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कहानी: खँडहर

प्रभात पन्द्रह वर्ष बाद अपना घर देखने आया  था वो घर जिसका निर्माण कर वो उसमें अपने परिवार के साथ मात्र तीन साल ही रहा था वही  अब पूरी तरहखँडहर में बदल चुका था उसके दरवाजे खिड़की रेलिंग पानी की टंकी पाईम सब उखाड़कर लोग ले गए थे कुछ पुराने लोग उसे पहचान गए थे पर वे भी घर की इस दशा के विषय में ज्यादा कुछ कह न सके थे।
प्रभात सरकारी स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्यरत थे अठारह वर्ष पूर्व तक वे संयुक्त परिवार में रहते थे। उन्नीस वर्ष की आयु में जब उनकी  सरकारी नौकरी लगी थी  तब वे अपने पापा मम्मी और चार भाई बहनों के साथ किराये के मकान में रहते थे पिताजी भी सरकारी नौकरी करते थे उस वक्त उनकी तनख्वाह बहुत कम थी जिसमें महीने का खर्च मुश्किल से चलता था। ऐसे में प्भात की नौकरी ने घर की हालत सुधारने में बड़ा योगदान किया  प्रभात ने अपनी तन्ख्वाह से पाई पाई जोडकर एक प्लॉट खरीदकर उस पर छोटा सा मकान बनाया था। तब कहीं उनको किराये के मकान से मुक्ति मिली थी बाद में उसमें दो और कमरे बनवाए गए प्रभात के मार्गदर्शन एवं शिक्षण से उनके छोटे भाई मधुकर की भी सरकारी नौकरी लग गई थी प्रभात ने धन का सही प्रबंधन किया पहले प्रभात की शादी हुई फिर उसकी बहन राखी की शादी की इसके बाद उसके छोटे भाई मधुकर की शादी । परिवार को अच्छी स्थिति में लाने में प्रभात का बडा योगदान था भाई की शादी होने के बाद जब घर में जगह की कमी होने लगी तो मम्मी को जो अपनी माता पिता की तरफ से जमीन बेचने पर पचास हजार रुपये मिले थे उससे प्रभात ने एक बडा भूखंड खरीदा  और उस पर मकान बनवाया उस समय भूखण्ड इतने मँहगे नहीं थे। मकान बनवाने के बाद प्रभात ने मधुकर तथा उसकी पत्नी और बच्चों को उसमें शिफ्ट कर दिया था प्रभात की सोच यह थी कि अब वो इस मकान में आराम से रहेगा उसके बच्चे भी बड़े हो रहे थे और खर्च भी बढ़ता जा रहा था सबसे छोटा भाई भी विवाह योग्य हो गया था उसके लिए प्रभात ने दूसरे मकान में रहने के कमरे बनवाए थे। लेकिन प्रभात की किस्मत में तो कुछ ओर ही लिखा था उसकी मम्मी जिनके हाथों में वो अपनी पूरी तनख्वाह देता था उस माँ के मन में दुर्भावना पैदा हो गई थी। पिताजी रिटायर हो गए थे और वे भी नए मकान में रह रहे थे घर में कलह होने लगी थी प्रभात के बच्चे दादी के दोहरे व्यवहार का विरोध करते देवर अपनी भाभी से भी अच्छा व्यवहार नहीं करता था जीना दूभर हो रहा था माँ के मन में कपट  आ गया था प्रभात के छोटे भाई दिनकर की जिस लड़की से शादी होने जा रही थी वो सरकारी नौकरी करती थी जबकि दिनकर प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता था माँ का अपने छोटे बेटे से बडा लगाव था प्रभात की दोनों बहनों की शादी हो गई थी। उसके चारों भाई बहन और मम्मी पापा की नजर में अब प्रभात खटक रहा था उसके बड़े होते बच्चे खटक रहे थे प्रभात की बड़ी लड़की नवमी में पढ़ रही थी प्रभात ने अपनी पत्नी से कई बार कहा कि सबके बीच एडजस्ट करके रहो तीन साल की हो तो बात है इसके बाद हम सब बच्चों की उच्च शिक्षा  के लिए महानगर आ जाएँगे पत्नी बोली कैसे एडजस्ट करूँ एक एक दिन निकालना मुश्किल हो रहा है मुझे डर है कहीं किसी दिन घर में कोई बड़ी घटना न घट जाए  एक दिन प्रभात ने माँ से कहा कि दूसरे मकान में सबके रहने की जगह है आप वहाँ चले जाओ तो माँ बोली क्यों चली जाऊँ इस मकान पर अपना अधिकार क्यों छोड़ दूँ तुझे अलग कर दूँगी तब भी इस मकान के आधे हिस्से में मेरा कब्जा रहेगा।  प्रभात को अच्छी तरह समझ आ गया था कि इन सबके बीच वो सुख चैन से नहीं रह सकेगा उसने टयूशन पढ़ाकर जो पैसे जोड़ रखे थे कुछ उसे क्रमोन्नति का ऐरियर मिला था कुछ पैसे पत्नी से लेकर शहर की एक कॉलोनी में प्लाट ले रखा था प्रभात ने जी पी एफ से फंड निकाला कुछ बैंक से कर्ज लिया कुछ पैसे उधार लेकर जुटाए और ये मकान बनाया था जिसमें  प्रभात अपने पत्नी बच्चों के साथ तीन साल रहे तीन साल बाद जब लड़की हायर सेकेण्डरी पास हुई तो मकान  में ताला लगाकर महानगर में किराये के मकान में रहने लगे अपने लड़के तथा दोनों लड़कियों का एडमीशन उन्होंने महानगर के अच्छे स्कूलों  में करा दिया था बच्चों को पढ़ाने लिखाने और योग्य बनाने भें प्रभात के पन्द्रह वर्ष गुजर गए थे प्रभात ने महानगर में होमलोन से फ्लेट  खरीद लिया था  जिसमें वो रह रहे थे जब रिटायर मेन्ट में कुछ समय ही शेष रह गया था तब वे ये मकान देखने आए थे जो रहने योग्य नहीं रह गया था। प्रभात जी ने तय कर लिया था कि रिटायर मेन्ट के बाद भी वे महानगर में ही रहेंगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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