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कहानी: उल्टी चाल

कृषि विकास अधिकारी हरीश मिश्रा का छः महीने बाद निलंबन समाप्त हुआ था । आज उन्होंने अपनी नौकरी ज्वाइन कर ली थी आज वे बहुत खुश थे और अपने आपको हल्का महसूस कर रहे थे।
हरीश अपनों की  साजिश का शिकार हो गए थे जिसके कारण उन्हें सस्पेण्ड कर दिया गया था जिन्होंने सस्पेण्ड कराया था वे सबसे यही कह रहे थे हम इसकी नौकरी खाकर मानेंगे वे हर तरफ से असहाय हो गए थे कहीं कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही थी अपनी पंद्रह साल की नौकरी में पहली बार उनके साथ ऐसा हुआ था।  वे सब तरफ से निराश होकर बस स्टेण्ड  के पास एक पुलिया पर बैठे हुए थे। तभी किसी ने उनकी पीठ पर हाथ रखा जब उन्होंने मुड़कर देखा तो कुर्ता पजामा पहने हुए एक अजनबी से व्यक्ति उन्हें मुस्कुरा कर  देख रहे थे। बोले पहचाना मुझे जब हरीश ने गौर से उन्हें देखा तो फौरन पहचान गए बोले तुम अशोक हो न अशोक बोले सही पहचाना  वे बोले आजकल क्या कर रसे हो अशोक जी बोले  शाजापुर जिले में जिला पँचायत का उपाध्यक्ष हूँ कोई काम हो तो बताना । हरीश बोले काम तो है फिर उन्होंने विस्तार से सारी बातें अशोक जी को बताईं अशोक जी बोले  बस इतनी सी बात है मुझे दस दिन का समय दो तुम्हारा निलंबन समाप्त कराकर  तथा  बहाल कराकर ही दम लूँगा अशोक जी की बात सुनकर हरीश जी को बड़ी राहत मिली वो उन्हें उनकी कार तक छोड़ने आए पिचहत्तर लाख की गाड़ी देख हरीश चकित रह गए थे। अशोक जाते जाते बोले किसी दिन गरीबखाने पर भी तशरीफ लाओ हरीश बोले जरूर आऊँगा। अशोक जी ने अपना वादा निभा दिया था दस दिन में उनका निलंबन समाप्त होने के आदेश उन्हें मिल गए थे साथ ही उनकी पदस्थापना जिला मुख्यलय पर स्थित कृषि संचालक के कार्यालय में हो गई थी। पदभार ग्रहण करने के बाद वे आभार प्रगट करने  के लिए जब अशोक जी के घर पहुँचे तो पता चला कि वो उनका गरीबखाना नहीं आलीशान बँग्ला है।  उनकी पत्नी अलका कॉलेज में प्रोफेसर थी  अशोक जी ने अलका से उनको मिलवाते हुए कहा  ये हरीश हमारी कक्षा का सबसे मेधावी छात्र रहा है हम सहपाठी हैं। यह हर साल कक्षा में प्रथम आता था और मैं हमेशा थर्ड डिवीजन में पास हुआ मैंने समाज शास्त्र में एम ए किया और इसने  कृषि विज्ञान में एम एस सी यह कृषि विभाग में अधिकारी बन गया और मैं राजनीति में आ गया।  अशोक के वैभव देखकर  हरीश बोले आखिर ऐसा कौन सा खजाना भिल गया जो तुम्हारे दिन बदल गए अशोक बोले मैं किसी से कुछ माँगता नहीं हूँ लोगों के काम करा देता हूँ पैसा अपने आप चलकर आता है । जब तबादले का सीजन आता है तब दो करोड़ रुपये तक की कमाई आराम से हो जाती है।  हरीश अशोक की बात सुनकर चकित हो रहा था फिर कुछ याद कर के बोला अशोक भले ही तुम मे रे सहपाठी  हो पर तुमने मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया है मेरी नौकरी बचा ली है। मैं यह दो लाख रुपये की भेंट तुम्हें देना चाहता हूँ मना मत करना यह सुनकर अशोक बोले  यह नोटों की गड्डियाँ देखते देखते और गिनते गिनते मैं  थक गया बूँ पहले ही घर में पैसों का अंबार लगा है। तुम्हारा काम  मैंने अपनी खुशी के लिए किया है । तुम्हारी मम्मी के हाथ के पराँठे और आलू की सूखी सब्जी का स्वाद आज भी याद है ये रुपये ले जाओ ये मेरे तो ज्यादा काम नहीं आएँगे पर तुम्हारे लिए ये एक बड़ी रकम है।  हरीश आया तो था अहसान का  बोझ उतारने और लोट रहा था दुगुने अहसानों का बोझ लादकर। हरीश को अपने स्कूल के दिन याद आ रहे थे। उन दिनों ऐसा कोई दिन नहीं जाता था जब!अशोक को सजा न मिलती हो और वो तो सभी शिक्षकों का चहेता था हरीश को भविष्य को सब उजला कहले थे । और अशोक को कहते कि वो अपने हाथों से अपना जीवन बर्बाद कर रहा है।  हरीश तो अधिकारी बन गए थे वेतन भी अच्छा था उधर अशोक जी विधायक जी के चहेते बन गए विधायक जी ने उन्हें अर्जी नवीस  बनवाकर तहसील में बिठा दिया वो एक तरह से विधायक के एजेंट हो गए थे। फिर पार्षद के चुनाव आए वे चुनाव में खडे हो गए चुनाव  में जीत अशोक जी की हुई इससे उनके राजनैतिक जीवन की शुरूआत हो गई  दोनों हाथों से अशोक जी ने पैसे कमाए  इन पँद्रह सालों में हरीश एक छोटा सा घर तक नहीं बनवा पाए। जबकि अशोक जमीन से उठकर आसमान छूने जा रहे थे। बहरहाल वे आज बहुत खुश थे और अशोक जी को दिल से दुआएँ दे रहे थे। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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