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कहानी: बाबा दयालदास की समाधि

छत्तीसगढ़ के वनांचल में स्थित दुर्गापुर गाँव  के सिद्ध मठ के महँत बाबा दयालदास के समाधि स्थल पर भव्य मेला और संत समागम  का आयोजन हुआ था जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।  इस अवसर पर क्षेत्र के विधायक रुद्रप्रताप सिंह  ने बाबा दयालदास के नाम से सिविल अस्पताल खोलने की घोषणा की थी बाबा दयालदास का  निधन हुए अभी पाँच ही वर्ष हुए थे  लेकिन उनकी लोकप्रियता इतनी थी कि  हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर उनके समाधि स्थल पर भारी जन सैलाब उमड़ता था।
बाबा दयाल दास दुर्गापुर के सिद्धमठ के महँत बनकर  चालीस वर्ष पूर्व यहाँ आए थे वे पैंतीस वर्ष तक मठ के महँत रहे उनका निधन सौ वर्ष की आयु में हुआ था। वो भी मरीजों का उपचार करते हुए अचानक उनका जी घबराया चक्कर से आए  वे कुर्सी पर बैठे और थोड़ी देर में ही उनके प्राण पखेरू उड़ गए। उन्हें समाधि दी गई थी जिसमें लाखों की संख्या में लोग शामिल हुए थे।
बाबा दयालदास जी के गृहस्थ जीवन के विषय में बहुत कम लोग जानते थे उनमें से  उनके परम शिष्य दीपक दास जी भी थे जिन्हें दयाल दास जी के निधन के बाद सिद्ध मठ का महंत बनाया गया था। दीपक दास जी ने दयालदास बाबा के पूर्व जीवन के विषय में बताते हुए कहा कि बाबा अपने गृहस्थ जीवन में देवास के एक निजी अस्पताल में मेल नर्स के पद पर कार्यरत थे। जब वे पचपन वर्ष के थे तब उनकी पत्नी विमला का निधन कैंसर की बीमारी से जूझते हुए हो गया था। दयालदास जी के बेटे का नाम अशोक था और बेटी का नाम अभिलाषा दोनों की शादी हो गई थी अशोक एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था।  साठ वर्ष की आयु में उन्हें अस्पताल प्रबंधन ने रिटायर कर दिया  उन्हें एक मुश्त दस लाख रुपये दिए गए थे वो रुपये अशोक और उसकी पत्नी ने  उनसे चिकनी चिपड़ी बातें कर हड़प लिए।  कुछ ही दिनों में उनका व्यवहार बदल गया  जबकि वे मेडिकल प्रेक्टिस कर  दस हजार  रुपया महीना कमा रहे थे  एक बार जब वे कुछ दिनों के लिए बीमार पड़े तब उन्होंने अपने बहू बेटे का क्रूरतापूर्ण व्यवहार देखा उससे वे बड़े आहत हुए वे ठीक तो हो गए पर उन्होंने यह तय कर लिया था कि वे अब इनके साथ नहीं रहेंगे। तभी हरिद्वार में कुँभ का मेला लगा तो दयाल दास भी अपने जत्थे के साथ मेले में आए  मेले में वे  परम सिद्धाचार्य  राघवनाथ जी के पँडाल में पहुँचे  उन्होंने राघवनाथ जी से  भेंट कर दीक्षा देने का आग्रह किया तो राघवनाथ जी ने कहा कुछ दिन यहीं रुके अगर मुझे लगा कि तुम्हें दीक्षा देना चाहिए तो दीक्षा दंगा नहीं तो तुम्हें अपने घर जाना होगा । पंद्रह दिन वे राघवनाथ जी की सेवा में रहे इन  दिनों में वे दयालदास की सेवा से इतने खुश हुए कि उन्हें मेले में ही दीक्षा देकर अपने शिष्यों में शामिल कर लिया।  राघवनाथ जी के आश्रम में वे तीन साल रहे जहाँ उन्होंने  आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया  देशी दवाएँ जड़ी बूटियों की पहचान तथा उनसे दवा बनाना सीखी।  ऐलोपेथी के जानकार तो वे थे ही। तीन साल बाद राघवनाथ जी ने उन्हें दुर्गापुर के मठ का महंत बना दिया था दयालदास जी जब यहाँ आए तब उनकी उम्र पैंसठ साल की थी।  यह मठ वनाँचल में था जहाँ जड़ी बूटियों की भरमार थी  पर इनकी पहचान किसी को नहीं थी ग्रामीण जादू टोना तथा भूत प्रेत और झाड़ फूँक में विश्वास करते थे ओझा के यहाँ रोज भीड़ लगी रहती थी।  कुछ ग्रामीण उनके पास भी भभूति लेने आते थे।  दयालदास जी इनमें विश्वास नहीं करते थे एक दिन वे शहर गए और अपने साथ बहुत सारी दवाएँ लेकर आए अब कोई उनके पास भभूति लेने आता तो पहले वे उसकी नाड़ी देखते फिर भभूती के साथ दवाएँ भी देते थे  इसका चमत्कारी असर होता, लोग बीमारी से ठीक हो जाते और उनकी प्रशंसा करते। एक दिन उन्होंने गाँव के औझा नंदन को  अपने पास आते देखा तो चौंक गए क्योंकि नंदन उनका  सबसे बड़ा विरोधी था। वह बड़ा उदास था बोला महँत जी मेरा जवान लड़का वीर सिंह  बीमार पड़ा है उसकी हालत ठीक नहीं है मेरी विद्या कोई काम नहीं कर रही । आप अगर उसे चलकर देख लेंगे तो बड़ी मेहरबानी होगी दयालदास जी ने एक पल भी नहीं गँवाया और नंदन के साथ चल दिए  वीरसिंह की नब्ज देखी और बीमारी उनकी पकड़ में आ गई  उसे उन्होंने अपने पास से दवा दी।  और नंदन से कहा छः घंटे के भीतर मुझे ये दवाएँ चाहिए  नँदन पर्चा लेकर शहर आ गया  जहाँ से उसने दवाएँ ली और तुरंत लौट पड़ा  दयालदास जी ने वीरसिंह को ग्लूकोज की बॉटल चढ़ाई उस में ही दवाएँ मिला दीं।  दयालदास जी ने पाँच दिन के  इलाज से अशोक को भला चँगा कर दिया पर  कमजोरी दूर करने के लिए  देशी दवाएँ दीं।  कुछ दिनों में वीरसिंह पूरी तरह से  ठीक हो गया था।   नंदन ने ओझा का काम छोड़ दिया और दयालदास जी के सहयोगी बनकर  रहने लगे। दयालदास जी की आँखों में  सबके प्रति प्यार भरा रहता था।  धीरे धीरे बाबा की ख्याति  दूर दूर तक फैल गई रोज बड़ी संख्या में दूर दूर से लोग  उनके पास इलाज हेतु  आने लगे थे।  यह सिलसिला जब तक चलता रहा तब तक उनके प्राण नहीं निकले।  वे अंचल में जाग्रति की लहर छोड़ गए थे।  यह सबसे बड़ी खुशी की बात  थी।
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प्रदीप कश्यप 


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