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कहानी: शौक से जीविका

केशर सिंह आज शहर के माने हुए सिन्थेसाइजर प्लेयर थे। इससे उन्हें प्रतिमाह एक लाख रुपये तक की आय हो जाती थी। कोरोनाकाल में बेरोजगार हुए केशर सिंह को नौकरी तो नहीं मिली लेकिन म्यूजिक के इस शौक ने उनकी सारी बेरोजगारी दूर कर दी इन चार सालों में उन्होंने निजी घर बना लिया नई मोटर सायकिल खरीद ली, अपना जीवन स्तर सुधार लिया था। 
केशर सिंह गुजरात की किसी फैक्ट्री में नौकरी करते थे। जहाँ उन्हें प्रतिमाह पैंतीस हज़ार रुपये महीना सैलरी मिलती थी जिसमें दस हजार रुपये खुद के खर्च के लिए रखकर बाकी पच्चीस हजार रुपये वे घर भिजवा देते  थे सब कुछ ठीक चल रहा था कभी कभी छुट्टी लेकर वे अपने घर भी आ जाते थे। तभी कोरोना का प्रकोप हो गया  सरकार ने लॉक डाऊन कर दिया कारखाने बंद होने लगे और काम करने वाले बेकार केशर सिंह महीने भर की छुट्टी लेकर घर आए हुए थे। तभी लॉकडाउन लग गया था जिसके कारण वे साल भर अपने नगर अलीपुर को छोड़कर काम पर नहीं जा सके जो बचत और जमापूँजी थी उसी के सहारे वे दिन काट रहे थे  कुछ सूझ नहीं  रहा था समय काटे नहीं कटता था एक दिन वे कमरे की सफाई कर रहे थे तभी ऊपर की रेक पर यह कीबोर्ड केसियो उन्हें मिल गया जो उन्होंने अपनी बेटी प्रियंका के ग्यारहवें बर्थ डे पर गिफ्ट में दिया था। प्रियंका ने उसे कुछ दिन तो बजाया सीखने की कोशिश भी की जब कुछ पल्ले नहीं पड़ा तो उसे हमेशा के लिए कारावास देकर रेक पर रख दिया था। केशर सिंह ने प्रियंका को ये केसियो इस लिए गिफ्ट किया था क्योंकि उन्हें खुद म्यूजिक का शौक था पर रोजी रोटी के फेर में वो उसे पूरा नहीं कर पाए थे जबकि प्रियंका को म्यूजिक मैं कोई रूचि नहीं थी  केशर सिंह ने बॉक्स की धूल झटकारी केसियो निकाला वो एकदम नया दिखाई दे रहा था उसे देखकर उन्हें ऐसा लगा जैसे मनचाही मुराद पूरी हो गई गूगल और यू ट्यूब पर सर्च कर केशर सिंह ने की बोर्ड प्ले करने की शुरुआत की  वो शौक उनका नशा बन गया वे दिन बारह से पंद्रह घंटे रियाज करते थे इसने उन्हें केसियो का मास्टर बना दिया था तभी लॉकडाउन खत्म हो गया केशर सिंह भी अपनी नौकरी ज्वाइन करने गुजरात गए लेकिन दो दिन में ही वापस आ गए  फैक्ट्री मालिक ने उन्हें काम देने से इंकार कर दिया बड़ी मुश्किल से किराये की व्यवस्था कर वे गए थे।अब उनके पास फूटी कौड़ी भी नहीं बची थी वे दुखी होकर मंदिर के बाहर वाले चबूतरे पर बैठे हुए थे  वहीं एक भजन मंडली किसी के इंतजार में  बैठी हुई थी  मंडली का  मुखिया बहुत चिंतित था उनका सिन्थेसाइजर प्लेयर सतीश नहीं आया था थोड़ी देर बाद उसका फोन आया कि वो आज आ नहीं सकेगा इस फोन ने मुखिया जी  की घबराहट बढ़ा दी वे कार्यक्रम की एडवाँस राशि ले चुके थे कार्यक्रम की तैयारियाँ हो चुकी थीं  आयोजक मंडली का इंतजार कर रहे थे  फोन पर तो मुखिया ने कह दिया था जल्दी आ रहे हैं पर किस मुँह से जाते तभी केशर सिंह मुखिया के पास आए बोले आप चाहें तो मैं आपकी मदद कर सकता हूँ  वो बोला आप कौन केशर सिंह ने कहा मैं की बोर्ड प्लेयर हूँ मुखिया बोला पहले कहीं कार्यक्रम में हिस्सा लिया है केशरसिंह ने झूठ बोलते हुए कहा  कि हाँ किया है । मुखिया के पास कोई चारा  नहीं था  ट्रायल के तौर पर  उसने की बोर्ड केशर सिंह के सामने रखा तीन लाख का की बोर्ड केशरसिंह ने पहली बार देखा था लेकिन उसके साल भर के कड़े अभ्यास ने उस कीबोर्ड को आसानी से बजाने में मदद की मुखिया उससे संतुष्ट हो गया था  उसने केशर सिंह को मंडली में शामिल कर लिया कार्यक्रम बहुत सफल रहा केशर सिंह का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम था उसे उम्मीद नहीं थी कि उसकी प्रस्तुति इतनी अच्छी होगी  कार्यक्रम के बाद मुखिया ने उसे तीन हजार रुपये दिए पैसे देखकर उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा इतने पैसों की उसे उम्मीद नहीं थी वो तो सोच रहा था तीन सौ रुपये मिल जाएँ तो बहुत हैं लेकिन तीन हजार रुपये तो  ऐसे थे जैसे उसकी लॉटरी लग गई हो जब वह घर पहुँचा तब रात के ग्यारह बजने बाले थे उसकी  पत्नी काशी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। आज घर में खाने को कुछ नहीं थे थोड़े से चावल थे जो काशी ने दोनों बच्चों को खिला दिए थे। लेकिन जब केशरसिंह ने तीन हजार रुपये काशी का हाथ में रखे तो उसका गुस्सा खुशी में बदल गया उत्सुक होकर बोली इतने पैसे कहाँ से लाए क्या कोई रकम गिरवी रखी? केशरसिंह बोले नहीं ये मेरी मेहनत की कमाई है । फिर सारी बात बताई तो काशी बोली मैं तुम्हें बेकार ही ताने देती थी जब तुम म्यूजिक का अभ्यास करते थे मुझे लगता था समय बर्बाद कर रहे हो पर आज उसका फल देखकर खुशी हो रही है। वो तुरंत नुक्कड़ की दुकान पर गई दुकान तो बंद थी पर दुकान मालिक जागे हुए थे उन्होंने वो दुकान घर के कार्नर पर खोल रखी थी। काशी ने वहाँ से खाने का सामान लिया आटा दाल चावल खरीदे  रात को साढ़े बारह बजे बच्चों को जगाकर सभी ने बहुत दिनों बाद मनचाहा भरपेट भोजन किया । इसके बाद केशरसिंह के घर फिर कभी फाकाकशी की नौबत नहीं आई उसे रोज ही कहीं न कहीं कोई न कोई कार्यक्रम मिल ही जाते थे शादी समारोह में आयोजित आर्केस्ट्रा में भी केशर सिंह शामिल हो जाता था आज उसका शौक उसकी जीविका का सबसे बड़ा साधन बन गया था अब उसे नौकरी करने की कोई इच्छा भी नहीं रह गई थी।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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