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कहानी: उपेक्षित कहानीकार

राजधानी की एक प्रमुख साहित्यिक संस्था ने शहर के छः चुने हुए कहानी कारों के कहानी पाठ का आयोजन किया था जिससे सुनने के लिए मात्र पच्चीस श्रोता पहुँचे फिर भी आयोजक इस बात से खुश थे कि कार्यक्रम में बहुत श्रोता शामिल हुए। शायद इसके पूर्व मुश्किल से पाँच सात ही श्रोता आते रहें होंगे कहानी सुनने के लिए देव कुमार भी पहुँचे थे वे भी कहानीकार थे पर उपेक्षित  साढ़े तीन सौ अच्छी कहानियाँ लिखने के बाद भी उनका शहर में कोई नाम नहीं था। वो चुपचाप कहानी सुनते रहे न किसी ने उन्हें पहचाना न महत्व दिया कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वे चुपचाप घर लौटे थे और इस बात से दुखी थे कि लगभग सारी कहानी स्तरहीन थीं उनकी कहानियों के पासंग बराबर भी कोई कहानी नहीं थी जब  की वह सब शहर के प्रमुख कहानीकार माने जाते थे। 
देवकुमार जब से कार्यक्रम से लौटे थे तबसे ही खिन्न  थे कार्यक्रम सरकारी अनुदान से हुआ था उसमें डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए थे प्रत्येक कहानीकार को मोटी रकम का लिफाफा दिया गया था जो स्मृति चिन्ह दिए गए थे वो भी बहुत मँहगे थे आयोजक उस कार्यक्रम को सफल बता रहे थे और अपनी पीठ थपथपा रहे थे। देवकुमार अच्छे कहानीकार थे सोशल मीडिया पर उनके बहुत सारे पाठक थे कहानी के एप पर उनकी कहानियों की रेटिंग फाइव स्टार थी पर उनके शहर के साहित्यकारों में उनका स्थान नगण्य था उसके कई कारण थे जिसमें पहला वे बहुत छोटी नौकरी करते थे  गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने जाते थे। दूसरा कारण वे गरीब थे तीसरा कारण वे अत्यँत पिछड़े तबके से आते थे। चौथी बात ये थी कि वे किसी की चापलूसी करना पसंद नहीं करते थे साढ़े तीन सौ कहानियाँ लिखने के बाद भी देवकुमार की कोई कहानी की किताब नहीं छप सकी थी उन्हें कोई प्रकाशक ही नहीं मिला और खुद की दम पर वे किताब छपवा नहीं सकते थे क्योंकि उनकी कमाई इतनी थी ही नहीं जिन कहानीकारों ने कहानी पाठ किया उनमें एक बैंक के जी एम से रिटायर होकर साहित्य के अखाड़े में उतरे हुए थे दूसरे मंत्री जी के भतीजे थे तीसरे संस्था के संचालक के कृपापात्र थे  चौथे शहर के धनाढ्य थे 
। पाँचवे महाविद्यालय के प्रोफेसर थे। छठवे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के मैनेजर थे ऐसे में देवकुमार जैसे प्राइमरी  के टीचर की पूछ कौन करे भले ही वो कितने ही अच्छे कहानीकार क्यों न हो  देव कुमार जी कुछ देर तक गहरी निराशा में डूबे रहे फिर उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनसे कह रहा हो देवकुमार किन ख्यालों में खोया है अगर लोग क्रीम छोड़कर कचरा पसंद कर रहे हैं तो इसमें तेरी क्या गलती है तेरा काम है लिखना सृजन करना मेहनत और ईमानदारी से सृजन कर अपनी कहानियों को समाज का दर्पण बना एक समय वो आएगा जब तू नहीं रहेगा तेरी कहानियाँ रहेंगी ऐसी कहानी कभी मरती नहीं है उस जमाने के लोगों को यह कहानियाँ इस जमाने  का सारा हाल दिखाएँगी तभी तो लोगों को पता चलेगा कि यह दौर  कैसे स्तरहीन लोगों से भरा था जो  थे तो कोयले लेकिन हीरे की पदवी छीनकर मुकुट में जड़े हुए थे। देवकुमार देर रात तक लिखते रहे एक और अच्छी कहानी। उन्हें मालूम था  कि उस कहानी का भी वही अंजाम होगा जो बाकी कहानियों का हुआ। देव कुमार ने तभी सोचा कि शहर के एक नामचीन कहानीकार ने डेढ़ दर्जन घटिया कहानी लिखी हैं उसकी किताब छपी है कई पुरुस्कार उन्हें मिले हैं उससे वे लाखों रुपये कमा चुके  हैं और राजधानी के प्रमुख कहानीकारों में उनकी गिनती है। फिर देवकुमार के मन ने कहा  कि किसी भी हाल में उसे अपनी सृजनधर्मिता नहीं छोड़ना है। इसी में खुशी है और यही उपलब्धि है। अब देवकुमार अपने आपको बहुत हल्का महसूस कर रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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