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कहानी: माँ का फर्ज

राधेश्याम ने दीदी माँ निर्मला  का सत्तर वर्ष की आयु होने पर  स्वास्थ्य परीक्षण कराया था वे पूरी तरह स्वस्थ  थीं यह जानकर वो बहुत खुश था । दीदी माँ को वो बहुत मानता था वैसे तो उन्हें खुद बत्तीस हजार रुपये महीने पेंशन मिलती थीं पर राधेश्याम उनसे पेंशन के पैसों का कभी हिसाब नहीं लेता था वो जो भी कुछ था दीदी भाँ के कारण था। राधेश्याम चार्टर्ड एकाउण्टेन्ट था उसकी खुद की कंपनी थी वो खुद लाखों रुपया महीना कमाता था । जिस घर में रहता था वो आलीशान था उसमें दीदी माँ का कमरा ही सबसे सादगी  पूर्ण था राधेश्याभ के दोनों बच्चे  रिचा और रितेश शहर के सबसे मँहगे स्कूल में पढ़ते थे आज निर्मला जी का सत्तरवाँ  वाँ जन्मदिवस था जो उन्होंने सादगी से मनाया था। 
दीदी माँ को राधेश्याम के दोनों बच्चे दादी भुआ कहते थे।निर्मला जी का ज्यादातर समय पूजा पाठ और समाज सेवा में  व्यतीत होता था। बाकी समय वे राधेश्याम के बच्चों के बीच बिताती थीं। वे पूर्ण स्वस्थ थी  उनकी सामाजिक संस्था का नाम संपूर्णा था जिसके माध्यम से वे समाज सेवा करती थीं।
आज से चालीस वर्ष पूर्व निर्भला जी का जीवन इतना आसान और सुखद नहीं था। उनकी शादी उनकी माँ सुशीला  ने बीस वर्ष की अवस्था में कर दी थी शादी के आठ साल बाद भी कोई संतान नहीं होने पर उनके पति नरेश ने उनसे रूखा व्यवहार करना शुरू कर दिया था उनकी सास भी  संतान न होने पर उन्हें प्रताड़ित करती थी  वे भी दुखी रहती थीं डॉक्टरों ने उनकी सारी जाँच की थीं  उनमें कोई कमी नहीं थीर वे गर्भवती क्यों नहीं हो पा रही थीं इसका किसी के पास जवाब नहीं था। फिर भी डॉक्टरों ने उनका इलाज जारी रखा था। इसका परिणाम सुखद निकला एक दिन डॉक्टर ने उनका परीक्षण कर मुस्कुराते हुए कहा था। बधाई हो आप माँ बनने वाली हैं सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन उनके मायके में जो घटना घटी उसने सबको सकते में डाल दिया था। निर्मला की  माँ सुशीला सैंतालीस वर्ष की उम्र में गर्भवती हो गई थीं और शर्म के मारे उन्होंने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था उनकी बहू चंद्रिका के दो बच्चे थे। जिसमें बेटी प्रिया पाँच वर्ष की और बेटा शिवम दो वर्ष का था। ऊपनी सास  के  गर्भवती  होने पर चंद्रिका ने उन्हें हिम्मत बंधाई थी उनका चार माह का गर्भ हो गया था वे यही समझी की रजोनिवृति हुई है उन्हें सपने मे भी अपने गर्भवती होने की उम्मीद नहीं थी अब गर्भपात कराना भी संभव नहीं था। दोनों माँ बेटी  का गर्भ   काल बराबर ही चल रहा था। अचानक निर्मला को आठवें माह में भयंकर पीड़ा हुई सब समझे की हो सकता है उन्हें शीघ्र प्रसव हो जाए लेकिन अस्पताल में पता चला की  उनकी स्थिति गँभीर है। उनका बड़ा ऑपरेशन हुआ डॉक्टर बच्चे को नहीं बचा पाए निर्मला की बच्चेदानी निकालना पड़ी तब कहीं उनकी जान बची  पति को जब पता चला कि वो अब कभी माँ नहीं बन सकेगी तो उसने उन्हें हमेशा के लिए छोड दिया वे मायके रहने आ गईं मायके में उन्हें सरकारी अस्पताल में नर्स की नौकरी मिल गई थी। उसकी माँ सुशीला का गर्भ दस माह का हो गया था  प्रसव पीड़ा होने पर उन्हें अस्पताल ले जाया गया वहाँ वे सारी रात तड़पी और जब बच्चे ने जन्म लिया तभी वे संसार छोड़कर चली गईं  यै ख़बर जब उनके पति रेश्मलाल को पता चली तो वे चक्कर खाकर गिर पडे उन्हें हार्ट अटेक आया था जिसमें उनके प्राण पखेरू उड़ गए थे।  बच्चा स्वस्थ था पर माँ बाप दोनों का निधन हो गया था निर्मला  के आँचल में दूध था। उन्होंने अपना दूध पिलाकर राधेश्याम  की परवरिश की थी इसलिए राधेश्याम उनसे दीदी माँ कहता  था। दीदी माँ ने ही उन्हें पढ़ा लिखाकर  सी ए बनाया था। राधेश्याम को कभी अहसास भी नहीं होने दिया कि वो  बिना माँ का बच्चा है। यही कारण है कि वो दीदी माँ  को  हमेशा खुश देखना चाहता था।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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