रत्नाकर पच्चीस साल पहले वर्ग एक के शिक्षा कर्मी इसलिए नहीं बने क्योंकि वे सहायक शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। यह उनकी बेबसी थी की अपनी पक्की तौकरी छोड़कर वो नौकरी कैसे करें जो पूरी तरह अस्थायी और सरकारी भी न हो। पर आज वे ये सोचकर दुखी थे कि उनके साथ इंग्लिश में एम ए करने वाला चंद्रमोहन उनसे कम नंबर लाने के बावजूद उस समय शिक्षाकर्मी बनकर आज उनका संकुल प्राचार्य था तथा वे उससे कनिष्ठ होकर प्राइमरी के शिक्षक बनकर रह गये थे।
जब रत्नाकर जी ने इंग्लिश में एम ए किया था तब शिक्षा विभाग में इंग्लिश के व्याख्याताओं की बहुत कमी थी। उनके प्रोफेसर आर के सक्सेना जी ने उनके पास होने पर बधाई देते हुए कहा था कि वे भी जल्दी व्याख्याता बन जाएँगे। लेकिन उनकी किस्मत ने साथ नहीं दिया शासन ने व्याख्याता के पद को डाइंग कैडर में रखकर नया पद शिक्षाकर्मी बनाकर पंचायत के अधीन कर दिया यह पद पूरी तरह अस्थायी था तथा नियुक्ति शिक्षा सत्र की समाप्ति तक ही थी रत्नाकर चाहकर भी उस पद पर आवेदन नहीं कर सके थे क्योंकि वे सहायक शिक्षक थे जो स्थायी शासकीय पद था। वे बेबस होकर रह गए थे जबकि उनकी व्याख्याता बनने की बड़ी तमन्ना थी जो मन में ही घुटकर रह गई थी दूसरी और उनका मित्र चँद्र मोहन एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहा था उससे बेहतर उसे ये शिक्षाकर्मी की नौकरी लगी और वो वर्ग एक का शिक्षाकर्मी बनकर हायर सेकेण्डरी स्कूल में आ गया दोनों के वेतन में बहुत अंतर था चँद्र मोहन को बारह सौ रुपये वेतन मिलता था और रत्नाकर जी को छः हजार रुपये वे इतने कम वेतन वाली अस्थायी नौकरी कैसे करते इसलिए बेबस होकर मनमसोसकर रह गए। इधर प्रदेश के सारे शिक्षाकर्मियों ने एक होकर आँदोलन किया शासन को उनका पदनाम बदलना पड़ा उनका वेतन भी बढ़ा दिया गया उनके संगठन ने लगातार संघर्ष करके शासन से वे सब लाभ ले लिए जो सरकारी कर्मचारियों को मिलते समान कार्य समान वेतन की माँग कर आँदोलन किया और वो माँग भी पूरी करा ली अगले चरण में आँदोलन कर शिक्षा विभाग में अपना संविलियन भी करा लिया अब चँद्रमोहन भी रत्नाकर की तरह सरकारी कर्मचारी बन गए थे। और उनसे वरिष्ठ चँदूरमोहन अब राजपत्रित अधिकारी थे। रत्नाकर चालीस साल की सेवा के बाद भी प्राइमरी के टीचर बने हुए थे। पिछले दिनों जब प्रमोशन लिस्ट निकली तो चँद्रमोहन का प्राच्रय पद पर प्रमोशन हो गया अब वे संकुल प्राचार्य होने के कारण रत्नाकर जी के अधिकारी थे उनके स्कूल का निरीक्षण करने और चूक पर उनके खिलाफ कार्यवाही करने का पूरा अधिकार चँद्रमोहन जी के पास था रत्नाकर जी के दुख और बेबसी का कारण यही था कि उनका प्रमोशन भी इसलिए नहीं हो सका था क्योंकि सारे पद शासन ने शिक्षाकर्मियों से भर दिए थे। और वे बिना किसी प्रमोशन के चालीस साल की नौकरी करने के बाद योग्यता हासिल करने के बावजूद तीन माह में सहायक शिक्षक के पद से ही रिटायर होने वाले थे। उनके दुख की बात यह भी थी कि उनका जो प्रभारी था वो उनसे पन्द्रह साल जुनियर था और सिर्फ बी ए पास था और वे हिन्दी अंग्रेजी में एम ए करने के बाद भी उसके अधीनस्थ थे और प्रमोशन न होने का मलाल लेकर रिटायर होने वाले थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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