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कहानी: वृद्धाश्रम में जाने का निर्णय

पिचहत्तर वर्षीय कैलाश मौर्य को वृद्धाश्रम  में आए पूरे दस साल हो गए थे यहाँ वे सुखपूर्वक रह रहे थे। उन्हें वृद्धाश्रम में उनके बहू बेटों ने नहीं छोड़ा था। बल्कि बेटे बहुओं के दुर्व्यवहार से तँग होकर वे खुद वृद्धाश्रम  में आए थे। वृद्धाश्रम में उनके  मित्र के अग्रज पहले से ही रह रहे थे  । उनकी शादी नहीं हुई थी उनका कोई वारिस नहीं था इसलिए  वे वृद्धाश्रम में रह रहे थे जबकि वहाँ पर रहने वाले अधिकाँश बहू बेटे वाले ही थे। जिन्होंने वृद्धावस्था में अपने माता पिता को यहाँ छोड़ दिया था। कैलाश जी ने दस वर्षों में यह देख लिया था कि यहाँ जो भी आए वो कुछ दिन उदास रहे और फिर सबमें घुल  मिल गए थे  सब खुश रहते थे। कैलाश जी को भी यहाँ रहने में अच्छा लगता था। वे यहाँ व्हील चेयर पर आए थे और अब  अच्छे चल लेते थे साथ ही सेहतमंद भी थे। 
कैलाश जी तेरह वर्ष पूर्व जब शिक्षा विभाग से रिटायर हुए थे तब उनको जो फँड ग्रेच्युटी जी पी एफ की राशि मिली थी  वो बहू बेटे ने चिकनी चिपड़ी बातें कर हथिया ली थी  पैंशन भी बेटा ही निकालता था कैलाश जी की पत्नी का निधन हुए तीन साल हो गया था लड़का बीमा एजेन्ट था वे घर के मकान में रहते थे जो पहले पत्नी के नाम था  जिसे पत्नी ने मरते मरते बेटे के नाम कर दिया था क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि उस मकान उसकी बेटी भी हिस्से के लाए दावा करे वैसे भी कैलाश जी का कोई खर्च नहीं था महीने के दो सौ रुपये भी वो खुद पर खर्च नहीं करते थे तीन साल तक सब कुछ अच्छा चलता रहा लेकिन एक दिन जब कैलाश जी सुबह माॅर्निंग वाॅक पर निकले थे तभी उन्हें अज्ञात वाहन टक्कर मार कर चला गया दुर्घटना में उनके दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे  जब लोगों ने उन्हे अस्पताल पहुँचा दिया तब बेटे को  खबर लगी शुरू में तो बेटे बहू ने उनका  इलाज अच्छा कराया  लेकिन वे पूरी तरह ठीक भी नहीं हुए की बेटे ने बहू के कहने में उनकी अस्पताल से छुट्टी करा दी वे चलने फिरने से मोहताज थे बहु बेटे को उनकी देखभाल करना भारी पड़ रहा था दवाएँ चल रही थीं बीच बीच में उन्हें डॉक्टर को दिखाने ले जाना पड़ता था। जिसमें उनकी पैंशन की रकम का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा था। उन्हें रोज ही बहू बेटे की डाँट फटकार और ताने सुनना पड़ते थे वे उन्हें भरपेट खाना भी नहीं देते थे । कैलाश जी को  पलँग से उतरते समय हाथ की कोहनी में चोट लग गई थी उसमें खून भी  निकला था। उन्होंने अपने बेटे से ये कहा भी पर उसने उसे मामूली चोट समझकर उस पर ध्यान ही नहीं दिया आठ दिन बाद जब वो जख्म पक गया और पीड़ा ज्यादा हुई तो बहू बेटे उल्टे उन्हीं पर झल्ला गए एक बीमारी ठीक हुई  नहीं और अब यह दूसरी बीमारी पैदा कर ली  बहू बोली इन्हें मौत भी तो नहीं आती यह बात सुनकर दर्द से कराहते कैलाश जी की आँखों में आँसू आ गए बहू बेटे तो उन्हें अकेला कमरे में छोड़कर चले गए पर उन्हें लगने लगा कि अब वो ज्यादा जी नहीं सकेंगे अगर बेटे ने इस जख्म का इलाज नहीं कराया तो गैंगरीन हो जाएगा जिसके कारण  उन्हें अत्यँत कष्टदायी मौत मिलेगी  वे यह सोचकर दुखी थे कि उनसे मिलने उनके पुराने साथी रामगोपाल जी आए रामगोपाल जी से वे अपनी हालत छिपा न सके रामगोपाल जी यह सब सुनकर बहुत दुखी हुए फिर अचानक कुछ याद कर बोले सिविल अस्पताल में जो नए सिविल सर्जन आए हैं विकास पुरोहित वो हमारे स्कूल में पढ़े हैं आपने उन्हें गणित और  फिजिक्स पढ़ाई थी मैं उनसे मिला हूँ मैंने उनसे आपका जिक्र किया था वे आपसे मिलना चाहते हैं। कैलाश जी एक क्षण को अपनी पीड़ा भूल गए और विकास की तारीफ करने लगे। फिर रामगोपाल जी उनसे यह कहकर चले गए कि शाम को मैं विकास को लेकर आऊँगा और फिर आपके इलाज की कोई व्यवस्था करेंगे। उनके जाने के बाद शाम तक का समय कैलाश जी ने बड़ी मुश्किल से बिताया  शाम को जब रामगोपाल डॉक्टर विकास को लेकर आए तो डॉ विकास ने कैलाश जी के पैर छुए और कहा कि आपकी पढ़ाई और सख्त अनुशासन  से मैं इस मुकाम पर पहुँचा हूँ फिर डॉ साहब ने उनके पैरों की जाँच की इस बीच जब हाथ का जख्म देखा तो चिंतित हो गए बोले आपको तुरँत अस्पताल में भर्ती करना पड़ेगा यह जख्म जल्दी गैंगरीन में बदलने वाला है । बहू बेटे तो यही चाहते थे कि यह बला किसी तरह टले वैसे भी उनकी पैंशन की सारी राशि  इलाज में ही खर्च हो रही थी ऐसा उनके बेटे का कहना था बेटे ने डॉ साहब से यह भी कह दिया कि आप इन्हें ले तो जा रहे हैं पर इनके इलाज में हम एक रुपया भी खर्च नहीं करने वाले सुनकर विकास बोले उसकी कोई चिंता नहीं सर की जान बचाना जरूरी  है अभी उनकी उम्र पैंसठ साल की ही तो है। विकास जी उन्हें अस्पताल ले आए  और उनका इलाज शुरू कर दिया  अस्पताल सरकारी था सिर्फ उन दवाओं पर रुपया खर्च होता था जो अस्पताल में उपलब्ध नहीं होती थीं। डॉ कैलाश के इलाज और देखभाल से वे चार महीने में ही स्वस्थ हो गए थे। थोड़े बहुत चलने भी लगे थे लेकिन अस्पताल से छुट्टी के नाम से वे घबरा जाते थे बेटे बहू के साथ रहने की कल्पना मात्र  ही उन्हें बेचैन कर देती थी बेटा इस बीच एक बार भी उन्हें देखने नहीं आया था इस डर से कि कहीं उसे इलाज के लिए पैसे नहीं देने पड़ें चार माह से कैलाश जी का ए टी म का कार्ड उसके पास था और वो उनकी पूरी पैंशन हड़प रहा था।  वे रामगोपाल जी से इस विषय में बात कर रहे थे रामगोपाल जी बोले मुझे भी ऐसा ही लगता है अगर आप वापस बेटे के पास गए तो आपका जीना दूभर हो जाएगा कैलाश जी बोले  क्या करें तब डॉ विकास जी आए और बोले सरजी इसकी चिंता आप मत करो आप मेरे घर पर चलकर आराम से रहिए हमें आपके साथ रहने में बहुत अच्छा लगेगा तभी रामगोपाल जी ने कहा उनके अग्रज कुलभूषण जिस वृद्धाश्रम में रह रहे हैं उसकी बड़ी तारीफ करते हैं यह सुनकर कैलाश जी बोले लड़के के पास रहकर तिल तिल कर मरने से तो अच्छा है कि वृद्धाश्रम में अपने हमउम्र लोगों के बीच खुशियों के साथ रहा जाए  फिर कैलाश जी ने डॉ साहब को भी इसके लिए सहमत कर लिया और वृद्धाश्रम आ गए  व्हीलचेयर उनके साथ थी जिसकी कुछ दिनों बाद जरूरत ही नहीं रही। इन दस वर्षों में डॉक्टर विकास हर गुरूवार आश्रम में आते और उनका हाल मालूम करते एक घंटे रुककर  सबका स्वास्थ्य परीक्षण करते जबकि उनका लड़का साल में एक बार आता वो भी बैंक को जीवित रहने का प्रमाण पत्र देने के लिए उसे कैलाश जी की जरूरत पड़ती अन्यथा पैंशन मिलना बंद हो जाती ए टी एम उसके पास भी था दस साल से वो पिताजी की पूरी पैंशन हड़प रहा था उनके बनाए मकान में रह रहा था इन दस सालों में उसने अपने पिता पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया था। 
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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