोका न ही किसी तरह की पूछताछ की। जब घर मालिक आए तो सरेआम हुई चोरी से बड़े दुखी हुए पड़ोसी से उनकी कोई बातचीत ही नहीं होती थी वे अपने पड़ोसी का नाम तक नहीं जानते थे क्या करते न चोरी का सामान मिला और न ही चोर पकड़ाए  इन घटनाओं ने सोबरन सिंह  के मन में डर भर दिया शीला ने कहा यहाँ हर चीज मँहगी है सब्जी तो चार गुना तक मँहगी है गर्मी में पानी की कमी हो जाती है लोगों को टैंकर से पानी मँगवाना पड़ता है टैंकर वाला भी मनमाने पैसे वसंल करता है सिटी तक जाने के भी यहाँ बहुत कम साधन हैं क्या करें इससे तो अपना पुराना घर ही अच्छ था छोटा था तो क्या हुआ ऐसा तो नहीं था। उस घर में कितनी रौनक थी घर के पीछे ही बाजार लगा हुआ था जहाँ हर चीज किफायत से मिलती शहर के बीच में होने से सब्जी सस्ती मिलती थी आवागमन सुगम था एक पल भी प्रतीक्षा में नष्ट नहीं होता था। क्या करें सोबरन सिंह बोले वो मकान मैंने  तीस साल पहले बनवाया था जब नौकरी करते हुए मुझे आठ साल ही हुए थे तब शहर का इतना विस्तार नहीं हुआ था  उनके पास ज्यादा रुपये नहीं  थे पलॉट भी छोटे थे सोबरन सिंह ने मात्र बारह हजार रुपये में बारह बाई तीस का छोटा सा भूख॔ड लिया था जिसमें एक कमरा एक किचन नीचे और एक कमरा एक बरामदा ऊपर बना हुआ था उस समय पूरा मकान पचास हजार  हजार रुपये में बन गया था। वो आराम से उसमें तीस साल से  रह रहे थे वहाँ से उनकी अस्पताल भी पास थी। उनके घर के पीछे की दो लाइनों में अच्छा भला बाजार था वे जहाँ रहते थे वो रस्ता भी दिन रात चलता था। उनके आस पास छोटे दुकादार रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले रहते थे सब एक दूसरे से घुले मिले थे और वक्त आने पर एक दूसरे के काम आते थे यहाँ जैसा माहौल वहाँ का नहीं था आखिर सोबरन सिंह ने बहुत सोच समझकर पुराने घर में जाने का निर्णय ले लिया था वो तो ये अच्छा हुआ की वो घर उन्हों बेचा नहीं था जबकि उसके ग्राहक तो रोज ही आ रहे थे। सोबरन सिंह ने पुराने घर में आकर राहत की साँस ली थी उनके पुराने दिन फिर लौट आए थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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