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कहानी: घर छोड़ने के बाद

एस डी ओ महेश वर्मा ने बारह साल की उम्र में अपनों के अपमान और उपेक्षा से परेशान होकर घर छोड़ा था अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर वे आज इस मुकाम पर पहुँचे थे वे जिस ऑफिस के प्रमुख अधिकारी थे उसी ऑफिस में उनके पिता सुरेश बड़े बाबू के पद  पर कार्यरत थे मगर दोनों के रस्ते अलग अलग थे घर भी अलग अलग और परिवार भी अलग अलग महेश जिनको अपने पिता से बढ़कर मानते थे वे उमेश  गर्गआज भी उनके साथ रहते थे।
महेश वर्मा जी के बचपन के वो बारह वर्ष बड़े दुखभरे और अपमानजनक बीते थे। उनकी दादी बतातीं थी की जब उनके पिता की शादी उनकी माँ श्यामा सु हुई तो तीन साल तक उन्हें कोई संतान नहीं हुई हर जगह उन्होंने अपना इलाज खाया देशी दवाएँ खाईं अंग्रेजी दवाएँ खाईं  कई जगह मन्नत माँगी तब कहीं  महेश  जी का जन्म हुआ  महेश के जन्म से घर में खुशियाँ आईं  कुछ दिनों तक उन्हें सबका लाड़ प्यार भी मिला  जिसका उन्हें होश नहीं है यह सब तब तक चला जब तक उनके छोटे भाई नवीन का जन्म नहीं हुआ था नवीन के जन्म के बाद माता पिता का सारा लाड़ प्यार नवीन को मिलने लगा  महेश जी को जो दूध दिया जाता था वो बंद कर दिया गया नवीन जब छः महीने का हुआ तो उसे ऊपर का दूध  और उसमे बेबी फूड मिलाकर दिया जाने लगा महेश जी को अब दाल चावल खाने को मिलते थे दो साल बाद जब उनकी बहन निकिता का जन्म हुआ तो बचा खुचा लाड़ भी चला गया अब माता पिता के चहेते उनके छोटे भाई और बहन हो गए थे अब वे घर के अवाँछित बच्चे थे छः साल के होने के बाद महेश जी का नाम सरकारी स्कूल में लिखा दिया गया इसके साथ ही उनके अपमानजनक दौर की शुरुआत हो गई भाई झूठी शिकायत लगा देता तो  पिता उनकी बेरहमी से पिटाई करते   छः साल की उम्र में ही उन्हें बड़ा मान लिया गया था। उनसे नौकरों की तरह काम लिया जाता उन्हें कभी अपनी बहन और छोटे भाई जैसा खाना नहीं मिलता था बल्कि उनकी जूठन उन्हें खाने को दी जाती थी कभी उन्हे टॉफी के लिए पैसे नहीं मिले जब वो दस साल के हुए तब जरा सी गलती पर पिता कड़ी से कब़ी सजा देते सबके सामने मारते पीटते गालियाँ बकते बददुआएँ देते   और माँ से कह देते आज इसे शाम को खाना मत देना और माँ पति की आज्ञा का पूरा पालन करती वो रोटी के एक टुकड़े के लिए गिड़गिड़ाते और माँ छोटे बहन भाई को मना मनाकर खिलाती तथा उनकी तरफ से मुँह फेर लेती  महेश जी भूख से बिलबिलाते रहते पर कोई नहीं पसीजता था महेश जी को अच्छी तरह  याद है जब वह पाँचवी में पास हुए और दो विषय में ए ग्रेड तथा दो विषय में बी ग्रेड लाए जबकि उन्की  कुल ग्रेड ए थी पिचहत्तर प्रतिशत से अधिक नंबर थे फिर भी उनके पिताजी ने उन्हें इस बात पर पीटा की बाकी के दो विषय में ए ग्रेड क्यों नहीं आई महेश जी पिताजी के सामने कभी खाना नहीं खाते थे ।क्योंकि वे गुस्से में उन्हें खाना खाते समय भी पीट देते थे  एक बार जब महेश जी खाना खाने के दौरान दाल की कटोरी माँ  से ले रहे थे तभी पिताजी को आते देखकर वे घबरा गए  उनके हाथ से वो कटोरी गिर गई उसकी दाल गोबर से लिपे कच्चे फर्श पर फैल गई इस बात पर उनके पिताजी ने उन्हें बेरहमी से पीटा  और वो फर्श  पर गिरी दाल उन्हें मार मार कर खिलाई माँ फिर भी कुछ नहीं बोली माँ बाप के व्यवहार को देखकर उनके छोटे भाई बहन  भी उन्हें तँग करने में कोई कसर नहीं रखते थे  वे झूठी शिकायत लगाकर उन्हें पिटवाते और उनको पिटते देखकर बहुत खुश होते पिताजी को जुए की लत थी एक दिन वे जुए में बड़ी रकम हार कर आए थे और खूब खीझे हुए थे तभी उनकी छोटी बहन निकिता ने उनकी झूठी शिकायत लगा दी  वे भरे हुए तो थे ही उन्होंने बेल्ट निकालकर महेश जी की बेरहमी से पिटाई की लात घूँसे भी मारे और अत्याचार की पराकाष्ठा को पार कर घसीटते हुए घर से बाहर निकाल दिया। महेश जी भूखे थे खाना खाने ही जा रहे थे तभी ये सब हो गया पिताजी की सख्त हिदायत थी कि इसे घर में मत आने देना  रात के ग्यारह बज गए वे भूखे और घायल घर के बाहर पड़े थे घर के दरवाजे बंद थे वे सब लोग सो गए थे। हल्की ठंडक थी रात को साढ़े ग्यारह बजे पड़ोस में रहने वाले शर्मा अंकल आए उन्होंने महेश जी को सिकुड़े सिमटे घर के बाहर पड़े देखा घर में जाकर जब पत्नी से  इस विषय में पूछा सब बात जानकर वे करुणा से भर गए महेश जी को घर लाए उनकी मरहम पट्टी की और खाना खिलाया तथा वहीं उन्हें बिस्तर देकर सुला दिया सुब्ह लड़ाई की तेज आवाज से उनकी नींद खुली  तब पता चला कि उनके पिता जी और शर्मा अंकल के बीच तू तू मैं मैं हो रही है । पिताजी इस बात पर लड़ रहे थे कि उन्होंने महेश को अपने घर में शरण देकर उन्हें खाना क्यों खिलाया  मेरा लड़का है मैं उसे जैसे चाहे रखूँ तुम कौन होते हो बीच में आने वाले  महेश जी बाहर आए तो पिताजी उन्हें घसीटते हुए घर लाए और चेतावनी दी अगर आज के बाद शर्मा के घर में एक कदम भी रख दिया तो तेरी दोनों टाँगे तोड़ दूँगा अब महेश जी बारह साल के हो गए थे कक्षा छः उन्होंने सर्वाधिक अंक से पास की थी हेडमास्टर जी ने उनकी खूब तारीफ की पर पिताजी का तना हुआ चेहरा जरा भी नरम नहीं हुआ एक दिन उन्होंने पिताजी को माँ से यह कहते सुना  कि महेश की पढ़ाई छुड़वाकर मैकेनिक की दुकान पर लगवा देता हूँ । थोड़े पैसे मिल जाएँगे और यह भी काम सीख जाएगा पढ़ाई लिखाई में कुछ नहीं रखा  आजकल नौकरी किसे मिलती है और पढ़ाना ही है तो नवीन और निकिता को खूब पढ़ लिखा लेंगे। यह बात सुनकर महेश जी की पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई  वह पढ़ लिखकर बढ़ा अधिकारी बनना चाहते थे अब उनके सपने का क्या होगा अचानक महेश जी ने कड़ा निर्णय लिया और वो घर हमेशा के लिए छोड़ दिया पिताजी ने उन्हें ढूँढ़ने का कोई प्रयास नहीं किया वैसे भी वे उन्हें बोझ समझते थे महेश जी सीधे रेल्वे स्टेशन गए अपने आपको भाग्य के भरोसे छोड़ ट्रेन में बैठ गए ट्रेन ग्वालियर रुकी तो वे खाने की तलाश में स्टेशन पर उतरे किसी मुसाफिर ने उन्हें दो पुड़ी खाने को दी थीं वो लेकर जब वो आए तो ट्रेन जा चुकी थे  महेश जी स्टेशन से बाहर निकलकर तब तक चलते रहे जब तक निढाल होकर गिर नही गए  उन्हें जब इस हालत में देखा तो एक प्रौढ महिला  जो अपने घर के सामने खड़ी थी उन्हें ले आईं  थोड़ी देर बाद उनके पति उमेश गर्ग आ गए  महेश जी ने उन्हें सारी स्थिति से अवगत करा दिया  फिर भी उमेश जी ने यही कहा तुमने घर छोड़कर अच्छा नहीं किया ठीक है कुछ दिन यहाँ रहो फिर अपने घर चले जाना उमेश गर्ग जी  ने जब  महेश जी के पिता सुरेश जी को उनके दफ्तर में फोन लगाकर महेश जी के वैषय में बताया तो सुरेश जी ने रूखे स्वर में कहा हमारा उससे कोई संबंध नहीं है हम तो खुद उसे घर से निकालने वाले थे। आपको जो करना हो करो हमें आइंदा कभी फोन मत करना यह कहकर सुरेश ने फोन काट दिया। शाम को घर आकर उमेश जी ने महेश को बुलाया उसके सिर पर हाथ फेरा कहा बेटे हमारी कोई औलाद नहीं है हम तुम्हें अपनाना चाहते हैं  अगर तुम भी हमें अपनाना चाहते हो तो इसे अपना घर समझो  महेश जी को ऐसा लगा जैसे वे नर्क से निकलकर स्वर्ग में आ गए हों इसके बाद के महेश जी के दिन बड़े सुख भरे बीते उन्हे उमेश जी और उनकी पत्नी उमा से माता पिता का पूरा लाड़ प्यार मिला उनकी हर उपलब्धि पर वे खुश होते जब महेश जी का राज्यप्रशासनिक सेवा में चयन हुआ तो  उमेश जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा महेश जी एस डी ओ बन गए थे उमेश जी की आयु भी सत्तर साल की हो गई थी उमा जी ने महेश जी की शादी सुंदर सुशील लड़की सुनीता से कर दी थी महेश जी उनके बीच रहकर बड़े खुश थे  महेश जी एस डी ओ बनकर जहाँ आए थे वहाँ उनके पिताजी सुरेश बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे जो तीन बार सस्पेण्ड हो चुके थे  कई वेतन वृद्धियाँ रुकी हुई थीं उनका भाई नवीन दसवीं में तीन साल फेल होने के बाद आवारा हो गया था अपराधी तत्वों स दोस्ती कर अपराधी बन गया था आजकल जेल की हवा खा रहा था बहन निकिता भी पाँचवीं से ज्यादा नहीं पढ़ पाई थी उसकी शादी जिससे हुई थी वो लोडिंग ऑटो चलाता था। महेश ने अपना कार्यभार सम्हालने के बाद सुरेश जी को सब आर्डिनेट से अधिक कुछ नहीं समझा  सुरश जी किस मुँह से महेश से बात करते इसलिए सब कुछ सामान्य चल रहा था न महेश सुरेश जी के घर गए न कभी सुरेश जी ने महेश जी से घर चलने का आग्रह किया।
*****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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