सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहानी: छूटा मायका

मोहिनी की माँ  कल्याणी का निधन हुए दस वर्ष हो गए थे माँ के निधन के बाद से ही उसका मायका छूट गया था वो एक बार भी मायके नहीं आई थी दस वर्ष  बाद जब पिता किशनलाल का निधन हुआ तब वो मायक आई थी लेकिन भाई भाभी का रूखा और अपमान जनक व्यवहार देखकर वो एक लॉज में ठहरी थी आज उसके पिता की तेरहवीं थी तेरहवीं करने बाद  वो अपने पति और दोनों बच्चों के साथ घर लौट रही थी अब उसका मायका मायका नहीं रह गया था।
मोहिनी बर्थ पर लेटी पुरानी बातों को याद कर रही थी। उसने जब से होश सम्हाला था तबसे वो अपने पिता का उसके प्रति रूखा व्यवहार देख रही थी वे उससे बहुत कम बात करते थे कभी मोहिनी को पिता ने  दुलार नहीं किया था मोहिनी की माँ कल्याणी ही उसे लाड़ प्यार से रखती थी। कल्याणी कहती थी जब मोहिनी का जन्म हुआ तो उसके पिता फूट फूटकर रोए थे माँ पे गुस्सा हुए थे बेटे के लिए मन्नत माँगी थी और बेटी हो गई थी उनके दुख का सबसे बड़ा कारण यही था पन्द्रह दिन तक उन्होंने अपनी बेटी का मुँह तक नहीं देखा था। उसके जन्म से उसकी माँ की कदर भी कम हो गई थी उसके जन्म के तीन साल बाद जब उसके भाई विवेक का जन्म हुआ तब पिता के चेहरे पर मुस्कान आई उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा  विवेक को उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से पाला था उसको पढ़ाया भी अच्छे स्कूल जबकि मोहिनी को वे सरकारी स्कूल में पढा रहे थे मोहिनी को फल फ्रूट उसकी माँ पिता की चोरी से देती थीं  किशनलाल सरकारी दफ्तर में बाबू थे । उन्होंने प्लॉट लेकर जो मकान बनाया था वो भी उनके ही नाम था  माँ के नाम कोई जमीन जायदाद नहीं थी हायर सेकेण्डरी पास करने के बाद पिता ने मोहिनी की पढ़ाई छुड़वा दी और उसकी शादी के लिए लड़का ढूँढ़ना शुरू कर दिया वो ऐसा लड़का  ढूँढ रहे थे जो दहेज न ले आखिर मोहित के रूप में उन्हें वो लड़का मिला  तो बहुत सस्ते में उन्होंने मोहिनी की शादी कर दी  इस बीच मोहिनी ने बीए और डी एड कर लिया था शादी के छः महीने बाद वो शासकीय प्राथमिक स्कूल में शिक्षक के पद पर नियुक्ति पाने में सफल हो गई मोहित एक कंपनी में काम कर रहे थे शादी के बाद उनका भी प्रमोशन हो गया था मोहिनी की शादी के बाद पाँच साल तक  उसका मायके में आना जाना रहा पर जब विवेक की  शादी सोनाली से हो गई तो मोहिनी का आना जाना कम हो गया था मोहिनी भी दो बच्चों की माँ हो गई थी बच्चे स्कूल भी जाने लगे थे। मोहिनी को दुख तब  होता जब वो भाभी को उससे अधिक स्नेह देते उसकी हर बात मानते और उसकी सुख सुविधा का ध्यान रखते  जबकि मोहिनी से बात तक नहीं करते थे भाई विवेक का व्यवहार भी उसके प्रति रूखा था  यह  देखकर सोनाली भी उसका अपमान करने लगी थी एक बार जब वो राखी पर आई तो उसने अपनी मम्मी का पक्ष लेकर कुछ तल्ख लहजे में सोनिया से बात कर दी सोनिया ने भइया को ऐसा भड़काया की उसने मोहिनी से राखी तक नहीं बँधवाई माँ कल्याणी ने अपनी तरफ से उसे  दो सौ रुपये दे दिए पर भैया से किसी ने कुछ भी नहीं कहा। मोहिनी उदास होकर घर आ गई  और भगवान कृष्ण की प्रतिमा को राखी बाँधकर उन्हें अपना भाई बना लिया। । विवेक ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया पिताजी ने उसकी  स्टेशनरी की दुकान खुलवा दी  पिताजी रिटायर  हुए तो जो फंड मिला उससे उन्होंने पाँच एकड़ जमीन सीधे बहू सोनाली के नाम से खरीद दी। जब माँ ज्यादा बीमार हुई तो  सोनाली ने उनकी सेवा करने से इंकार कर दिया तो पिताजी माँ को मोहिनी के पास छोड़ गए जब माँ का निधन हुआ तब माँ की डेडबॉडी   ले गए ये कहकर की बेटी के  यहाँ से अंतिम संस्कार करना दोषपूर्ण है।  मोहिनी कुछ नहीं बोली कहती भी क्या माँ के  निधन के बाद उन्होंने सारे गहने  सोनाली को दे दिए अपनी पेंशन भी उसे देने लगे कभी एकाध बार वे मोहिनी के घर आए भी तो पाँच रुपये वाला पारले जी का बिस्किट का पेकेट देकर   पाँच सौ रुपये का खाना खाकर चले गए  सोनाली के सामने तो मोहिनी का नाम लेना तक गुनाह था उन्होंने अपना मकान भी सोनाली के नाम पर कर दिया था। मोहिनी जब पिता के अंतिम संस्कार में आई तब पड़ोसियों ने बताया कि सोनाली  मोहिनी के पिता से बीमारी के समय बुरा बर्ताव करती थी विवेक और सोनाली कई बार उन्हें पीट भी चुके थे। उन्हें बहुत कष्टदायी मौत मिली थी।  यह बात सुनकर मोहिनी दुख प्रकट करने के अलावा कर ही क्या सकती थी आज जब वो मायके से लौट रही थी तो ये प्रण करके आई थी कि अब वो कभी अपने मायके नहीं जाएगी।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

व्यंग्य : जीते जी रोटी को तरसाया मरने के बाद श्राद्ध

आज कल सोलह श्राद्ध का समय चल रहा है कई जगह पर श्राद्ध के आयोजन हो रहे हैं बहुत सारे लोगों को भोजन कराया जा रहा है अपने पितरों के श्राद्ध में लोग हज़ारों रुपये भी खर्च कर रहे हैं उनमें कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने जीते जी अपने बूढ़े माँ बाप की खबर तक नहीं ली और अब उनके मरने पर उनके श्राद्ध पर बड़ा आयोजन कर रहे हैं उनकी तस्वोर पर माला चढ़ा रहे हैं। ऐसे लोगों में शहर के रविकांत जी भी हैं उन्होंने अपने स्वर्गीय माता पिता की तिथि पर भव्य आयोजन किया था खूब पकवान खिलाए गए थे खूब दान किया गया था पर उन्होंने अपने माता पिता को जीते जी बहुत दुख दिए थे। उनके पिताजी सत्तासी वर्ष के थे माँ पिच्यासी वर्ष की दोनों अपने पुराने घर में रहते थे उनका बेटा रविकांत उनकी कभी खोज खबर नहीं लेता था बेटी विदेश में दामाद के साथ रह रही थी। वे दोनों ही एक दूसरे का ख्याल रख रहे थे एक दिन रविकांत जी के पिताजी का दुखद निधन हो गया तब रविकाँत घर?आया पिताजी की उत्तर क्रिया करने के बाद चला गया रविकाँत की माँ अकेली रह गई थीं वे सीधी सरल थी जबकि बेटा बहू चपल चालाक बेटे बहू ने बातों में लेकर उनकी सारे सोने चाँदी के जे...

दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग (व्यंग्य)

कबीर जी ने निंदक को इसलिए हितकारी कहा है क्योंकि वो हमारी बुराइयों को उजागर करते हैं और हम उन्हें दूर करते चले जाते हैं। इस तरह हमारा स्वभाव निर्मल हो जाता है। लेकिन आज के दौर में दुर्भावना रखकर निंदा करने वालों की संख्या ज्यादा हो गई है। ऐसे लोग हमारी बुराईयों को उजागर नहीं करते बल्कि हमारी खूबियों को छिपाकर मन में दुर्भावना रखते हुए हमारी निंदा करते हैं। इन लोगों से दूर रहने में ही भलाई है। अगर इनको साथ रखा तो ये हमारा मनोबल तोड़कर रख देंगे। हमें नकारा साबित करने की कोशिश करेंगे हमारे आत्मविश्वास को डगमगा देंगे। ये दुर्भावना रखकर निंदा करने वाले लोग अपने विरोधियों को निपटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उसके सारे अवसर या तो खत्म कर देते हैं या छीन लेते हैं। ये लोग हद दर्जे के मतलबी इंसान होते हैं। जिस से मतलब निकालना हो उसकी झूठी तारीफों के पुल बाँधते हैं। उसकी खूब चापलूसी करते हैं उसे महान सिद्ध कर देते हैं और समाज में एक भ्रम की स्थिति पैदा कर देते हैं। ये ग्रुप बनाने में माहिर होते हैं। जो इनके गुट में शामिल हो जाता है ये उसके हर ऐब ढँक लेते हैं। उसे स्थापित करने के हर स...

कहानी: शादी के लिए नौकरी

रवीन्द्रसिंह को एक प्राईवेट दवा कंपनी में नौकरी किए अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि वह नौकरी छोड़ने का इरादा करने लगा था  लेकिन उसकी  माँ कंचन  का कहना था  जब तक  तेरी शादी न हो जाए  तब तक नौकरी करता रह जब शादी हो जाए तब नौकरी छोड़ना जबकि रवीन्द्र सिंह सोच रहा था कि एक महीना गुजारना मुश्किल हो रहा है कब तो उसकी शादी होगी और कब वो ऐसी नौकरी से पीछा छुड़ाएगा रवीन्द्र सिंह की  उम्र पैंतीस वर्ष की होने जा रही थी  और वो अभी तक कुँवारा  था कंचन जी का वह इकलौता लड़का था  उनकी दो लड़कियाँ थीं दोनों रवीन्द्द से बड़ीं थीं दोनों की शादी हो गईं थी दोनों के बच्चे   कोई छठी में तो कोई सातवीं में तो कोई आठवीं में पढ़ रहा था।  कंचन जी कस्बे के  एक सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी कर रही थीं  उनके पति सुरेन्द्रसिंह  सरकारी दफ्तर में बाबू थे  सरकारी काम से जब वे कहीं जा रहे थे तब  एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी थी जिससे उनका वहीं दुखद निधन हो गया था।  जब रवीन्द्र एक साल का था तब उसके पिता का निधन हुआ था उसकी दोन...