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कहानी: आर्टीजन से उद्योगपति

कभी सार्वजनिक  उपक्रम में आर्टीजन से अपनी नौकरी की शुरूआत करने वाले  रेवाराम  आज शहर के सफल उद्योगपति थे करोड़ों रुपयों का उनका टर्न ओवर था हज़ारों श्रमिक उनके कारखाने में काम करते थे। 
रेवाराम के पिताजी हरिशंकर जी का  बचपन में ही निधन हो गया था उनकी माँ ने मजदूरी कर उन्हें पाला था जब वे थोड़े बड़े हुए तो  एक मेकेनिक की  दुकान पर काम करने लगे वो उन्हें चालीस रुपये रोज देता था जो वे अपनी माँ को दे देते थे। उनकी पढ़ाई सरकारी स्कूल में सुई थी हायर सेकेण्डरी के बाद रेवाराम जी ने मेकेनिकल में आइ टी आई की थी  फिर शहर के बड़े सरकारी इलेक्ट्रिकल कारखाने में तीन साल प्रशिक्षु रहे इसके बाद वहीं उन्हें स्थायी नियुक्ति मिल गई। वः जिस मशीन पर वे  काम करते थे उसकी पूरी जानकारी उन्हें रहती थी एक बार जब वे काम पर आए तो देखा मशीन बंद पड़ी है। इंजीनियर और उनके शिफ्ट इंचार्ज रमेश वर्मा  के निर्देश पर काम बंद किया गया था भशीन में खराबी आ गई थी। मशीन सुधारने के लिए जर्मनी से मेकेनिक आने वाला था। जिसका आने जाने का खर्च ही लाखों में था। रेवाराम ने मशीन का मुआयना किया और कहा मैं इसे चालू कर सकता हूँ।   रमेश वर्मा ने सख्ती से उन्हें मना कर दिया बोले करोड़ों रुपये की मशीन है अगर गड़बड़ हो गई तो  इतने पैसे कौन भरेगा मैं अपनी नौकरी दाँव पर नहीं लगा सकता पर रेवाराम नहीं माने वो जानते थे कि बहुत मामूली खराबी है।  रमेश वर्मा जैसे ही थोड़ी देर के लिए वहाँ से गए  वैसे ही रेवाराम ने अपना कमाल दिखाया और मशीन चालू कर दी सबको सुखद आश्चर्य हुआ इंजीनियर वर्भा जी ने पाँच सौ रुपये रेवाराम को पुरुस्कार में दिए। लेकिन मशीन सुधारने का सारा श्रेय खुद ले लिया  कंपनी को आठ लाख का फायदा हुआ था कंपनी ने  रमेश वर्मा को सम्मानित किया दो लाख रुपये का चेक दिया  जी एम साहब ने वर्मा जी की खूब प्रशंशा की उनके भविष्य को उज्जवल बताया रेवाराम जी के नाम का तो किसी ने उल्लेख तक नहीं किया। वे इससे बड़े दुखी हुए आखिर वे थे तो आर्टीजन ही इसके बाद जब रेवाराम ने कहा कि अगर भशीन मुझसे नहीं सुधरती तो क्या होता वर्मा जी बोला मेरा तो कुछ नहीं बिगड़ता लेकिन तू नौकरी से हाथ धो बैठता । सुनकर रेवाराम कुछ अनमने हो गए थे।  सोच रहे थे ये तो खुली बेईमानी है रेवाराम के सामने  वो इंजीनियर कुछ भी नहीं था लेकिन वो उनका वरिष्ठ अधिकारी था। रेवाराम मशीन पर जॉब बना रहे थे अचानक उनके दिमाग में ऐसा कुछ आया जिसके करने से वो जॉब पहले से अधिक परफेक्ट था इसका श्रेय भी रमेश वर्मा को मिला और उनका प्रमोशन हो गया। उसी दिन रेवाराम जी को आधा घंटे लेट आने पर कारण बताओ नोटिस मिला था  पर वे क्या करते मजबूर थे। यहाँ तक तो सब ठीक था एक  दिन वर्मा जी  ने सभी श्रमिकों से कहा सामान घटिया क्वालिटी का बनाओ ये आर्डर कैंसिल होना चाहिए ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनी को यह आर्डर मिले इसी में हमारा लाभ है। सबने वैसा ही किया आर्डर कैंसिल हुआ वर्माजी तथा उन्य वरिष्ठ अधिकारियों  को लाखों मिले फेक्ट्री की साख को धक्का लगा कंपनी ने इसकी जाँच की तो मजदंरों को इसका  दोषी ठहराया रेवाराम को एक और नोटिस मैला जिससे उनकी दो वेतन वृद्धि रोक दी गईं थीं । वे बड़े दुखी हुए उनका कोई कसूर नहीं था और उन्हें सजा मिल रही थी अचानक उन्होंने कड़ा निर्णय लिया एक लेथ मशीन बिकाऊ थी  बहुत दिनों से बंद रहने के कारण वो कबाड़ जैसी लग रही थी कबाड़ के भाव रेवाराम ने वो लेथ मशीन खरीद ली नौकरी से इस्तीफा देकर  रेवाराम जी ने छोटी सी वर्कशॉप खोल ली थी। एक दिन बहुराष्ट्रीय कंपनी का ऑफर आया वो  उन्हें चार गुना तनख्वाह देने को तैयार थे लेकिन रेवाराम जी ने  मना कर दिया लेथ मशीन को उनके जादुई हाथों ने सुधार कर नई जैसी बना दिया था रातदिन उस मशीन पर काम कर कई उन्नत यंत्र  बनाए जिसने बाजार में धूम मचा दी उधर रमेश वर्मा की करतूत सबको  पता टल गई थी।रेवाराम  के नौकरी छोड़ने के कुछ दिन बाद  रमेश वर्मा रिश्वत लेते हुए पकड़ा गए थे।  जिसमें उनकी नौकरी चली  गई थी और वो पटरी पर आ गए थे। बाद में जब रमेश वर्मा   को जेल की सजा हई  तो पूरा शहर जान गया कि असल दोषी कौन  था। रेवाराम लगातार उन्नति करते रहे  और एक लेथ मशीन से काम की शुरूआत करने वाले  रेवाराम  आज करोड़ों के कारोबार के मालिक थे।सारा शहर उन्हें जानता था तथा उनकी इज्जत करता था।
*****।
रचनाकार
प्रदीप कश्यप 


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