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कहानी: एन्ड्राय्ड फोन

अत्यंत गरीब परिवार की नमिता ने जबसे एन्ड्रायड फोन खरीदा था तबसे वो पढ़ाई में सबसे आगे रहने लगी थी। पढ़ने में वैसे तो वो पहले से ही तेज थी । इन्टरनेट की मदद ने उसे और अच्छा बना दिया था आज जब राष्ट्रीय प्रतिभा खोज  परीक्षा का परिणाम आया तो नमिता उसमें अपना नाम देखकर ख़ुशी से फूली न समाई। अब इससे उसे हर महीने छात्रवृत्ति मिलती रहेगी। जिससे उसकी आगे की पढ़ाई में रुकावट नहीं आएगी।
नमिता अपने पिताजी रेवाराम जी जो ईँट के भट्टे पर मजदूरी करते थे  उनसे वो साल भर से एन्ड्रायड मोबाइल खरीदने का आग्रह कर रही थी पर पिताजी हर बार टाल देते थे उनकी आय इतनी कम थी कि परिवार का खर्च ही मुश्किल से चलता था। नमिता सरकारी स्कूल  में कक्षा आठवीं की छात्रा थी जब वो सातवीं में आई थी तब उसने पिता से मोबाइल खरीदने की जिद की थी हाँलाकि उसके स्कूल में स्मार्ट टी वी तो था पर नेट कनेक्शन नहीं था  जब कोई टीचर अपने मोबाइल से हॉट स्पॉट चालू करता था तब वो टी वी चलता था  उसमें नमिता को पढाई का अवसर ही नहीं मिलता था। उसकी अधिकाँश सहपाठी छात्घराओं के पास एन्ड्रायड मोबाइल था  वे उसका लाभ उठा लेती थीं।  सातवीं पास तो नमिता ने कर ली थी पर अब वो आठवीं क्लास में आ गई थी आठवीं बोर्ड की परीक्षा थी। परीक्षा के बाद गर्मी की छुट्टियाँ लग गई थीं नमिता अब पूरे दिन घर रहती थी। उसने विचार किया कि इन छुट्टियों में अगर वो खुद कोई काम करके रुपया कमाए तो भोबाइल खरीद सकती है  उसने खूब माथा पच्ची अपने लायक काम ढूँढ़ने के विषय में की  तभी उसकी नजर किसी के  आँगन  में सूखते  महओ पर पड़ी  उसे अपना काम मिल गया था दूसरे दिन वो सुबह जल्दी  उठी और डलिया लेकर  महुआ  बीनने चली गई   दो घंटे में वो डलिया भर कर महुआ बीन लाई थी वहाँ उसने तेंदू पत्ता तोड़ते हुए लोगों को देखा तो महुओं को सूखने के लिए रखकर वो तेंदूपत्ता तोड़ने निकल पडी। यह सिलसिला पूरी गर्मी की छुट्टी में चलता रहा  उसने इन दो महीनों में  पूरे बाइस हजार रुपये कमाए थे कुछ रुपये इमली और अमचूर बैचकर भी उसे मिले थे। । स्कूल शुरू होने के पहले वो इन रुपयों से फाइव जी एन्ड्रायड  मोबाइल खरीद लाई थी। उसके पिता रेवाराम थोड़े नाराज हुए बोले  इतने सारे रुपये खर्च कर दिए मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी मुझे ही वो  रुपये दे देती यह सुकर नमिता की मम्मी आगे आईं और रेवाराम जी से बोलीं नमिता ने न मुझसे पैसे लिए न आपसे इसके बाद भी अगर अपने पैसों से मोबाइल खरीद लिया तो कौनसी गलती की इस तरह आपको उसे डाँटना नहीं चाहिए था। रेवाराम जी को भी अब पछतावा हो  रहा था वो नमिता के पास  गए और यह जानने का प्रयास करने लगे की नमिता इससे   पढ़ेगी  कैसे ?लेकिन जब उसने नेट पर से  पाठ्य सामग्री निकाली तो  रेवाराम   चकित रह गए फिर कहने लगे अब समझ में आया कि तू मोबाइल खरीदने की जिद क्यों कर रही थी।  नमिता ने घर के बगल की थोड़ी सी  खाली  जगह  पर बाड़ लगाकर सब्जियाँ  उगाई उन्हें बाजार में  बेचकर  जो रुपये मिले उससे  उसने नेट   के पैसे जुटाए   थे । यही  उसकी सफलता का रहस्य था ।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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