नगर के अच्छे साहित्यकार प्रकाश प्रखद की हिन्दी ग़ज़ल की पहली किताब रजत कण को प्रकाशित हुए छॆ महीने हो चुके थे उसकी एक भी प्रति नहीं बिकी थी जबकि वे लगभग सौ किताबें उन को बाँट चुके थे जिन्हें पुस्तक देना वे बहुत जरूरी समझते उनमें से किसी ने भी पुस्तक की कीमत देना उचित नहीं समझी थी। बाकी प्रतियाँ उनके घर में रखी धूल खा रही थीं किताब प्रकाशन से लेकर विमोचन तक उनका दो लाख रुपया खर्च हो गया था । जिससे उनकी पत्नी उनसे खिन्न रहती थी अक्सर कहा करती अपनी गाढ़ी कमाई के दो लाख रुपये आपने बर्बाद कर दिए वो भी इस बुढ़ापे में उससे हासिल क्या हुआ। प्रकाश प्रखर भी इसी बात से दुखी रहते थे।
प्रकाश जी को पुस्तक प्रकाशित कराने में पूरे तीन वर्ष का समय लगा था। वे निर्विवाद रूप से शहर के सबसे अच्छे कवि थे उत्कृष्ट हिन्दी ग़ज़ल लिखते थे सभी विधाओं में माहिर थे इसकः बाद भी अपने काव्य सृजन से उन्हें आज तक एक रुपया भी प्राप्त नहीं हुआ था। पिछले दिनों जब प्रखर जी ने सुना कि एक मंचीय कवि जिसनेअपने जीवन में कुल पच्चीस कविताएँ लिखीं थीं उसने एक कार्यक्रम के अठारह लाख रुपये लिए तो उन्हें बड़ी हैरत हुई प्रखर जी की तो जेब से साहित्य के नाम से हर साल पाँच से दस हजार रुपये तक खर्च होते रहे थे। तीन साल पहले प्रखर जी के साहित्यिक मित्रों ने दवाब बनाया कहा आप इतने अच्छे कवि हैं इस शहर में आपके टक्कर का कोई कवि नहीं है आप एक किताब तो छपवा लें देखना किताब छपते ही आप हर तरफ छा जाएँगे। प्रखर जी भी उनकी बातों में आ गए और किताब छपवाने की भूल कर बैठे। प्रकाश जी हिन्दी में प्रथम श्रेणी में एम ए होने के बाद भी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे जो शहर से तीस किलोमीटर दूर शेरपुर गाँव में था।अगर उनके साथ धोखा नहीं होता तो वे पी एच डी होते पर उनकी थीसिस जिसने चुराई थी पे सतीश पुँज महाविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर थे उनका बड़ा नाम था वे प्रसिद्ध आलोचक समीक्षक और बहुत कुछ थे उनकी किताबें पाठ्यक्रम में लगी थीं। हर महीने पचास हजार रुपये की रायल्टी उन्हें मिल रही थी जबकि प्रकाश प्रखर योग्य होने के बाद भी उपेक्षित थे पच्चीस वर्ष पहले जब प्रकाश प्रखर ने पी एच डी में अपना रजिस्ट्रेशन कराया तब सतीश पुँज भी पी एच डी कर रहे थे उनके गाइड जयेश जी थे प्रकाश जी तब भी प्राथमिक स्कूल के शिक्षक ही थे प्रकाश जी ने पी एच डी के लिए खूब मेहनत की और सतीश पुँज जी ने गाइड की चापलूसी सतीश जी के रिश्तेदार यूनिवर्सिटी में बड़े पद पर थे। उनके चाचा विधायक थे। इसका नतीजा यह हुआ कि प्रकाश जी की थीसिस रिजेक्ट कर दी गई और उन्हें पी एच डी नहीं दी गई। छः महीने बाद अखबार में सतीश पुँज को पी एच डी मिली खबर पढ़कर प्रकाश प्रखर जी को बड़ी हैरत हुई जो थीसिस उन्होने लिखी थी बस उसका मुख्पृष्ठ ही बदला गया था बाकी सब ज्यों का त्यों था प्रकाश प्रखर जी जब गाइड के पास ऐतराज जताने पसुँचे तो उसने धमकाते हुए कहा तुम एक मामूली प्राइमरी मास्टर हो अपनी औकात में रहो डी ई ओ साहब मेरे मित्र हैं । तुम्हें सस्पेणाड कराने में मुझे एक पल की भी देर नहीं लगेगी तुम जिस पर आरोप लगा रहे हो उसके चाचा शिक्षा मंत्री बनने वाले हैं।यह बात सुनकर प्रकाश जी अपना सा मुँह लेकर आ गए। उधर सतीश पुँज उसी पी एच डी के आधार पर हिन्दी के प्रोफेसर बन गए थे। प्रकाश जी ने अपने आपको पूरी तरह लेखन में डूबा दिया उन्हें नाम तो मिला वाह वाही भी हुई पर रूपया आज तक नहीं मिला। सोचा था किताब छप जाएगी तो चमत्कार हो जाएगा पर वो भी नहीं हुआ जब वे किताब छपवाने के लिए प्रयासरत धे तब जो भी प्रकाशक मिले सभी ने यही कहा कि प्काशन का पूरा खर्च आपको उठाना पड़ेगा उसमें एक सोसाठ पेज की किताब की लागत पिचहत्तर हजार रुपये आ रही थी उसकी व्यवस्था प्रखर जी ने जैसे तैसे की किताब की भूमिका लिखवाने के लिए वे सतीश पुँज जी के पास गए सतीश पुँज को कभी प्रकाश जी कविता लेखन में मार्गदर्श करते थे आज उन्हीं सतीश जी के दिमाग सातवें आसमान पर थे उन्होंने भूमिका लिखने के लिए किताब तो ले ली पर आठ महीने तक प्रखर जी से खूब चक्कर लगवाने के बाद भी भूमिका नहीं लिखी एक दिन जब ज्यादा आग्रह किया तो बोले इसके लिए मूड बनाना पड़ेगा प्रखर जी नेशउनके लिए शहर के सबसे मँहगे रिसार्ट में दो दिन ठहरने की व्यवस्था की प्रखर जी ने कभी जीवन में शराब छुई तक नहीं थी लेकिन पुँज जी के लिए मँहगी शराब की व्यवस्था की दो दिन बाद पुँज जी ने भूमिका तो लिख दी पर दस हजार रुपये के चैक की माँग की प्रखर जी ने वो चैक भी दे दिया । आखिर किताब छपकर आ गई अब उसका विमोचन होना था उसके लिए प्रकाश जी ने एक साहित्यिक संस्था के सर्वेसर्वा से बात की उन्होंने दस हजार रुपये का चँदा माँगा हॉल का किराया आमंत्रण पत्र चाय नाश्ता और भोजन की व्यवस्था प्रखर जी ने ही की उसमें उनके पिचहत्तर हजार रुपये खर्च हो गए थे। विमोचन के बाद प्रकाश जी बड़े ऊँचे सपने देखने लगे थे किताब की समीक्षा के लिए उन्होंने पूरे देश कः विभिन्न संस्थानों में किताब भेजो पर किसी ने उनकी किताब की समीक्षा नहीं की हारकर वे शहर के एक अखबार के सह संपादक से मिले उन्होंने समीक्षा छापने की बात तो की पर एक पूरी बॉटल अंग्रेजी शराब की माँगी प्रखर जी ने उन्हें वो भी उपल्ब्ध कराई तब कहीं किताब की समीक्षा प्रकाशित हुई पर उसका भी कोई खास असर नहीं पड़ा छपी हुई किताबों का ढेर अभी उनके घर में धूल खा रहा था। कालजयी लेखक बनने का प्रखर जी का सपना दरकने लगा था । अब उनके पास सिवाय दुख और पछतावे के कुछ नहीं था। उनका मनोबल टूट चुका था दूसरी किताब छपवाने का तो सवाल ही नहीं उठता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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