सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: क्रूर सास का दुखद अंत

राकेश वर्मा पूरे दस साल बाद इंग्लैंड से भारत आए थे उनकी माँ  कमला का अस्सी वर्ष की आयु में निधन हो गया था उनकी तेरहवीं के कार्यक्रम में आज वे शामिल हुए थे उनके साथ उनकी पत्नी नीता भी साथ थी वे यहाँ होटल में ठहरे हुए थे  क्योंकि घर पर मेहमानों की भीड़ ज्यादा थी। 
उनकी तेरहवीं  का कार्यक्रम आज संपन्न हो गया था इसके बाद उन्हें पंद्रह दिन का समय और मिला था  जिसे वो तीर्थ यात्रा कर गुजारना चाहते थे यहाँ वे पिछले तीन दिनों से थे इन तीन दिनों में नीता और उन्हें जो माँ के विषय में जानकारी मिली उससे उनका कलेजा काँप गया इससे नीता भी बहुत दुखी हुई जिस पर उन्होंने कभी अत्याचार की हद पार कर दी थी राकेश को  आज अपना बचपन याद आ रहा था। जब वो छः वर्ष के थे तब उनके पिता  बाबूलाल गाँव के संपन्न किसान थे। उन्होंने राकेश को बड़े लाड़ प्यार से पाला था उनकी हर जिद पूरी की थी राकेश जब आठवीं पास ही हुए थे और उन्होंने राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा भी पास कर ली थी जिसके कारण उन्हें छात्रवृत्ति मिलने लगी थी।  तभी एक हादसे ने उनका जीवन बदल दिया उनके पिताजी अदरक से भरी ट्राली लेकर इंदौर जा रहे थे तभी सामने से एक ट्रक से उनकी भिड़ंत  हो गई जिसमें उनकी दुखद मौत हो गई  उनके निधन के छः महीने बाद  ही उनकी माँ कमला ने दूसरी शादी कर ली राकेश के सौतेले पिता ट्रक ड्राइवर थे। शादी के डेढ़ साल बाद कमला ने पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम नवीन रखा गया था  नवीन के जन्म के डैढ़ साल बाद खुशी का जन्म हुआ  उसके सौतेले पिता बिहारीलाल शराबी थे तथा जुआ सट्टा के शौकीन भी थे। उनकी पूरी तनख्वाह उन पर ही खर्च हो जाती थी। कमला ने अपने पूर्व पति की सारी जमीन जायदाद मकान बेच दिया था धीरे धीरे सारा पैसा खत्म हो गया था तब  राकेश की उम्र अठारह वर्ष की थी वे आई टी आई से मेकेनिकल में सर्टीफिकेट का कोर्स कर रहे थे घर की बिगड़ी हालत देखकर राकेश जी ने  पार्ट टाइम नौकरी की  इससे घर का खर्च चलने लगा था उनके सौतेले पिता ने ड्राइवर का काम छोड़ दिया था और पंक्चर की  हाइवे पर दुकान खोल ली थी पर उससे जो कमाई होती वो उनकी शराब में खर्च हो जाती थी। राकेश पढ़ाई के साथ कमाई भी करते फिर भी उनकी माँ का व्यवहार उनके प्रति ठीक नहीं था।  वे अपने दोनों बच्चों को ज्यादा दुलार करती थी। आई टी आई के बाद राकेश जी ने एक कारखाने में फुल टाइम नौकरी कर ली थी उनकी तनख्वाह  भी बढ़ गई थी। राकेश जी पूरी तनख्वाह अपनी माँ को दे देते थे । और माँ पक्षपात से उसे खर्च करती थी राकेश के पास सिर्फ तीन जोड़ी कपड़े थे जबकि उनके सौतेले बहन भाइयों के पास कपडों का अंबार लगा था। ऐसी अनेक बातें थीं जिसमें उनका भेदभाव साफ झलकता था उनके सौतेले पिता से उन्हें कभी अपनापन नहीं मिला था। इसी बीच राकेश की शादी नीता से हो गई थी कमला ने नीता को बहू नहीं नौकरानी समझा नीता के बहू बनकर आने के बाद कमला ने टिफिन सेंटर खोल लिया था। नीता सुबह छः बजे से रात के ग्यारह बजे तक खटती रहती पर कमला को उस पर जरा भी तरस नहीं आता था कमला का व्यवहार नीता के प्रति बहुत रूखा था टिफिन सेंटर की सारी कमाई कमला अपने पास रखती थीं राकेश ने अपनी पढ़ाई बंद नहीं की थी  वे एक अंशकालीन कॉलेज से बी ई कर रहे थे। कमला ने पूरे दस साल तक नीता पर अत्याचार किए थे। नीता और उनकी कमाई से पक्का मकान बनवाया था भोजनालय खोला था पर फिर भी वो नीता से क्रूरता के साथ पेश आती थी। राकेश की सौतेली बहन और कमला दोनों मिलकर नीता पर जुल्म ढाती थी नवीन की पढ़ाई पूरी हो गई थी तथा नगरनिगम में उसकी नौकरी भी लग गई थी  कमला ने राकेश और नीता की कमाई से अपनी बेटी की शादी की और साल भर बाद नवीन की शादी  भी कर दी।  सौतेली बहन का पति  घर जँवाई बनकर रहने लगा था भोजनालय कमला ने उनके नाम कर दिया था। नवीन  की शादी होने के बाद जब नीता की देवरानी घर आई तो कमला ने  राकेश और नीता को घर से निकाल दिया  कोई सामान भी नहीं ले जाने दिया नीता और राकेश अपने दोनों बच्चों के साथ अलग एक किराये के मकान में रहने लगे थे। अपनों की बेरुखी से राकेश का मन उचट गया था अब इस शहर में ही उनका मन नहीं लगता था कमला अपनी छोटी बहू को बड़े लाड़ से रखती थी ननद भी छोटी भाभी से हिलमिलकर रहती थी कमला ने टिफिन सेंटर के लिए दो नौकर रख लिए थे नीता की देवरानी घर का बहुत काम करती थी फिर भी सबकी चहेती बनी हुई थी। राकेश ने इंग्लैंड में नौकरी के लिए आवेदन सम्मिट किया था एक दिन उन्हें पता चला कि उनकी नौकरी इंग्लैंड में लग गई है तथा उन्हें वीजा भी मिल गया है तीन महीने नौकरी करने के बाद राकेश अपने शहर आए और नीता तथा बच्चों को लेकर  इंग्लैंड चले गए थे । जहाँ रहते हुए उन्हें पूरे दस साल हो गए थे उन्होंने अपने आपको पूरी तरह अलग थलग कर लिया था।  दस साल बाद वे माँ के मरने पर यहाँ आए थे  तभी उन्हें पता चला था कि उनके सौतैले पिता की आठ साल पहले ही मौत हो गई थी। भोजनालय पर उनकी सौतैली बहन ने कब्जा कर लिया था भ्रष्टाचार के कारण नवीन की नौकरी छूट गई थी  और वो प्राइवेट में जॉब कर रहा था मकान बिक गया था और वे किराये के मकान में रह रहे थे मरने से तीन साल पहले   कमला को लकवा मार गया था। जिससे उसका आधा अंग काम नहीं कर रहा था यह तीन साल उन्होंने अत्यँत कष्ट में बिताए थे  आखिरी वक्त में कोई उनके पास नहीं जाता था कमरे में दुर्गंध फैली रहती थी जो बैड सूल हुए थे उनमें कीड़े पड़ गए थे। ऐसे समय न उनकी लाड़ली बेटी उनके पास थी ना ही लाड़ला बेटा जब कमरे से तीव्र दुर्गँध आई तब पता चला कि उनकी मौत  तो दो दिन पहले ही हो चुकी थी। यह खबर सुनकर नीता बहुत दुखी थी कहने लगी हम अपने देश में होते तो माँ की हालत ऐसी कभी नहीं होने देते। 
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप   


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...