जिस चाचा ने अपने बेटे की तरह भतीजे पूरन सिंह को रखा था उसी भतीजे ने बुढ़ापे में उनका साथ छोड़ दिया था उनके निधन होने पर वो उनके अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ था जिस चाची ने उसे माँ से बढ़कर दुलार किया था उनकी भी उसने कोई खोज खबर नहीं ली थी। यह बात चाची सुमन की बेटी निर्मला ने जब बताई तो सुनने वालों ने यही कहा कि चाचा चमनलाल और चाची सुमन ने कोयल के बच्चे को अपना समझ के पाला था जो बड़ा होते ही अपने पालक को छोड़कर अपने परिवार में शामिल हो गया था।
चाचा चमन लाल की दो बेटियाँ थीं उनके एक बेटा भी हुआ था जो दस दिन तक ही जीवित रहा था तथा इलाज और देखरेख के अभाव में मर गया था। चमनलाल उस समय परदेश में काम कर रहे थे उनकी पत्नी सुमन उनके बड़े भाई के यहाँ रह रही थीं भाभी लता ने जिम्मेदारी ली थी उनकी डिलेवरी कराने की वे गर्भवती थीं। भाभी के दो लड़के और एक लड़की थी उनके बड़े बेटे का नाम प्रेम नारायण और छोटे का नाम पूरन सिंह था। पूरन सिंह काला और कुरूप था लता उससे चिढ़ी रहती थीं। जब सुमन की डिलेवरी हुई तो जो बच्चा हुआ वो गोरा तथा सुंदर था। जिसे देखकर लता को ईर्ष्या हुई सुमन को तो तीन दिन होश नहीं आया था इस बीच लता ने बच्चे का बिल्कुल ख्याल नहीं रखा जबकि चमनलाल से उसने पूरे पैसे पहले ही ले लिए थे। सुमन को जब होश आया तब वो इतनी कमजोर थीं की ठीक से उठ बैठ भी नहीं पा रही थीं दूध उनके आँचल में उतर नहीं रहा था। लता की इस उपेक्षा ने उस मासूम बच्चे की जान ले ली उसे आँगन में लिटाकर वो जो सुबह की गई तो शाम को आई तब तक लड़का दिन भर धूप में पड़ा रहा था दस दिन से लता ने उसे खाने को कुछ भी नहीं दिया था वो इतना कमजोर हो गया था लगभग बेसुध रहने लगा था। शाम को जब लता आई तब तक बच्चे के प्राण पखेरू उड़ चुके थे लता को इसका कोई दुख नहीं था बल्कि चेहरे पर कुटिल मुस्कुराहट थी। सबसे ज्यादा दुखी चमनलाल थे। लता मगरमच्छ के आँसू बहा रही थी। चमनलाल जी को ज्यादा दुखी देख उनके बड़े भाई चंपालाल जी ने कहा दुखी मत हो हमारे बेटे भी तुम्हारे हैं लता ने अपने छोटे बेटे पूरन सिंह को चमनलाल की गोद में बिठाते हुए कहा आज से इसे अपना बेटा समझो हमने इसे तुम्हें सौप दिया। इससे चमनलाल जी को कुछ सांत्वना मिली। सुमन अपनी जेठानी के व्यवहार से आहत थी उसने पैसे लेने के बाद भी उन्हें भरपेट खाना तक नहीं दिया था फल फ्रूट देने का तो सवाल ही नहीं उठता था। सुमन की जिद पर चमनलाल उसे तथा अपनी दोनों बेटी सुमन और निर्मला को लेकर इन्दौर गए। लता ने पूरन सिंह को भी उनके साथ भेज दिया। सुमन उसे बेटे की तरह ही रखतीं थीं दोनो बेटियाँ यही समझती थीं की पूरनसिंह उनका सगा भाई है। पूरन सिंह कभी चमनलाल जी के यहाँ रहता कभी अपने पिता चंपालाल के यहाँ रहने आ जाता था। कुछ सालों तक पूरन सिंह चमनलाल जी के पास नहीं आया पर उसका सारा खर्च चमनलाल उठाते रहे जब पूरन सिंह विवाह योग्य हुआ तो चंपालाल ने उसकी शादी की जिम्मेदारी चमनलाल पर डाल दी चमनलाल जी ने उसका विवाह एक सुंदर लड़की रूपा से करा दिया। उस समय इंदौर में चमनलाल अपना मकान बनवा रहे थे इसलिए शादी के बाद पूरनसिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी के साथ चंपालाल जी के पास ही रहने लगा था। चमनलाल जी की इन्दौर में फर्नीचर की दुकान थी जिससे उनकी कमाई अच्छी हो रही थी और वे अपना मकान बनवा रहे थे किराये के मकान में इतनी जगह नहीं थी कि वे बहूबेटे को रख सकते इसलिए वे मकान बनवा रहे थे ताकि पूरनसिंह और उसकी पत्नी को अच्छे से रख सकें। उधर पूरनसिंह अपनी पत्नी रूपा के साथ चंपालाल के यहाँ रह रहा था जहाँ लता का व्यवहार रूपा के प्रति अच्छा नहीं था। पूरनसिंह कुछ कमाता तो था नहीं चमनलाल जी जो पैसे भिजवाते उसी से अपना खर्च चलाता था। लता के अत्याचार रूपा पर दिनोंदिन बढ़ते जा रहे थे एक दिन जब रूपा के पिता बेटी का हालचाल मालूम करने आए तो रूपा की आँखों में आँसू और उसकी हालत देखकर सब कुछ समझ गए रूपा कह रही थी बाबूजी यहाँ से मुझे ले चलो। रूपा के पिताजी उसे लेकर मायके आ गए मायके में रूपा माँ से लिपटकर देर तक रोती रही उसने यही कहा कि ऐसी जगह शादी करने से तो अच्छा था कि तुम मुझे कुएँ में धकेल देते। माँ ने कहा आगर तू नहीं जाना चाहती तो मत जाना यहीं रह मेरी बेटी कोई बोझ थोड़ी है। इधर रूपा के जाने से काम का सारा भार लता पर आ गया था दोनों बेटी कोई काम नहीं करती थी चंपालाल जी की कमाई इतनी नहीं थी कि वे कोई नौकरानी रख लेते। आखिर लता ने पूरनसिंह से कहा कि बहु को मायके में पंद्रह दिन हो गए अब उसे लिवा ले यहाँ काम की परेशानी है इतना सारा काम मुझसे नहीं होता। पूरन सिंह शादी के बाद पहली बार अपनी ससुराल गया था। पर वहाँ उसका कोई स्वागत सत्कार नहीं हुआ रूपा उसे देख डर कर काँपने लगी रूपा के पिता ने पूरनसिंह से कहा मेरी बेटी को इतने दुख देने के बाद किस मुंह से आए हो इसे लेने चले जाओ ऐसे ही फिर कभी यहाँ अपना काला मुँह मत दिखाना तुम्हारे जैसे काले कलूटे आदमी से मैंने अपनी लड़की की शादी कर बड़ी गलती की। पूरन सिंह यह सुनकर झगड़े पर उतारू हो गया तभी रुपा के पिताजी के इशारे पर चार लोगों ने पूरनसिंह को जकड़ लिया फिर रूपा के पिता बोले यहाँ आकर झगड़ा करने की आज के बाद कभी सोचना भी मत वरना हाथ पैर तोड़े बिना यहाँ से नहीं जाने दूँगा। पूरनसिंह मुँह लटकाए घर आ गया लता ने जब अकेले पूरनसिंह को आते देखा तो गुस्से से लाल हो गई अब वो पूरन सिंह को प्रताड़ित करने लगी एक दिन बोली कमाता धमाता तो कुछ नहीं है हमारी छाती पर कब तक मूँग दलेगा निकल जा मेरे घर से मेरे लिए तू मरे के समान है अब चाहे रेल से कट या फाँसी लगाकर मर जा मुझे कोई मतलब नहीं । घर से निकाले जाने के बाद पूरन सिंह एक रिश्तेदार के यहाँ शादी शामिल होने आया वहाँ चाची को देखकर रोने लगा चाची को सारी बातें बताई चाची बोली तू चिंता मत कर तू हमारा बेटा है। चाची पूरनसिंह को इंदौर लेकर आ गईं। चाचा चमनलाल पूरनसिंह के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले बेटा चिंता मत कर मैं हूँ ना चमनलाल छोटे मोटे आदमी नहीं थे उनका फर्नीचर का अच्छा कारोबार था समाज में उनकी खूब प्रतिष्ठा थी। समाज के सभी प्रतिष्ठित लोगों को साथ लेकर वे पूरन सिंह की ससुराल पहुँच गए और रूपा के पिता से बोले अगर तुममें दम हो तो हमारे हाथ पैर तोड़कर बताओ। रूपा के पिता तो समाज की इतनी बड़ी बड़ी विभूतियों को देखकर घबरा गए फिर बोले मैं अपनी बेटी भेजने को तैयार हूँ शर्त यही है कि दामाद जी अलग रहें तब चमनलाल जी ने कहा मैं बहु रूपा को और बेटे पूरनसिंह को इन्दौर ले जा रहा हूँ वहाँ हमारा बड़ा मकान है फर्नीचर की बड़ी दुकान है तुम्हारी बेटी वहाँ सुख से रहेगी यह सुनकर रूपा ने भी हामी भर दी रूपा के पिता ने भरे गले से कहा बेटी आपको सौंप रहा हूँ इसका ख्याल रखना चमनलाल ने और सुमन ने रूपा को बड़े लाड़ दुलार से रखा पूरनसिंह को फर्नीचर का काम सिखाया उसके लिए फर्नीचर की दुकान खुलवाई उसके नाम प्लॉट खरीदा पूरन सिंह बेईमान निकला उसने चाचा के विश्वास का अनुचित फायदा उठाकर रूपयों में हेराफेरी करना शुरू कर दी। इधर पूरन सिंह को अमीर होते देखकर लता की ममता छलक पड़ी उसकी बहन अपने भाई पर अधिकार जताने लगी एक दिन चमनलाल की बेटियों और उनके बड़े भाई चंपालाल की बेटी में इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि पूरन सिंह किसका भाई है फैसला लता ने किया उसने कहा पूरनसिंह मेरे पेट से जन्मा है इसिलिए वो तेरा भाई है चमन की लड़कियों का सगा भाई नहीं है। यह सुनकर चमन की बेटी बड़ी दुखी हुईं चमन का भी दिल टूट गया था सुमन को आज लग रहा था कि वो दो बेटियों की मां है उसका बेटा तो पैदा होने के दस दिन बाद ही मर गया था। चमनलाल को पूरनसिंह की गतिविधियों पर कुछ दिनों से संदेह हो रहा था। उन्होंने जब पता किया तो मालूम पड़ा कि पूरनसिंह ने दुकान का भट्टा बिठा दिया है माल तो खरीदा पर भुगतान नहीं किया कस्टमरों से भी एडवाँस में अच्छी खासी रकम वसूली है। उन रुपयों से पूरन सिंह ने अपनी दुकान चमका ली है अपना मकान बनवा लिया है तथा गाँव के घर को भी पक्का करा दिया है गाँव में पिता के नाम से भी दुकान खुलवा दी है। चमनलाल जी ने जब पूरनसिंह से इस विषय में पूछा तो झगड़े पर उतारू हो गया और यह कहकर अलग हो गया कि अब मुझे आपके साथ रहकर कोई काम नहीं करना है। कोयल का बच्चा बड़ा होकर उड़ कर अपनों में जाकर मिल गया था। चमनलाल जी को अपनी पत्नी के सारे जेवर बेचने पड़े मकान बिक गया दुकान बिक गई सारी जमा पूँजी खर्च हो गई तब कहीं वे अपनी साख बचा पाए नहीं तो दिवालिया होने की नौबत आ गई थी। पूरनसिंह ने इसके बाद कभी अपने चाचा चाची की खबर नहीं ली न कभी चचेरी बहनों से राखी बँधवाई चमनलाल जी को पूरे दस वर्ष लग गए अपने घाटे से उबरने में। बुढ़ापे में उनकी दोनों बेटियों दोनों दामादों तथा नाती और नातिनों ने साथ दिया था। आज वे दोनों इस दुनिया में नहीं थे। पर मरते दम तक भी वे पूरनसिंह के विश्वासघात को नहीं भूले थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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