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कहानी: लड़ते लड़ते

दादी केशर देवी का बयासी वर्ष की आयु में निधन हो गया था वे अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़कर गई थीं आज उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम था जिसमें दूर दूर से मेहमान शामिल होने आए थे सब दादी केशर देवी  तथा छः माह पूर्व गुजरे दादाजी तिलक चंद जी के बीच अगाध प्रेम तथा हर समय होती रहने वाली नौक झौंक तथा तकरार के विषय में ही बात कर रहे थे। 
तिलक चंद और केशर देवी ने विवाह के बाद पैंसठ वर्ष साथ साथ बिताए थे  जिसमें पिछले तीस वर्षों से  तो  वे अपने मकान में अपने बहू बेटों तथा पोते पोतियों से अलग रह रहे थे। मकान किराया ही उनकी आमदनी का जरिया था।  इन पैंसठ वर्षों में ऐसा कोई दिन नहीं बीता था जब उनमें आपस में तकरार  या वाद विवाद न हुआ हो कभी कभार तो उनमे झूमा झटकी तक हो जाती थी  पर जब खाना खाने का समय होता तो लड़ाई भूलकर वे खाना खा लेते थे उनकी लड़ाई कभी ज्यादा देर तक नहीं चलती कुछ घंटों में ही उनकी लड़ाई समाप्त हो जाती थी और वे सहज हो जाते थे।  केशर देवी का नियम था कि वे तिलकचंद को खाना खिलाए बिना कभी भोजन नहीं करती थीं चाहे उनके बीच कितनी ही अधिक लड़ाई क्यों न हुई हो ये लड़ाई उनकी घर के बाहर भी होती रहती थी। एक बार हरिद्वार में गंगा स्नान के पहले उनमें खूब लड़ाई दो घंटे से दोनों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद थी पर नदी में नहाने के दौरान केशर देवी का पाँव सीढ़ी से फिसल गया और वे नदी में गिरने वाली थीं तभी  तिलक चंद जी ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें बचा लिया था 
पैंसठ वर्ष पूर्व जब  उनका विवाह हुआ था तब से ही उनमें थोड़ी बात तकरार होने लगी थी। फिर भी दोनों के बीच अद्भुत प्रेम था। उनके दो बेटे हुए थे जिनका नाम उमेश एवं नरेश था।  उनको तिलक चंद ने खूब पढ़ाया लिखाया था दोनों सरकारी नौकरी कर रहे थे। उमेश की पत्नी रीना सरकारी स्कूल में टीचर थी जबकि  नरेश की पत्नी  शिवानी ने बूटिक खोल रखी थी। दोनों बेटे जिस मकान में रह रहे थे  वे तिलक चंद जी का बनाया हुआ था । दोनों बेटों की शादी के बाद बहुओं से केशर देवी ठीक निभ नहीं सकीं  तब उन्होंने अपने इस खाली मकान में रहने का फैसला कर लिया।  तथा वो बड़ा मकान उन्होंने  दोनों बेटों को सौंप दिया था  केशर देवी अपने मायके  वालों का पक्ष लेतीं थीं  तथा तिलक चंद अपने परिवार वालों का,  शुरू शुरू में यह उनके बीच झगड़े का मुख्य कारण रहता था उस समय वे तिलोक  चंद जी से झगड़ा कर मायके चली जाती थीं  और दो घंटे बाद  जैसे ही  उनका क्रोध खत्म होता तो वो पछतावे में बदल जाता  और शाम को वे वापस तिलकचंद के  पास आ जातीं आते ही पूछती आपने खाना खाया वे मना कर देते तब वे खान बनाती तब कहीं वे दोनों  खाना खाते थे।  तिलक चंद जी  की शहर में  कपड़े की   दुकान थी जो अच्छी चलती  थी।  उसी दुकान में अब उनकी छोटी बहू अपनी बुटिक  चला रही थी।  तिलक चंद जी के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। जिसके कारण  वे सब सुख  से भर कर रह  रहे थे ।  वे तीस वर्षों  से इसी तरह   बिना बहू बेटों   के   थे   तथा आपस में लड़ते हुए रह रहे थे। छः माह पूर्व जब दादा जी  तिलक चंद का निधन हुआ  तो वे पूरी तरह टूट गईं अब उन्होंने खामोश रहना शुरू कर दिया था।  कभी बोलतीं तो कहती मेरे पति मुझसे पहले चले गए भगवान ने मेरी  नहीं सुनी मुझ से पहले उनको उठा लिया।  कभी बोलतीं तो तिलक चंद जी  की  हर समय तारीफ ही करती रहती थीं कभी अपने संस्मरण  सुनाती रहतीं थी।  जब उनके बगैर रहना असंभव हो गया तब उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। आज उनकी तेरहवी थीं ।
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प्रदीप  कश्यप 


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