रामनिवास चतुर्वेदी जिस फ्लेट में रह रहे थे उसको बेचने की नौबत आ गई थी । पर उनकी दूरदृष्टि ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया था आज वही फ्लेट उनके बुढ़ापे में बड़े काम आ रहा है इसी के कारण वे वृद्धाश्रम जाने से बच गए और आराम से तथा सम्मान के साथ यहाँ रह रहे थे अभी एक यजमान के यहाँ कथा एवं पूजा कराकर लौटे थे दान दक्षिणा में उन्हें बारह सौ रुपये मिले थे उनके लिए यह राशि बहुत थी आखिर उनका खर्च ही क्या था।
रामनिवास चतुर्वेदी हाई स्कूल में संस्कृत के शिक्षक थे साल भर पहले ही सेवानिवृत हुए थे । उनका स्वतंत्र डूप्लेक्स मकान था जिसमें उनकी पत्नी बहू बेटे बैटी नाती पोते सब रह रहे थे इस फ्लेट में वे छः महीने से अकेले ही रह रहे थे उनकी पत्नी उन्हें छोडकर अपने बहू बेटों नाती पोतों में रमी हुई थी उनकी सारी पेंशन वो झटक लेती थी फिर भी चतुर्वेदी जी आराम से रह रहे थे। दस वर्ष पहले की बात है जब उनका पूरा परिवार इसी फ्लेट में रहता था तब न उनके बेटे मनीष की शादी हुई थी ना ही बिटिया सुचित्रा की मनीष बहुराष्ट्रीय कंपनी मैं मैनेजर था उसकी शादी की बात चल रही थी पर फ्लेट टू बी एच के था तो इस बात पर सब विचार करते कि बहू आएगी तो वो कहाँ रहेगी अगर उसे कमरा दे दिया तो बेटी कहाँ रहेगी इस पर उनके घर में खूब बहस होती थी मनीष कमाता तो खूब था घर में एक रूपया नहीं देता था सारा पैसा उड़ा देता था रामनिवास जी की पत्नी पुष्पा भी बेटे का पक्ष लेती मनीष कहता इस फ्लेट को बेचकर तथा बाकी पैसे बैंक से लोन लेकर बड़ा मकान ले लेते हैं वहीं सब रहेंगे रामनिवास चतुर्वेदी इस पर तैयार हो गए मनीष ने भी कहा पिताजी आप सारी उम्र हम लोगों के लिए खटते रहे अपने लिए कुछ किया नहीं जब आप रिटायर हो जाओगे तो आराम से हमारे साथ रहना बड़े मकान में उन दिनों उनका शिष्य आशीष गुप्ता जो बिल्डर बन गया था वो विकसित भूखँड बेच रहा था। रामनिवास जी ने जी पी एफ से पन्द्रह लाख रुपये निकालवाए कुछ उनकी बचत थी इस तरह अठारह लाख रुपये में उन्होंने आशीष से दो हजार वर्ग फीट का प्लॉट ले लिया फिर उस पर हाउस लोन लेकर उन्होंने डुप्लेक्स मकान बनवाना शुरू किया पत्नी कहने पर कि फ्लेट आपके नाम है प्लॉट आप मनीष के नाम खरीद लें आखिर अपने बाद उसे ही तो सब कुछ मिलना है । रामनिवास ने पत्नी की बात मान ली और प्लॉट मनीष के नाम से खरीदा था और लोन खुद के नाम से लिया था मकान तो बन गया पर शादी के लिए पैसे नहीं बचे तो मनीष फ्लेट बेचने के लिए दवाब बनाने लगा रामनिवास जी इसके लिए तैयार भी हो गए एक दिन की बात है घर में सभी लोग बैठकर बातें कर रहे थे तभी किसी बात पर उनकी पत्नी से बहस होने लगी बहस ने कहासुनी का रूप ले लिया उनके पक्ष में कोई नहीं था इससे उन्होंने अपने भविष्य का अंदाजा लगा लिया फ्लेट बेचने का इरादा उन्होंने त्याग दिया था । इस बात को लेकर उनमें काफी गरमागरम बहस हुई मनीष बदतमीजी पर उतर आया था और पत्नी मनीष के ही साथ दे रही थी मनीष ने कहा शादी के लिए मुझे बीस लाख रुपया चाहिए कहीं से भी लाओ चाहे अपने आपको बेच दो मुझे इससे कोई मतलब नहीं । रामनिवास जी ने आठ दिन में बीस लाख रुपये अपने गाँव का पुश्तैनी मकान बेचकर दे दिए मनीष और उसकी माँ यही समझी की इन्होंने फ्लेट बेच दिया है ये बात उन्होंने सबसे छिपा ली फ्लेट के बिकने से बचाने के लिए उनके पास यही एक रास्ता था शादी धूमधाम से हो गई बहू भी आ गई इसके बाद दो साल बाद उन्होंने बेटी की भी शादी कर दी जी पी एफ में जो बचा खुचा रुपया था वो निकाल लिया था एफ डी तुड़वा ली थी कुछ जेवर बेच दिए थे कुछ मित्रों से कर्ज ले लिया था बेटी के शादी के बाद जैसे ही कर्ज निबटा तो मनीष कार खरीदने की जिद करने लगा अब उनकी सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष का समय बचा था इन तीन वर्षों में उन्होंने कार की किश्त अदा की आखिर सेवानिवृत्ति का दिन आ ही गया जो ग्रेच्यूटी और फंड का पैसा मिला उससे उन्होंने बेंक हाउस लोन एक मुश्त जमा कर दिये लोन की किश्त पैंतीस हजार थी और उनकी पेंशन पैंतालीस हजार रूपये बन रही थी अगर वे लोन चुकता नहीं करते तो दस हजार रुपये में कैसे गुजारा करते मनीष ने देखा अब पिताजी के पास पैंशन के सिवाय कुछ नहीं उनका ए टी एम कार्ड मनीष के पास था वही पेंशन निकालकर लाता था वे सब उनकी पत्नी को तो अच्छे से रखते थे पर उन्हें परेशान करते प्रताडित करते थे बहू को भी उनको सताने में मजा आता था एक दिन मनीष ने कहा पिताजी अगर हमारे साथ ठीक से नहीं रहोगे हम आपको वृद्धाश्रम में छोड़ आएँगे एक दिन रामनिवास जी ने कह ही दिया कि ये वृद्धाश्रम में ले जाने की धमकी बार बार क्यों दे रहे हो लो मैं खुद ही निकल जाता हूँ । वे निकल गए किसी ने उन्हें रोका तक नहीं बैंक खाता उनका पत्नी के साथ संयुक्त था ए टी एम मनीष के पास था ही अब रामनिवास घर में किसी काम के नहीं रह गए बहू उनको नकारा कहती थी उनके जाने से सभी खुश थे रामनिवास फ्लेट में आ गए शाम को वो मंदिर के पास बने चबूतरे पर बैठे थे वहाँ कथा का आयोजन हो रहा था सबको पंडित जी के आने का इंतजार था पर पंडित जी ने आने में असमर्थता दिखाई रामनिवास चतुर्वेदी धोती कुर्ता पहनते तिलक लगाते थे किसी ने उन्हें पुरोहित समझ लिया वह उन्हें मनाकर कथा स्थल पर ले आए रामनिवास जी वैसे भी संस्कृत के विद्वान थे सारे शास्त्र पढ़े हुए मंत्रों का ज्ञान था पंडित भी थे रामनिवास जी ने कथा करा दी थी इसके बदले रामनिवास जी को आठ सौ रुपये मिले थे। इससे वे पेटभर खाना खाकर फ्लेट पर आ गए शहर में अनुष्ठान करने वाले पंडितों की बहुत कमी थी अब चतुर्वेदी जी को काम से ही फुर्सत नहीं मिलती थी और वे आराम से एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे थे।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
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