रोशन लाल कुंभ के मेले से अपने साथियों से बिछड़कर दो दिन बाद घर आया था। उसे देखकर उसके पिता ज्ञानसिंह ने बड़ी राहत की साँस ली थी। कुँभ के मेले से वो गंगाजल के अलावा अपने बहन भाई और मम्मी पापा के लिए कुछ न कुछ उपहार लेकर आया था। उसके आने से उसके परिवार में प्रसन्नता की लहर छा गई थी रोशन के पिताजी कह रहे थे कि मुझे तेरी बड़ी चिंता थी जीवन में पहली बार तू घर से इतनी दूर हरिद्वार कुँभ के मेले में गया था । चिंता की बात यह भी थी की तू जिन लोगों के साथ गया था वे सब आ गए थे। जब उनसे तेरे विषय में पूछा तो उन्होंने कहा कि रोशन लाल तो रेल्वे स्टेशन के पास से ही भीड अधिक होने के कारण हमसे बिछड़ गया था। फिर वो हमें कहीं भी नहीं मिला वो कहाँ है इसकी हमें कोई खबर नहीं है। ज्ञान सिंह उनकी बात सुनकर चिंतित हो गए थे । हाँलाकि रोशनलाल बच्चा नहीं था पूरे तेइस साल का नौजवान था। अपना ख्याल रख सकता था। फिर भी ज्ञानसिंह की चिंता कम नहीं हुई थी।
रोशनलाल ने पिताजी से कहा जब वो हरिद्वार रेल्वे स्टेशन पर उतरा तो साथियों के साथ ही था पर भीड़ में किसी ने उसकी जेब काट ली थी सारे पैसे उसी में थे उसके पास कुछ नही बचा था बेग में कपड़े ही थे खाना तो उन्होंने रेल्वे स्टेशन पर ही खा लिया था। अपनी कटी जेब देखकर वो घबरा गया उसने जेबकतरे की तलाश की पर नाकाम रहा फिर वो इसकी पुलिस में रिपोर्ट लिखाने थाने गया ।जिसमें उसके पूरे दो घंटे खराब हो गए थे। जेबकतरे ने जेब काटकर उसके पूरे पाँच हजार रुपये उडा दिए थे। वो दुखी मन से मेले में आ गया था सबसे पहले उसने ग॔गा जी में स्नान कर देवदर्शन किए फिर मेले में घूमने लगा तभी उसकी नजर एक हेयर कटिंग की दुकान पर पड़ी जहाँ एक ही कटिंग बनने वाला था दंसरी कुर्सी खाली थी कटिंग बनवाने वालों की सँख्या ज्यादा थी। वो दुकान में गया तो कटिंग बनाने वाला बोला भीड देख रहे हो अगर तीन घंटे का समय हो तो रुको नहीं तो कहीं ओर अपनी कटिंग बनवा लो। रोशनलाल बोला मैं कटिंग बनवाने नहीं आया मैं तो खुद कटिंग का काम करता हूँ। अगर आपको जरूरत हो तो मैं काम करने को तैयार हूँ। यह सुनकर सैलून का मालिक बड़ा खुश हुआ बोला यह बात है । तो शुरू हो जाओ जो पैसे मिलेंगे वो आधे आधे करना होंगे दुकान और सामान मेरा मेहनत और हुनर तुम्हारा। रोशनलाल ने दो दिन उस दुकान पर काम किया पूरे आठ हजार रुपये उसने कमाए थे। खाना चाय और नाश्ता सैलून के भालिक ने ही कराया था दुकान में ही उसे सोने की जगह भी मिल गई थी दो दिन बाद जब सैलून पर पुराना सहयोगी आ गया तब भी सैलून का मालिक बोला एक ओर काँच तथा टेबल कुर्सी की अभी मैं व्यवस्था कर देता हूँ तुम भी काम करो तुम अच्छा काम कर रहे हो तुमने मेरा सही वक्त पर साथ दिया। रोशन लाल बोला मैं तो कुँभ के मेले में अपने गाँव से जत्थे के साथ आया था । यहाँ मेरी जब कट गई थी मेरे पास एक भी रुपया नसीं था आपने काम देकर मुझे इस संकट से उबार लिया। सैलून वाले ने जाते जाते कहा जब जरूरत पड़े तो निस्संकोच आ जाना मुझसे जो मद्द बनेगी वो मैं करूँगा। रोशनलाल के हुनर ने उसको मुसीबत से उबार दिया था। ये हुनुर उसने अपने मित्र से सीखा था उसकी हेयर कटिंग की दुकान थी रोशन उससे मिलने दुकान पर जाता और घंटों वहाँ बैठा रहता था शौक ही शौक में उसने अपने मित्र से दाडी कटिंग का हुनर सीख लिया था वो शौक से कभी कभी दोस्त की दुकान पर काम कर देता था। आज उसका ये हुनर काम आ गया था। रोशनलाल ने एम बी ए करने के बाद ये हुनर सीखा था। ऐसी मुश्किल समय में रोशनलाल की एम बी ए की डिग्री काम नहीं आई थी। बल्कि वो हुनर काम आया था जो उसने शौक से सीखा था। ज्ञानसिंह जो इस बात पर अक्सर रोशन से नाराज रहते थे वे भी बोले इंसान में कोई न कोई सुनर होना चाहिए यह समय पर जरूर काम आता है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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