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कहानी: वक्त की मार

लावारिश और अर्ध विक्षिप्त अवस्था में सत्तर वर्षीय रजनी वर्मा को वृद्धाश्रम में आए हुए छः महीन हो गए थे डॉक्टरों के इलाज और सही देखभाल  से उनकी हालत में बहुत सुधार हो गया था। आज उनसे जब वृद्धाश्रम की संचालिका नीता दुबे मिलीं तो उनकी हालत में सुधार देखकर बड़ी खुश हुईं । रजनी नीता  की बचपन की सहेली थीं
दोनों ने एक ही कॉलेज में पढ़ाई की थी पढ़ाई के बाद एक ही कंपनी में नौकरी। बाद में नीता ने नौकरी छोड़ खुद की कंपनी खोल ली थी तभी से रजनी और नीता का संपर्क टूट गया था नीता मुंबई में आ गई थी। जबकि रजनी कानपुर में ही एक कारखाने में असिसटेन्ट मैनेजर का जॉब करती रही रजनी आजाद ख्याल की लड़की थी शादी के बँधन में बँधना उसे पसंद नहीं था उसे अच्छी खासी तनख्वाह मिलती थी पर वो सारा रुपया उड़ा देती थी कोई उसे कहता बचत करो कल काम आएगी तो कहती मेरे कौनसे बाल बच्चे हैं।  या घर परिवार है मैं तो पेइंग गेस्ट बनकर रहती हूँ और जीवन का आनंद उठाना चाहती हूँ मुझे किसी की रोकटोक पसंद नहीं  पैपा रजनी ने  खूब कमाया। वो दुनिया का कोना कोना देख आई थी लेकिन जब वह साठ वर्ष की हुई  तब कंपनी के एम डी भी बदल गए थे उन्होंने रजनी को रिटायर कर दिया रिटायरमेन्ट पर उसे सत्तर लाख रुपये मिले थे  किसी ने कहा कि  कहीं पर कोई मकान खरीद लो या फिर किसी स्कीम में निवेश कर दो पर उसने किसी की नहीं मानी सारा पैस  पाँच साल में ही फूँक डाला फिर जो थोडे बहुत जेवर थे उन्हें बेचकर काम चलाया आखिर जब पैसे खत्म हो गए तो पेइंग गेस्ट से उसे निकाल दिया गया हारकर रजनी नगर निगम के रैनबसेरा में आ गई एक संस्था मुफ्त खाना बाँटती थी उसमें वो खाना खा लेती थी पैसे पैसे को  भोहताज हो गई थी रजनी ने ऐसे दिनों की कभी कल्पना तक नहीं की थी। धीरे धीरे वो असहज हो गई कई दिनों तक नहाती नहीं थी मैले कुचेले कपड़े हो  गए थे खुद का ही होश नहीं था  एक दिन रैन बसेरा छोड़कर वो चल दी और ट्रेन में बैठकर मुंबई आ गई यहाँ एक पुल के नीचे रहने लगी  यहाँ पर एक सरदार जी आते थे जो ऐसे लोगों को मुफ्त भोजन का वितरण करते थे रजनी को भी वो भोजन मिलता और उसका पेट भर जाता था नीता दुबे को रजनी मंदिर के पास भिखारियों के बीच बैठी हुई मिली थी नीता ने जब उसे गौर से देखा तो उसे पहचान गई और अपने साथ वृद्धाश्रम में ले आई थी नीता दुबे  की कहानी रजनी से हटकर रही नीता की शादी जिससे हुई वो अच्छा इंसान नहीं था  उसके कई औरतों से संबंध थे जितना पैसा कमाता सब उड़ा देता फिर नीता से पैसा माँगता नीता ने जब पैसा देना बंद कर दिया तो कहने लगा कि अपनी कंपनी बंद कर दे। फिर उसने घर में आना जाना ही बंद कर दिया एक महिला के घर पर  ही वो रहने लगा था जो सभी को घर में जुआ सट्टा खिलाती थी तथा गाँजा बेचती थी। उस महिला के कहने में आकर नीता के पति ने उसे तलाक दे दिया था उसके तीन साल बाद नीता के घर पुलिस आई उसने बताया कि जेल में एक विचाराधीन मुलजिम पिछले छः माह से बंद  है उसकी जमानत लेने वाला कोई नहीं है उसने आपका नाम लेकर कहा है कि आप उसकी पत्नी  हो आप उसकी  जमानत ले लेंगी नीता बोली मैं उसकी पत्नी तीन साल पहले थी इसके बाद हमारा तलाक हो गया अब मेरा उससे कोई संबंध  नहीं है आपको उसके खिलाफ जो कार्रवाई करना है करें । नीता ने तलाक के बाद कोई  दूसरी शादी नहीं की  सारा ध्यान अपनी कंपनी पर केन्द्रित कर दिया खूब पैसा कमाया  सारा पैसा भलाई के कामों में लगाया  गरीबों को अच्छा इलाज मिले यह सोचकर अस्पताल खोला जब उसकी उम्र साठ वर्ष की हो गई तब ये  वृद्धाश्रम खोल लिया  नीता कंपनी की अब भी सर्वेसर्वा थी पर उसका सारा प्रबंध उसने अपनी विश्वसनीय टीम को सौंप दिया था। जहाँ रजनी को लेकर नीता आई थी उस आश्रम को खुले दस वर्ष हो गए थः। आश्रम में सारी सुख सुविधाएँ थीं सबकी देखभाल अच्छी होती इसलिए सभी  खुश रहते थे  रजनी में भी अब बहुत परिवर्तन आ गया था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप  


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