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कहानी: वक्त वक्त की बात

कभी गौरव पब्लिक स्कूल की प्रिन्सीपल सुषमा की माँ  जिनके के यहाँ झाड़ू पौंछा का काम करती उस घर की बेटी प्रमिला उनके स्कूल में टीचर थी जो उनके अधीनस्थ रहकर कार्य कर रही थी। प्रमिला का पति प्रमोद भी उसी स्कूल में कार्यालय सहायक के पद पर कार्यरत थे सुषमा के पति  सतेन्द्र उस स्कूल के संचालक के साथ ही नगरपालिका अध्यक्ष भी थे।आड प्रिन्सीपल के कक्ष में आयोजित बैठक में  प्रमिला की प्रिन्सीप नमें अच्छी खिंचाई की थी खूब फटकार भी लगाई थी और वो यस मेडम जी मेडम के अलावा कुछ नहीं कह सकी थी उनके पास और कोई चारा बी नहीं था गौरव पब्लिक स्कूल शहर का  सबसे अच्छा स्कूल था । सटॉफ की सेलरी भी अच्छी थी इसलिए प्रमिला ये नौकरी छोड़ नहीं सकती थी।
प्रमिला घर आकर यही सब सोच रही थी उसे बीस साल पहले का वो समया याद आ गया जब सुषमा और प्रमिला एक ही कॉलेज  में पढती थीं दोनो ने एम ए बी एड साथ साथ किया था। सुषमा के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी  उसके पिता का निधन हो गया था। माँ सौरम घरों में झाडू पौंछा लगाकर परिवार का खर्च चला रही थीं  प्रमिला से सुषमा दबकर रहती थी क्योंकि प्रमिला की मम्मी सुषमा की माँ की समय समय पर पैसे देकर मदद करती रहती थीं । एम ए बी एड करने के बाद   प्रमिला के   पिता विवेक जी को उसकी शादी की फिक्र होने लगी प्रमिला के रिश्ते के लिए  सतेन्द्र अपने पिता के साथ आए थे।  स्वागत सत्कार के बाद बातों का सिलसिला शुरु हुआ  विवेक जी ने पूछ लिया किस सरकारी स्कूल में शिक्षक हो  तब सतेन्द्र ने कहा वो सरकारी स्कूल में नही प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं विवेक जी ने पूछा कितना वेतन मिलता है  जब सतेन्द्र उत्तर दिया तो उसे सुनकर विवेक अनमने हो गए। पर्मिला के पास ही  सुषमा भी थी विवेक बोले यह भी विवाह योग्य है इसकी मम्मी हमारे यहाँ काम करती हैं इसने भी प्रमिला के साथ ही पढ़ाई पूरी की है  अच्छी लडकी है सतेन्द्र को सुषमा  प्रमिला से भी  अधिक अच्छी लगी उसकी इच्छा को देखकर सतेन्द्र के पिता ने रिश्ता पक्का कर दिया एक मिठाई  का  डिब्बा तथा ग्यारह सौ रुपये वे सुषमा को सगुन के तौर पर देकर आ गए  उधर प्रमिला के पिता ने शिवपुर नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी  चँद्र मोहन के बेदे  प्रमोद से प्रमिला का रिश्ता पक्का कर दिया दोनों की शादी एक ही तिथि को हुई।  प्रमिला को खूब दान दहेज दिया गया  जबकि सतेन्द्र को सिर्फ सुषमा ही मिली और थोड़ा बहुत सामान मिला फिर भी सतेन्द्र  सुषमा को पाकर बहुत खुश थे दोनों सहेलियों की शादी एक ही शहर में हुई थी  प्रमिला के पति प्रमोद ने  एम कॉम किया था जबकि सतेन्द्र एम सी बी एड थे।   प्रमिला के  ससुराल में कुछ दिन बड़े अच्छे बीते बाद में प्रमिला की अपनी सास से अनबन हो गई ननद से भी उसका झगड़ा होने लगा था।  जबकि सुषमा के ससुराल का माहौल अच्छा था  उसका खूब  मान सम्मान था।  सतेन्द्र जिस स्कूल में पढ़ाते थे  उसके संचालक हरीश आगरा के रहने वाले थे।  उन्होंने आगरा में ही स्कूल खोल लिया था। यह स्कूल वे सतेन्द्र को सौंप कर चले गए दो साल बाद स्कूल उन्होंने सतेन्द्र जी के नाम कर दिया।  सतेन्द्र जी ने  जब उस स्कूल का  संचालन शूरू किया  तो स्कूल का नाम बदलकर  गौरव पब्लिक स्कूल  रख दिया सतेन्द्र की मेहनत और षुषमा के सहयोग से दस वर्षों में वो स्कूल शहर का सबसे बड़ा और   प्रतिष्ठित स्कूल बन गया था।  प्रमिला को उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया था  उनके सामने पेट भर  भोजन जुटाने की समस्या थी  इसलिए दोनों एक निर्माणाधीन मकान में मजदूरी करने लगे थे  शाम को जब भुगतान करने वहाँ सतेन्द् आए तो प्रमोद तथा प्रमिला को मजदूरों के बीच देखकर चौंक गए।  उनको वे अपने साथ ले आए उनके रहने के लिए फ्लेट की व्यवस्था की बाजार से सामान दिलवाया  दोनों को अपने स्कूल में नौकरी दे दी। तब प्रमिला को पता चला  कि सुषमा वहाँ की प्राचार्य   हैं  तॅ उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। प्रमिला को  वहाँ काम करते  हुए   ।दस वर्ष हो गए थे।
सुषमा शहर की प्रतिष्ठित हस्ती थी  जबकि प्रमिला साधारण जीवन जी रही थी।
*****,
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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