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कहानी: रामधन सेठ की छतरी

कभी गाँव  रतनपुर की सबसे रमणीक जगह रही रामधन सेठ की छतरी तथा उससे लगा बाग आज जुआरियों और शराबियों का अड्डा बन चुका है। पूरा बाग बिक गया है और उस पर कॉलोनी बन गई है अब वहाँ आम जामुन के पेड़ नहीं रह गअः है। हरिसिंह काका जी जो गाँव के बुजुर्ग थे वे छतरी के पास बने चबूतरे पर बैठकर गाँव के युवक रोहित को राभधन सेठ के बारे में बता रहे थे।
रामधन सेठ साठ वर्ष पुर्व  रतनपुर ग्राम के संपन्न व्यक्ति में गिने जाते थे  उस समय रतनपुर गाँव में बिजली भी नहीं थी स्कूल पाँचवी तक था सड़क भी नहीं थी पूरे गाँव में एक राभधन सेठ का मकान ही पक्का था। उस समय गाँव की आबादी तीन हजार थी । रतनपुर उस समय पूरा देहात से कम नहीं था। स्कूल के शिक्षक रामचंद्र गुप्ता  जी रंगमंच के कलाकार थे।  वे गाँव  में नाटकों का  मंचन करते थे । उसमे  रामधन जी  खुले दिल से सहयोग देते  थे उन्हें अपने नाम फैलाने  की चिंता रहती थी गाँव में जब नाटकों का मंचन होता तब रामधन सेठ छाए हुए रहते थे कलाकारों को भोजन और  रहने की व्यवस्था वो ही  करते थे । रामधन सेठ की एक ही लड़की थी जिसका नाम सुषमा  था रामधन  सठ ने उसकी शादी  जिस से की थी  उसका नाम विवेक वर्मा  था और वे सरकारी  अस्पताल  में डॉक्टर  थे। । हरि सिंह बता रहे थे  कि वो शादी गाँव  की सबसे खर्चीली शादी मानी जाती थी। रामधन सेठ गाँव में सबसे पहले डीजल से चलने लाला पंप  ले के आए थे वे उस पंप से चक्की भी चलाते थे  अक्सर जब चक्की खराब हो जाती तो खुद ही ठीक भी कर देते थे  आसपास के कई  गाँवों के,लोग उनके पास गेहूँ पिसाने आते थे।  उन्हें सायकिल का शौक था  लेकिन हर छः महीने में  वे पुरानी सायकिल बेचकर नई खरीद लाते थे गाँव में सबसे  पहले रेडियों  वे ही लाए थे। टी वी भी सबसे पहले उनके पास  आया था।  घड़ी भी सबसे पहले वे ही लाए थे।  महीने में एक बार वे स्कूल जाते थे  तथा बच्चों को दो दो रपये बाँटकर  आते थे उस समय  रुपये की बड़ी कीमत थी  बच्चे खुश हो जाते  सेठ जी को इसमें बड़ा आनंद आता था।  जीवन भर मुक्त हस्त से दान करने के कारण  उनका नाम सब जानये  थे। जिस जगह पर उनकी छतरी बनी है वहाँ बगीचा रामधन सेठ ने बडे  मन से  लगाया था जो उनकी  मौत के बाद उजड़ गया था।  हरिसिंह जी को इसी बात का दुख था । अब तो रतनपुर गाँव की पूरी तस्वीर ही बदल गई है अब गाँव में हायर सेकेण्डरी स्कूल है  पक्की सडक है दुकाने हैं  गाँव की आबादी बढ़कर आठ हजार हो गई है रतनपुर अब धीरे धीरे कस्बे में बदल रहा है।
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रचनाकार
प्रदीप कश्यप
भोपाल मध्यप्रदेश 




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