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कहानी: देशी इलाज

विंध्य क्षेत् के वनांचल में स्थित ग्राम तेंदू खेड़ी में वैद्य  हरीश चौबे देशी जड़ी बूटियों से  अनेक असाथ्य रोगों का अचूक इलाज करने के कारण विख्यात थे प्रतिदिन दूर लूर से रोग पीड़ित उनसे इलाज कराने आते थे। लगभग दो सौ वर्षों से तेंदू खेड़ी ग्राम में इसी तरह से मरीजों का इलाज हो रहा था । हरीश चौबे तीसरी पीढ़ी के वैद्य थे उनकी आयु भी सत्तर वर्ष की हो चुकी थी अभी तक कोई उन्हें इस योग्य नहीं मिला था  जिसे वे अपना उत्तराधिकारी बना पाएँ। उन्हें वैद्यकी सिखाने वाले दवाओं की पहचान कराने वाले नाड़ी का ज्ञान कराने वाले अश्विनी महाराज  यह अच्छी तरह समझा कर गए थे कि यह  विद्या किसी अपात्र को कभी भत देना नहीं तो दवाओं में  उतना असर नहीं रहेगा  अपात्र रोग की पहचान भूल जाएगा हरोश चौबे अपनी गुरू की इस बात को हमेशा ध्यान में रखते थे उनके पास दस  सहयोगी थे जो दवाएँ  जंगल से लाते दवाएँ तैयार भी करते मरीजों का इलाज भी करते पर कभी हरीश चौबे जैसे निपुण नहीं बन  पाते थे।  कभी  उनके बेटे रितेश ने  अपनी विरासत उसे सौंपने की जिद की थी आज वो हरिद्वार के  आयुर्वेदिक कॉलेज के प्रोफसर का नियुक्ति पत्र  पाकर खुश हो रहा था।
जिसे उन्होंने हर बार की तरह टाल दिया था।  जब हरीश चौबे घर आए तो उनकी पत्नी भी  रितेश का साथ देती हुई बोली थी  कि ये आपका बेटा है ये आपका काम अच्ठी तरह सँभाल लेगा  वैसे भी अस्सी प्रतिशत विद्या तो उसे अनुभव से मिल गई है।  आपको बाकी बीस प्रतिशत ही विद्या उसे प्रदान करना है।  इस पर हरीश अपनी पत्नी से बोले  वो तो वैसे भी मुझसे ज्यादा योग्य है  उसने बी ए एम एस  तथा एम डी की पढाई की है तथा गोल्ड मेडल भी प्राप्त किया है।  इस पर पत्नी ने कहा कि  फिर भी आपके समक्ष वो बच्चा ही है। फिर बात वहीं खत्म हो गई।  हरीश चौबे के  गुरु अश्विनी जी को यह विद्या  चंद्र शेखर महाराज ने सिखाई थी  चँद्र शेखर जी कहाँ से इस गाँव में आए थे किसी को कभी पता नहीं चल पाया था।  उन्हें किसने ये विद्या सिखाई ये कोई भी नहीं जानता था पर यह बात  आज भी सही थी कि तेंदू खेड़ी ग्राम की पहचान इसी से थी। आज भी चँद्र  शेखर जी के बनाए नियम और सिद्धाँत बदले नही थे।  अश्विनी महाराज ने जब अपनी विरासत हरीश जी को सौंपी थी तब यही कहा था कि मेरे दो बेटों को मैंने इस योग्य नहीं समझा और तुम्हें इसका  पूरा  ज्ञान दिया इसे भलाई में लगाना कभी लोभ लालच मत करना कभी इस गाँव को छोड़कर कहीं मत जाना न इसकी शाखा खोलना  यह ज्ञान किसी अपात्र को मत देना भले ही वो तुम्हारा लाड़ला बेटा ही क्यों न हो। हरीश अपने गुरू के आदर्शों पर  आड भी चल रहे थे  जबकि उनके दर्जनों सहयोगियों ने अपने अधूरे ज्ञान से  कई जगह  औषधालय खोल लिए थे। पर वे कभी सफल नहीं हो सके थे। हरीश जी के यहाँ प्रतिदिन  हजारों की सँख्या में मरीज आते थे पर वे चुने हुए केवल पाँच मरीजो से ही इलाज का पैसा लेते थे बाकी सबका इलाज भी निशुल्क करते थे  तथा दवा के भी पैसे नहीं लेते थे यही उनके गुरू का आदेश था जिसका वो पालन कर रहे थे कोई  अगर अधिक पैसे देना चाहे तो मना कर देते थे।  एक दिन रितेश ने अपने पिताजी से कहा कि आपने एक मरीज की नब्ज देखकर ये कैसे बता दिया कि  नौ वर्ष चार माह  अठारह दिन पहले  शाम को छः बजे किसी ने  चाय में  इसे ऐसा जहर दिया था जिसका  असर दस वर्ष बाद हो  फिर यह भी कहा कि अगर इसका इलाज नही हुआ तो  ठीक दस वर्ष बाद दॅपहर के  दो बजे इसका निधन हो जाएगा।  और आपने उसको दवा देकर एक दम  ठीक कर दिया आज भी वो सही सलामत है आपने उससे दवा के नाम पर एक रुपया भी नहीं लिया।  हरीश बोले  यही तो गुरू कृपा से प्राप्त विद्या है जो  च॔द सेकंड के लिए नब्ज टटोलने पर सारी बीमारी का पता लगा लेती है। इस बात को गुजर हुए कई दिन हो गए थे।आज जब वे    घर आए तो उनकी पत्नी बड़ी खुश नजर आ रही थी बोली रोहित का चयन आर्युवेदिक कॉलेज हरिद्वार में  प्रोफेसर के पद पर हो गया है और वो कल जा रहा है यह सुनकर हरीश बोले अच्छा है । गुरू कृपे से मुझे पहले ही पता था कि रोहित विद्या सीखने के बाद   यह गाँव छोड़ देगा यह सौनकर पत्नी बोली जो हुआ सो अच्छा हुआ इस गाँव में उसका क्या भविष्य था। हरीश चुप हो गए उन्हें अब भी पूरी आस थी की कभी तो कोई  योग्य शिष्य मिलेगा जिसे वे अपनी विरासत सोंप सकेंगे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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