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कहानी: जिसका कोई नहीं

नारायणदास आज भले शहर के एक बड़े उद्योगपति थे, समाज सेवी और दानदाता थे। लेकिन उनका बचपन बहुत दुखदायी बीता था। माँ छोड़ कर चली गई, पिता ने घर से निकाल दिया, एक आठ वर्ष के बालक के साथ ये सब हुआ, पर कहा जाता है न कि जिसका कोई नहीं उसका भी कोई न कोई बन ही जाता है।

नारायण दास ने बचपन में जब होश सँभाला तबसे उसने माता पिता को लड़ते और कलह करते ही देखा था। नारायणदास का पिता गिरिवरदास  पक्का शराबी जुआरी और सटोरिया था। कमाता एक रुपया भी नहीं था। विरासत में जो जमीन जायदाद मिली थी उसे बेचकर अपने शौक पूरा करता था। नारायणदास की माँ रोहिणी  शौकीन महिला थी। उसकी अपने पति से बिल्कुल नहीं बनती थी। गिरिवर दास कई कई दिनों तक घर नहीं आता था। इसका फायदा उठाकर मोहल्ले के श्यामसिंह ने रोहिणी से निकटता बढाना शुरू कर दी थी। वो निकटता आकर्षण में बदल गई। एक दिन वो आया जब वो अपने आठ वर्ष के मासूम बच्चे को छोड़कर अपने प्रेमी श्यामसिंह के साथ हमेशा के लिए चली गई। नारायणदास बिना माँ के कैसे रहेगा ये भी नहीं सोचा। उसकी ममता मर चुकी थी। जब गिरिवरदास दो दिन बाद घर आया तब नारायणदास ने बताया कि माँ तो हमेशा के लिए ये घर छोड़कर चली गई। ये बात सुनकर गिरिवरदास को कोई हैरत नहीं हुई। दूसरे दिन ही वो उस विधवा औरत को घर ले आया जिसका नाम बसंती था और उसका चाल चलन ठीक नहीं था। घर में बिठाकर वो लोगों को शराब पिलाती थी। तथा जुए की फड चलाती थी। सट्टा लिखने का काम भी करती थी। अब गिरिवर दास का घर शराबियों जुआरियों सटोरियों का अड्डा बन गया था। नारायण दास की स्कूल की पढ़ाई छूट चुकी थी। वो बहुत दुखी रहता था। उसका पिता गिरिवर दास भी उसे बेरहमी से मारता था। बसंती भी उस पर कई तरह के अत्याचार  करती थी। इसके बाद भी उसका मन नहीं भरा तो उसने नारायणदास को घर से निकाल दिया। उसके पिता ने इस पर कोई  ऐतराज जाहिर नहीं किया। नारायण दास आठ साल के बालक ही तो थे। दिन भर भूख प्यास से भटकते रहे।  शिवालय के पास पानी की टंकी रखी थी। भूखे पेट उन्होंने वो पानी पी लिया तो चक्कर खाकर गिर पड़े।  शिवालय के पुजारी दयाल गिरी तुरंत वहाँ आए उन्होंने कुछ देशी उपचार किए जिससे नारायण दास को होश आ गया। नारायणदास ने जब अपनी आपबीती दयाल गिरी जी को सुनाई तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। दयाल गिरी जी ने सन्यास ग्रहण कर लिया था। और इस मंदिर  के महंत थे। उन्होंने नारायणदास को अपना शिष्य बनाकर मंदिर में रख लिया था। दयाल जी ने नारायणदास का नाम सरकारी स्कूल में  लिखा दिया था। उन्होंने नारायणदास की पढ़ाई फिर से शुरू करा दी थी। नारायण दास जी ने बी कॉम और एम बी ए कर लिया था। दयालदास जी ने मंदिर के प्रबंध की जिम्मेदारी नारायणदास जी को सौंप दी थी। दयाल दास गिरि महाराज  के एक शिष्य  राकेश  विधायक  का चुनाव  जीतने के बाद  वे उद्योग मंत्री बन गए थे।  वे जब दयाल दास जी से मिलने आए  तब दयाल दास जी  ने नारायण दास की  सरकारी नौकरी  लगवाने का आग्रह किया था।  जिस पर मंत्रीजी ने कहा  कि मैं तो  इसे उद्योगपति बनाना चाहता हूँ । और जब उन्होंने  दोनों  को  अपनी  प्लानिंग बताई। जिस पर वे सहमत हो  गए ।  इसके बाद दो साल   में वहां गंगा  स्पिनिंग  मिल बन गई थी  जिसमें पन्द्रह सौ लोगों को रोजगार मिला था।  मिलमालिक नारायण दास थे। फिर भी उन्होंने  और भी कई  जगह रुपयों को इन्वेस्ट किया था। जिनसे उनकी आमदानी दिन दुनी रात  चौगुनी गति  से बढ़ रही थी। दूसरी और नारायण दास के पिता गिरिवर इन दिनों दरदर का भिखारी हो गया था। इसी अय्याशी में  किसी ने तलवार से एक हाथ और पैर काट  दिया था। जो पत्नी रखी थी वो भी छोड़कर चली गई थी । जमापूँजी सब खत्म होने के बाद अब वो भीख माँग रहा था। नारायण दास की माँ विक्षिप्त अवस्था में मिली थी। जिसे उन्होंने मानसिक  चिकित्सा केन्द्र  में भर्ती करा दिया था।
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रचनाकार 
प्रदीप कश्यप


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